
बंगाल में एक जंग छिड़ी है। एक तरफ ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी है, जिसने राज्य में लगातार तीन कार्यकाल यानी 15 साल तक राज किया है; और दूसरी तरफ है उसकी सबसे बड़ी विरोधी भाजपा और उसके जरा से इशारे पर हल्ला बोलने को तत्पर तमाम केन्द्रीय एजेंसियां।
यहां तक कि भारत का चुनाव आयोग- जो देश में ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ चुनावों का प्रशासक और कथित तौर पर ऐसा निर्णायक विभाग है जिसपर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता- उसने भी बंगाल में अपनी सारी हदें पार कर दी हैं। यहां उसके कारनामे मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) से भी कहीं आगे निकल गए हैं। गौरतलब है कि एसआईआर ने देश भर के नागरिक-मतदाताओं में अफरा-तफरी मचा दी है और कुछ ‘खास’ समुदायों को और भी बुरे अंजाम का खौफ सताने लगा है।
पश्चिम बंगाल में मतदान का पहला चरण पूरा हो चुका है और 29 अप्रैल का दूसरा चरण बाकी था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह कोलकाता में ही डेरा डाले हुए हैं; बताया जा रहा है कि वह 27 अप्रैल को दूसरे चरण का चुनाव प्रचार खत्म होने तक वहीं रहेंगे। वह बीजेपी के मुख्य रणनीतिकार हैं और जमीनी हालात पर नजर रख रहे हैं। इसके अलावा वह अपने खास अंदाज में धमक भी दिखा रहे हैं। पहले चरण से पहले एक रैली में उन्होंने ऐलान किया, ‘चुनाव आयोग ने केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बल तैनात कर दिए हैं। अगर ममता बनर्जी के गुंडे चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिश करेंगे, तो मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि 4 मई के बाद उन्हें उल्टा लटका दिया जाए।’
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सुरक्षा के इंतजाम अभूतपूर्व हैं। सीएपीएफ की तैनाती में सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी, एनएसजी और असम राइफल्स के जवान शामिल हैं, जिससे बीजेपी कार्यकर्ताओं में नया जोश दिख रहा है, जबकि तृणमूल कार्यकर्ताओं का उत्साह थोड़ा ठंडा पड़ गया है। इसके बावजूद, तृणमूल कार्यकर्ताओं ने अपना पुराना जोश पूरी तरह से नहीं खोया है, जैसा कि बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी को भी अंदाजा हुआ जब वह अपने निजी सुरक्षा गार्डों और हथियारबंद पैरामिलिट्री जवानों के साथ चुनाव प्रचार कर रहे थे। उस नजारे को हमेशा याद रखा जाएगा जिसमें सुवेंदु अधिकारी को एक आदमी की तरफ घूरते हुए और जोर से ‘जय श्री राम’ का नारा लगाते देखा गया। वह आदमी भी पलटकर घूरता है और जवाब में जोर से कहता है- ‘जॉय बांग्ला!’
वोटिंग से एक महीने पहले ही राज्य में अर्धसैनिक सुरक्षा बलों का आना शुरू हो गया था। 20 अप्रैल को ‘द टेलीग्राफ’ ने बताया कि पहले चरण के लिए 2,40,000 सीएपीएफ जवानों (2,407 कंपनियां) को तैनात किया गया है। इस आंकड़े को सही संदर्भ में समझने के लिए, बता दें कि 2023 में जब मणिपुर में जातीय हिंसा चरम पर थी, तब वहां 288 कंपनियां तैनात की गई थीं।
तृणमूल कांग्रेस की सांसद और पूर्व पत्रकार सागरिका घोष ने ‘द प्रिंट’ में लिखा: बीजेपी बंगाल में किसी कब्जा करने वाली फौज की तरह उतर आई है... सैकड़ों हेलीकॉप्टर, जेड-प्लस सुरक्षा वाली हजारों गाड़ियां, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और झारखंड से बसों में भरकर लाए गए कार्यकर्ता, केन्द्रीय बलों की सैकड़ों कंपनियां और ऐसे बख्तरबंद वाहन, जिन्हें आम तौर पर सक्रिय युद्ध क्षेत्रों में तैनात किया जाता है।’
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देश के अलग-अलग हिस्सों (कश्मीर समेत) से मंगवाई गई बुलेट-प्रूफ बख्तरबंद गाड़ियां, ‘विश्वास जगाने के उपाय’ के तौर पर सड़कों पर दौड़ रही हैं। सैनिक ‘इलाके पर दबदबा’ बनाने के लिए मार्च कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल पर लगातार 34 साल (1977–2011) तक राज करने वाली सीपीएम को इससे कोई शिकायत नहीं क्योंकि वह मुकाबले में नहीं है और ममता के ‘आतंक के राज’ का अंत देखने को बेताब है। जादवपुर सीट से चुनाव लड़ रहे सीपीएम नेता बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने ‘तृणमूल के गुंडों’ पर लगाम कसने के इन कदमों का स्वागत किया। उन्होंने कहा, ‘जो लोग पहले तृणमूल की धमकियों के कारण वोट नहीं डाल पाते थे, वे अब बेखौफ होकर वोट डालेंगे।’ लेकिन कांग्रेस नेता प्रदीप भट्टाचार्य ने इस तरह लोगों के मन में डर पैदा करने पर सवाल उठाया।
15 मार्च को चुनाव की अधिसूचना जारी होने और मतदान की तारीखों की घोषणा के बाद से ही चुनाव आयोग अत्यधिक सक्रिय है। 16 मार्च को सुबह 4 बजे, राज्य के वरिष्ठतम अधिकारियों- मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, कोलकाता पुलिस आयुक्त और एडीजी (कानून-व्यवस्था)- को एक झटके में हटा दिया गया।
अधिकारियों को हटाने का यह सिलसिला जारी रहा, जिसके तहत राज्य सरकार के 483 अधिकारियों को उनके पदों से हटा दिया गया और उन्हें किसी भी तरह की चुनावी ड्यूटी से दूर रहने का आदेश दिया गया। संदर्भ के लिए, चुनाव वाले अन्य तीन राज्यों (तमिलनाडु, केरल, असम) में वोटिंग से पहले स्थानांतरित अधिकारियों की संख्या 23 है।
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यहां तक कि जिन पुलिस इंस्पेक्टरों को उनकी जगह नियुक्त किया गया, उन्हें भी चुनाव आयोग ने खुद चुना। एक रिटायर्ड अफसर सवाल करते हैं, ‘हो सकता है चुनाव आयोग के पास जानकारी हो कि कुछ अफसर सत्ताधारी पार्टी के एहसानमंद हैं और चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन उसने यह फैसला कैसे किया कि उनकी जगह किन अफसरों को नियुक्त किया जाएगा? ये नाम किसने दिए?’
ममता बनर्जी ने खुद शिकायत की है कि उनके अपने ही चुनाव क्षेत्र में रिटर्निंग अफसर को हटाकर उनकी जगह राज्य सरकार के एक ऐसे कर्मचारी को नियुक्त कर दिया गया, जो नंदीग्राम का रहने वाला है (और जिसे सुवेंदु अधिकारी का करीबी माना जाता है); और उस अफसर ने ममता बनर्जी को उनके अपने ही चुनाव क्षेत्र में एक सभा करने की अनुमति देने से मना कर दिया!
चुनाव आयोग ने यह भी निर्देश दिया कि सभी सिविल वॉलंटियर और ग्राम पुलिस कर्मियों को- जो सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि मामूली वेतन पाने वाले राजनीतिक व्यक्ति होते हैं- मतदान के दिन पुलिस लाइनों में ही रखा जाए और उन्हें चुनाव ड्यूटी पर तैनात न किया जाए। यह कुछ वैसा ही है, जैसे आरएसएस स्वयंसेवकों को चुनाव से बाहर रहने को कहा जाए।
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राज्य में तृणमूल कांग्रेस के लिए काम करने वाली फर्म आई-पैक, संभवतः पहली ऐसी राजनीतिक कंसल्टेंसी है, जिसे चुनाव के दौरान निशाना बनाया गया है। मार्च महीने में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और आयकर विभाग की ओर से छापे और नोटिस जारी करने की कार्रवाई तेज हो गई। पहले चरण के मतदान से कुछ ही दिन पहले ईडी ने आई-पैक के तीन निदेशकों को दिल्ली तलब किया और उनमें से एक को गिरफ्तार कर लिया; बताया जाता है कि इस घटना के चलते कंपनी को अपने कर्मचारियों से 11 मई तक छुट्टी पर चले जाने के लिए कहना पड़ा।
एसआईआर ने पश्चिम बंगाल में कम-से-कम 27 लाख लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिया है, जिनमें बड़ी तादाद में मुसलमान और औरतें हैं। चुनाव आयोग ने राज्य में इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन अधिकारियों (ईआरओ) को दरकिनार कर दिया और विशेष पर्यवेक्षकों (उत्तर प्रदेश में 4, लेकिन पश्चिम बंगाल में 30), माइक्रो-पर्यवेक्षकों (देश के बाकी हिस्सों में शून्य, पश्चिम बंगाल में 8,000), और 600 सेवानिवृत्त तथा सेवारत न्यायिक अधिकारियों (जिन्हें किसी अन्य राज्य में तैनात नहीं किया गया) का इस्तेमाल किया। आयोग ने ‘तार्किक विसंगतियों’ का पता लगाने के लिए सॉफ्टवेयर भी तैयार किया (जो कहीं और नहीं मिलता!), लेकिन उसने उस कंपनी की पहचान और उसे काम पर रखने का आधार सार्वजनिक नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनाए गए 19 अपीलीय ट्रिब्यूनलों ने, जिनका काम ‘विचाराधीन’ मतदाताओं की अपीलें सुनना था, 21 अप्रैल तक सिर्फ 138 अपीलें सुनीं और 136 लोगों के नाम बहाल कर दिए।
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चुनाव आयोग की ओर से ‘स्ट्रेट टॉक टु टीएमसी’ नाम से एक्स पर जारी संदेश में इस पार्टी पर आरोप लगाया गया कि उसने पिछले चुनावों को हिंसा, बूथ पर कब्जे, डराने-धमकाने और प्रलोभन देने जैसी हरकतों से दूषित किया था। कोलकाता के एक रिटर्निंग ऑफिसर ने भी उतना ही आपत्तिजनक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने लोगों से मतगणना के दिन बर्नोल और बोरोलीन (जलने और चोट लगने पर इस्तेमाल होने वाली मशहूर मरहम) अपने पास रखने को कहा। यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि यह सब किसे संबोधित था।
पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने ऐसे कई निर्देश जारी किए हैं जो पहले कभी नहीं दिए गए। जैसे, पोलिंग खत्म होने से 48 घंटे पहले के बजाय, एक हफ्ते तक पूरे राज्य में शराब की बिक्री पर रोक। चुनाव से दो दिन पहले घर में मेहमानों के आने पर भी बैन लगा दिया गया!
सबसे मजेदार बात यह है कि 23 अप्रैल को पहले फेज की पोलिंग से कुछ दिन पहले चुनाव आयोग ने बताया कि उसने सात लाख नए वोटर जोड़े हैं। ऐसे समय में जब 27 लाख वोटर मतदाता सूची में अपना नाम वापस रखवाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं, ये नए वोटर कहां से आ गए?
(कुणाल चटर्जी, गौतम भट्टाचार्य और सौरभ सेन के इनपुट के साथ)
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