
सार्वजनिक धार्मिक स्थलों को निजी घरों में बदलने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने चिंता व्यक्त की है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि मस्जिद में एक इमाम का परिवार मस्जिद की संपत्ति में किसी भी अधिकार का दावा नहीं कर सकता है क्योंकि संपत्ति वक्फ की है। न्यायमूर्ति प्रतिबा एम सिंह की पीठ ने कहा कि इमाम को केवल प्रार्थना करने और वक्फ संपत्ति की देखभाल करने के उद्देश्य से नियुक्त किया जाता है। याचिकाकर्ता जहीर अहमद इमाम का बेटा होने के नाते परिवार का सदस्य है और उसने बिना किसी अधिकार के कई दशकों तक संपत्ति पर कब्जा किया और दूसरों को कब्जा करने की अनुमति दी।
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दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, " पुजारियों, पंडितों, इमामों और देखभाल करने वाले लोग एवं उनके परिवार के सदस्य अवैध और अनधिकृत तरीके से संपत्ति पर दावा करते हैं।" हाई कोर्ट ने कहा, "पूजा स्थलों को आवासों में बदल दिया जाता है और परिसर की देखभाल करने वाले लोग ही उस पर कब्जा कर लेते हैं, जिसमें उनका परिवार, घरेलू नौकर और अन्य लोग शामिल हैं। ये कानून के खिलाफ है।"
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याचिकाकर्ता जहीर अहमद ने याचिका दायर कर संपत्ति को डी-सील करने की मांग की, जिसमें एक कमरा, रसोई, बाथरूम और मस्जिद से सटे कुछ स्थान शामिल हैं। याचिकाकर्ता ने प्रॉपर्टी में पुनर्निर्माण की अनुमति भी मांगी थी। हालांकि हाईकोर्ट ने उसे झटका देते हुए उसे 'अनधिकृत कब्जाधारी' बताया और उसकी याचिका को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि उसने दिल्ली वक्फ बोर्ड की संपत्ति पर कब्जा किया है। इतना ही नहीं उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता पर 8 हफ्ते के अंदर दिल्ली वक्फ बोर्ड को 15 लाख रुपये भुगतान करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा, अदालत ने अहमद को 8 सप्ताह के भीतर दिल्ली वक्फ बोर्ड को खर्च के रूप में भी 2 लाख रुपये जमा करने को भी कहा।
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