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कैसे सेहतमंद रहे इंडिया: मोदी के कार्यकाल में मंजूरी तो मिली 14 एम्स को, लेकिन बना अब तक एक भी नहीं

मोदी सरकार ने 2014 में सत्ता संभालने के बाद से पहले ही 13 एम्स या एम्स जैसे संस्थान बनाने को मंजूरी दे रखी है। लेकिन सच्चाई यह है कि इनमें से कोई भी एम्स निकट समय में बनकर तैयार होने की स्थिति में नहीं है।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया मोदी सरकार के कार्यकाल में एम्स निर्माण की दिशा में नहीं उठाए गए ठोस कदम

पिछले 17 दिसंबर को केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मीडिया को यह जानकारी दी थी कि कैबिनेट ने दो नए एम्स को मंजूरी दी है। एक एम्स तमिलनाडु के मदुरई में और दूसरा तेलंगाना में बनाया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया था कि तमिलनाडु के एम्स पर 1,264 करोड़ रुपए और तेलंगाना में 1,028 करोड़ रुपए की लागत आएगी।

बता दें कि मोदी सरकार ने 2014 में सत्ता संभालने के बाद से पहले ही 13 एम्स या एम्स जैसे संस्थान बनाने को मंजूरी दे रखी है। इस साल मई में चार साल का कार्यकाल पूरा हो जाने पर मोदी सरकार और बीजेपी ने इसे बहुत बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया था। लेकिन सच्चाई यह है कि इनमें से कोई भी एम्स निकट समय में बनकर तैयार होने की स्थिति में नहीं है। इस मामले में मोदी सरकार अपना वादा निभाने में बुरी तरह असफल रही है। हालांकि बाकी वादों का भी हाल इससे जुदा नहीं है।

यहां यह बता देना जरूरी है कि तमिलनाडू में एम्स को मंजूरी पहले ही मिल चुकी थी, लेकिन उसकी जगह निर्धारित नहीं हुई थी। देखा जाए तो तेलंगाना में एम्स बनाने की कैबिनेट की ताजा मंजूरी के बाद कुल 14 एम्स बनाने की बात मोदी सरकार ने की है। 2014 में 4, 2015 में 7 और 2017 में 2 एम्स बनाने को पहले मंजूरी मिली थी।

दिल्ली में पहला एम्स 1956 में बना था। उसके बाद 2003 से 2014 के बीच भोपाल, भुवनेश्वर, रायपुर, जोधपुर, पटना और ऋषिकेश में 6 एम्स बनकर तैयार हुए और उनमें कामकाज हो रहा है। हालांकि दिल्ली के एम्स की तुलना में उनके स्तर को लेकर हमेशा आलोचना होती रही है। इसके अलावा 2008 में यूपीए सरकार के दौरान रायबरेली में एम्स बनाने को मंजूरी दी गई थी, जिसके 2020 तक पूरा होने की संभावना है।

लेकिन इन सारी घोषणाओं और मंजूरी के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह सारे एम्स कब तक बनकर तैयार होंगे और देश की जनता की स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने में सहायक होंगे? क्योंकि आंकड़ों पर निगाह डाली जाए तो ऐसा लगता है कि इनके बनने में संभावना से भी ज्यादा वक्त लगना निश्चित है।

जून, 2018 में वेबसाइट फैक्टचेकर द्वारा किए गए एक विश्लेषण के मुताबिक, 14810 करोड़ के बजट से बनने वाले 11 एम्स के लिए 2017 तक सिर्फ 2.7 फीसदी यानी लगभग 405 करोड़ रुपए ही मुहैया कराए गए हैं।

जून, 2018 में ही इंडिया टुडे ने आरटीआई के जरिये जो जानकारी जुटाई, उसमें भी यही बात सामने आई:

-उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र गोरखपुर में 1,011 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले एम्स के लिए सिर्फ 98.34 करोड़ रुपये ही जारी हुआ था और मार्च, 2020 में इसे बनकर तैयार होना है।

-आंध्र प्रदेश में 1,618 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले एम्स के लिए 233.88 करोड़ रुपये दिए गए थे और अक्टूबर, 2020 तक इसे बनाया जाना है।

-पश्चिम बंगाल के कल्याणी में 1,754 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले एम्स के लिए 278.42 करोड़ रुपये का फंड जारी हुआ था और इसे भी अक्टूबर, 2020 तक पूरा किया जाना है।

-नागपुर, महाराष्ट्र में 1,577 करोड़ रुपये की कुल लागत से एम्स का निर्माण किया जाना है, लेकिन उस परियोजना को 231.29 करोड़ रुपये ही मिले थे। इसके बनने की मियाद भी अक्टूबर, 2020 तक है।

-असम के कामरूप जिल में 1,123 करोड़ रुपये की लागत से एम्स बनना है और इसमें सिर्फ 5 करोड़ ही खर्च हुए थे। इसकी समयसीमा अप्रैल, 2021 तक है।

-पंजाब के बठिंडा में एम्स बनाने के लिए 925 करोड़ रुपये लगेंगे और उसके लिए 36.57 करोड़ रुपये जारी हुए थे। इसे जून, 2020 में पूरा होना है।

बाकी एम्स निर्माण की हालत इससे भी बुरी है। कुछ के लिए तो जगह भी अभी तक तय नहीं हुई है। मोदी सरकार ने देश के कई राज्यों में एम्स बनाने की मंजूरी तो दे दी, लेकिन पूरे कार्यकाल के दौरान एक का भी निर्माण पूरा नहीं कर पाई। आंकड़ों से साफ है कि उन्हें पूरा करने की दिशा में काम की गति भी बहुत धीमी है और तय वक्त में उन्हें पूरा करना फिलहाल तो नामुमकिन लग रहा है।

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