
24 जून 2018 दिल्ली के लिए एक ऐतिहासिक दिन था, जब पहली बार यहां पर्यावरण के किसी मुद्दे पर लोग सड़कों पर उतरे थे। पेड़ बचाने के लिए लोग आगे आये थे। सोशल मीडिया ने इसे चिपको आंदोलन से जोड़ा तो जरूर, पर सही मायने में यह चिपको आंदोलन की गरिमा को गिराना भर था। देखा जाए तो दिल्ली का विरोध एक राजनीतिक पहल थी जो आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के आपसी आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा प्रभावित था। पेड़ तो दिल्ली में लगातार कटते रहे हैं। दिल्ली मेट्रो के लिए जितने पेड़ काटे गए होंगे उसका तो अनुमान लगाना भी कठिन है, और यह दिल्ली के हरेक क्षेत्र में किया गया। अभी कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री ने जिस ईस्टर्न पेरिफेरल हाईवे और एनएच-24 के हिस्से का उद्घाटन किया, उसके लिए हजारों पेड़ बेरहमी से काटे गए। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की गयी, पर एक भी पेड़ नहीं बचे। लोग कभी सड़कों पर नहीं आये, और न ही इसे खबर बनाया गया।
दिल्ली में जितनी भी सरकारें रहीं हैं, उनमें केवल शीला दीक्षित को पर्यावरण से लगाव था और चिंता भी। तब दिल्ली को दुनिया में सबसे हरी राजधानी बनाना चाहती थीं, देश का सबसे हरा महानगर बना चुकी थीं। लाल किले के पीछे की एलिवेटेड रोड के डिवाईडर पर लगी हरियाली उन्हीं की देखरेख में पनपी थी। गौरैया को राज्य पक्षी का दर्जा उन्होंने ही दिया था। वायु प्रदूषण की भी बात करें तो उनके विरोधी भी स्वीकार करेंगे कि हाल के वर्षों में वायु प्रदूषण का सबसे निचला स्तर राष्ट्रमंडल खेलों के समय दर्ज किया गया था और यह उनके प्रयासों का ही नतीजा था।
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आज पेड़ तो नेपथ्य में हैं, राजनीति सबसे आगे है। अभी आरोप-प्रत्यारोप सीधे चल रहे हैं, फिर न्यायालयों में यही सिलसिला चलेगा। आम आदमी पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार ने पेड़ों को काटने की मंजूरी दी है और केंद्र सरकार का कहना है कि उन्होंने मंजूरी नहीं दी। इसी बहस के बीच 3 हजार से अधिक पेड़ कट भी गए। यकीन मानिए, इसी तरह 14 हजार पेड़ और भी कट जायेंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा। प्रगति मैदान के पास के सारे पेड़ काट दिए गए, कोई आवाज उठी?
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हरेक परियोजना का पेड़ काटने पर एक ही वक्तव्य रहता है, हमने पेड़ों को काटने की मंजूरी वन विभाग से ली है और हरेक काटे गए पेड़ों के बदले 10 नए पेड़ लगायेंगे। किसी को नहीं मालूम ये पेड़ कहां लगाए जाते हैं, और पेड़ों को काटने की मंजूरी का आधार क्या है? जितनी भी परियोजनाएं ऐसी हैं जिन्हें पर्यावरण स्वीकृति मिली है, उन्हें 33 प्रतिशत हिस्से में हरियाली विकसित करनी है, जिसमें से आधा हिस्सा पेड़ों का होना चाहिए। यह पर्यावरण स्वीकृति की एक शर्त होती है और हरेक 6 महीने में इसकी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती है। इसके बाद भी कोई ऐसी परियोजना नहीं दिखती जिसमें लॉन से आगे कुछ विकसित किया जाता है।
वर्ष 2017 के फारेस्ट असेसमेंट रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली के कुल 1483 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से 192.4 वर्ग किलोमीटर में पेड़ो का आवरण है, यह क्षेत्र वर्ष 2015 की तुलना में 0.3 प्रतिशत अधिक है। दिल्ली सरकार इन आंकड़ों पर आत्मप्रशंसा में लीन थी, पर हकीकत तो यह है कि रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली के सघन वन क्षेत्र में कमी आ रही है। दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार, दोनों को पर्यावरण से कोई भी मतलब नहीं हैं, इसलिए पेड़ कटते रहेंगे और जनता सांसों के लिए तड़पती रहेगी।
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