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H-1B पर 1.03 लाख डॉलर के भारी शुल्क का प्रस्ताव, भारतीय पेशेवरों को लगेगा बड़ा झटका!

ट्रंप प्रशासन ने कैप-सब्जेक्ट H-1B याचिकाओं पर 1,03,265 डॉलर अतिरिक्त शुल्क का प्रस्ताव रखा है, जिससे कंपनियों और भारतीय पेशेवरों पर असर पड़ सकता है।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

अमेरिका में नौकरी करने वाले विदेशी विशेषज्ञ कर्मचारियों, खासकर भारतीय पेशेवरों के लिए H-1B वीजा से जुड़ा ट्रंप प्रशासन का नया प्रस्ताव चिंता बढ़ाने वाला है। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने 'कैप-सब्जेक्ट' H-1B याचिकाओं पर 1,03,265 डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह राशि पहले से लागू सभी फीस के अलावा होगी और कंपनी को H-1B याचिका दाखिल करते समय ही इसका भुगतान करना होगा। यानी प्रस्ताव लागू हुआ तो विदेशी विशेषज्ञों को नौकरी देने की लागत कंपनियों के लिए अचानक काफी बढ़ सकती है।

सिर्फ बड़ी कंपनियां नहीं, छोटी संस्थाएं भी आएंगी दायरे में

प्रस्तावित शुल्क सभी कैप-सब्जेक्ट H-1B याचिकाओं पर लागू होगा। इसमें 'एडवांस्ड डिग्री छूट' के तहत आने वाली याचिकाएं भी शामिल हैं। DHS का कहना है कि शुल्क कंपनी के आकार के आधार पर अलग नहीं होगा। छोटी-बड़ी कंपनियों के साथ गैर-लाभकारी संस्थाओं पर भी यह समान रूप से लागू होगा। हालांकि, H-1B कैप से छूट प्राप्त कुछ गैर-लाभकारी शोध संगठन, सरकारी शोध संस्थान और उच्च शिक्षा संस्थान इस शुल्क के दायरे से बाहर रहेंगे। वित्तीय वर्ष 2025 में H-1B कैप-सब्जेक्ट याचिकाएं दाखिल करने वाली 28,649 संस्थाओं में 14,541 छोटी संस्थाएं थीं। DHS का अनुमान है कि करीब 11,051 छोटी संस्थाओं पर इसका महत्वपूर्ण आर्थिक असर पड़ेगा, जो इस विश्लेषण में शामिल छोटी संस्थाओं का लगभग 76 प्रतिशत है।

सरकार को हर साल 8.8 अरब डॉलर की अतिरिक्त आय का अनुमान

DHS का अनुमान है कि नए शुल्क से हर साल करीब 8.8 अरब डॉलर की अतिरिक्त आय हो सकती है। यह अनुमान लगभग 85,000 H-1B याचिकाओं के आधार पर लगाया गया है। USCIS के प्रवक्ता जैक काहलर के मुताबिक, प्रस्ताव का मकसद कानूनी इमिग्रेशन कार्यक्रमों की जांच, सत्यापन और संचालन पर संघीय सरकार के खर्च की भरपाई करना है। सरकार का कहना है कि इस पैसे का इस्तेमाल इमिग्रेशन लाभों के आवेदनों की जांच, धोखाधड़ी की पहचान, राष्ट्रीय सुरक्षा जांच, सरकारी सिस्टम के आधुनिकीकरण और रिकॉर्ड प्रबंधन जैसे कामों में किया जाएगा। प्रस्तावित नियम के तहत इमिग्रेशन अदालतों, वीजा प्रोसेसिंग, श्रम मानकों के पालन और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय पर भी यह राशि खर्च की जाएगी। इसमें USCIS, कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन, इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट, न्याय विभाग की इमिग्रेशन अदालतों, विदेश विभाग और श्रम विभाग की इमिग्रेशन से जुड़ी गतिविधियां शामिल हैं।

अमेरिका में हर साल 85 हजार H-1B याचिकाओं पर पड़ेगा असर

H-1B कार्यक्रम के तहत हर साल 65,000 वीजा जारी किए जाते हैं। इसके अलावा अमेरिकी संस्थानों से मास्टर डिग्री या उससे अधिक योग्यता हासिल करने वाले विदेशी नागरिकों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा उपलब्ध होते हैं। प्रस्तावित शुल्क इन्हीं कैप-सब्जेक्ट याचिकाओं पर लागू होगा। DHS ने कहा है कि शुल्क सभी संबंधित नियोक्ताओं के लिए समान रहेगा। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर कंपनियां H-1B के जरिए विदेशी विशेषज्ञ कर्मचारियों को नियुक्त करती हैं तो उन्हें पहले से मौजूद फीस के ऊपर यह बड़ी अतिरिक्त राशि भी देनी होगी। भारतीय पेशेवरों के लिए इसका असर इस मायने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि वे H-1B कार्यक्रम के जरिए अमेरिका में काम करने वाले प्रमुख विदेशी पेशेवर समूहों में शामिल हैं।

प्रस्ताव पर सवाल

इमिग्रेशन सुधार के लिए काम करने वाले संगठन FWD.us के अध्यक्ष टॉड शुल्टे ने प्रस्ताव का विरोध किया है। उन्होंने इसे अमेरिकी कारोबारों पर भारी टैक्स बताते हुए कहा कि H-1B पर प्रस्तावित यह शुल्क और ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर चर्चा में रहने वाला संभावित टैक्स, दोनों अमेरिका की दुनिया के बेहतरीन प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित करने की क्षमता को कमजोर कर सकते हैं। उनका कहना है कि इससे नौकरियां और कारोबार विदेशों में जा सकते हैं और आखिरकार सभी कर्मचारियों को नुकसान होगा। शुल्टे ने यह सवाल भी उठाया कि क्या सरकार को H-1B आवेदन की वास्तविक प्रोसेसिंग लागत से कहीं ज्यादा शुल्क लेने का कानूनी अधिकार है। उन्होंने प्रस्ताव को कानून का स्पष्ट उल्लंघन बताया है। दूसरी ओर, DHS का कहना है कि अमेरिकी इमिग्रेशन कानून सरकार को ऐसे शुल्क तय करने की अनुमति देता है, जिससे इमिग्रेशन और नागरिकता सेवाओं की पूरी लागत की भरपाई की जा सके। विभाग का तर्क है कि H-1B के तहत कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियां आम व्यक्तिगत आवेदकों की तुलना में अधिक भुगतान करने में सक्षम होती हैं।

अभी प्रस्ताव है, अंतिम नियम नहीं

यह शुल्क फिलहाल लागू नहीं हुआ है। प्रस्ताव मंगलवार को फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित किया जाना है, जिसके बाद 30 दिनों तक आम लोगों और संस्थाओं से सुझाव और आपत्तियां मांगी जाएंगी। यानी अभी इस प्रस्ताव में बदलाव की गुंजाइश बनी हुई है। लेकिन अगर यह नियम अंतिम रूप से लागू होता है तो H-1B के जरिए विदेशी विशेषज्ञ कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों के लिए लागत में बड़ा उछाल आएगा। यही वजह है कि इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा सवाल सिर्फ शुल्क की रकम नहीं, बल्कि यह है कि इतनी बड़ी अतिरिक्त लागत के बाद अमेरिकी कंपनियां विदेशी पेशेवरों, खासकर भारतीय विशेषज्ञों को पहले की तरह भर्ती करने में कितनी दिलचस्पी दिखाएंगी।