
ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधिमंडलों ने शनिवार को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से अलग-अलग मुलाक़ात की। लेकिन जब तक शांति वार्ता का एजेंडा पूरी तरह साफ नहीं हो जाता और भरोसा बहाल नहीं हो जाता, तब तक इन दोनों टीमों के आमने-सामने आने की संभावना कम ही है। ईरान ने अमेरिका के प्रति अपने गहरे अविश्वास को दोहराया है और मांग की कि बातचीत के लिए उसकी पूर्व-शर्तों को पहले पूरा किया जाए। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रवैया खुले तौर पर शत्रुतापूर्ण और रूखा बना रहा।
शनिवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर "दुनिया का सबसे शक्तिशाली रीसेट" पोस्ट किया। यह पोस्ट उन्होंने 'ट्रुथ सोशल' पर यह घोषणा करने के कुछ ही घंटों बाद किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि इस्लामाबाद वार्ता में जाने से पहले ईरान के पास "कोई भी दांव नहीं बचा है," सिवाय स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसके अस्थायी प्रभाव के। उन्होंने ईरान पर "अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों का उपयोग करके दुनिया से अल्पकालिक तौर पर ज़बरदस्ती वसूली करने" का आरोप लगाया और आगे कहा: "आज उनके जीवित होने का एकमात्र कारण बातचीत करना है!"
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इसके जवाब में, ईरान ने तेहरान से अपने प्रतिनिधिमंडल की रवानगी में देरी कर दी और इस बात पर ज़ोर दिया कि लेबनान में भी साथ-साथ युद्धविराम होना चाहिए। ईरान का एक बड़ा और शक्तिशाली प्रतिनिधिमंडल ज़्यादा बेहतर ढंग से तैयार नज़र आ रहा है और अगर उनकी बात नहीं मानी जाती है, तो वे बातचीत से बाहर निकलने को भी तैयार दिखते हैं। हालांकि, कहा जा रहा है कि पाकिस्तान और संभवतः चीन उन्हें थोड़ा और लचीला रुख अपनाने के लिए मना रहे हैं।
इस्लामाबाद वार्ता से पहले जारी तनाव और अनिश्चितता को लेकर टाइम डॉट कॉम पर प्रकाशित एक टिप्पणी में साफ नजर आई। इसमें कहा गया कि ईरान के साथ हुआ संघर्ष-विराम, किसी राजनीतिक दायरे के भीतर किया गया सुनियोजित संघर्ष-विराम न होकर, शत्रुतापूर्ण गतिविधियों में आई महज़ एक विराम जैसा प्रतीत होता है। इसमें आगे यह भी जोड़ा गया, “यह अंतर मायने रखता है। किसी राजनीतिक दायरे के बिना युद्ध का रुक जाना, संघर्ष का पूरी तरह से सुलझ जाना नहीं है।”
इस टिप्पणी में कहा गया कि, "यह एक टल गया संघर्ष है।" और कोई भी ऐसा दीर्घकालिक समझौता, जो ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर काफ़ी ज़्यादा प्रभाव बनाए रखने का मौक़ा देता हो, उसकी मिसाइल क्षमताओं को सुरक्षित रखता हो, और उसे आर्थिक रूप से उबरने की अनुमति देता हो—वह न केवल वॉशिंगटन में, बल्कि इज़राइल में और उन प्रमुख खाड़ी सहयोगियों के बीच भी राजनीतिक रूप से मंजूर नहीं होगा, जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं।
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उधर ईरानी प्रतिनिधिमंडल अमेरिका के प्रति अपने गहरे अविश्वास को लेकर पूरी तरह स्पष्ट है। ईरानी मीडिया केंद्रों ने ईरानी संसद के स्पीकर, ग़ालिबफ़ के हवाले से कहा, "अमेरिकियों के साथ बातचीत का हमारा अनुभव हमेशा नाकामी और वादों से मुकरने वाला रहा है। एक साल से भी कम समय में दो बार—बातचीत के बीच में ही, और ईरानी पक्ष की सद्भावना के बावजूद—उन्होंने हम पर हमला किया और कई युद्ध अपराध किए। हमारे मन में सद्भावना है, लेकिन हमें उन पर भरोसा नहीं है।"
इस बीच शनिवार को इस्लामाबाद से मिली रिपोर्टों से ऐसा लग रहा था कि दोनों प्रतिनिधिमंडलों के बीच शनिवार को कोई सीधी बातचीत नहीं होगी, सिवाय इसके कि वे शाम को किसी राजकीय भोज में मिलें। ईरानी प्रतिनिधिमंडल, जिसने शुक्रवार रात पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से मुलाकात की थी, उसने शनिवार दोपहर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात की।
दोनों प्रतिनिधिमंडलों से यह उम्मीद की जाती है कि 'अप्रत्यक्ष बातचीत' शुरू होने से पहले वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ अलग-अलग बैठकें करेंगे; इस बातचीत के दौरान, पाकिस्तान की मध्यस्थता में दोनों पक्ष विभिन्न मुद्दों पर अपनी-अपनी मांगें और अपना पक्ष एक-दूसरे के सामने रखेंगे। बातचीत तभी आमने-सामने की सीधीं वार्ता में बदलेगी, जब इसमें कोई रचनात्मक प्रगति होगी और दोनों पक्षों द्वारा दी जाने वाली रियायतों की पुष्टि होने के साथ-साथ उनके बीच के मतभेद कम हो जाएंगे।
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ईरान के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर और प्रेस टीवी की वेबसाइट के पूर्व प्रमुख, महदी खानालिज़ादेह ने इस्लामाबाद से एक पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने बताया कि अमेरिका ने ईरान की चार मुख्य शर्तों को मान लिया है। अगर उनकी बात पर यकीन किया जाए, तो अमेरिका ईरान की फ़्रीज़ की गई संपत्तियों को जारी करने, लेबनान में युद्धविराम का आश्वासन देने, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से गुज़रने वाले जहाज़ों की संख्या को ट्रांज़िट फ़ीस चुकाने के बाद रोज़ाना 15 तक सीमित रखने, और अमेरिकी सेना व साज़ो-सामान की किसी भी तरह की दोबारा तैनाती पर रोक लगाने के लिए राज़ी हो गया है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि ये बिना पुष्टि वाले दावे इतने आसान हैं कि सच नहीं हो सकते, और हो सकता है कि ये अपने नागरिकों को ध्यान में रखते हुए सामने रखे गए हों। शनिवार दोपहर तक लेबनान में संघर्ष-विराम को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई थी, और अभी तक इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि भी नहीं हुई है कि बातचीत के लिए किसी पूर्व-शर्त पर अमेरिका या ईरान ने सहमति जताई है।
इस दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से समुद्री यातायात अभी भी बाधित है, और ईरान के संदेशों से ऐसा कोई संकेत नहीं मिल रहा है कि निकट भविष्य में इसमें फिलहाल कोई कमी आएगा। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के 'खातम अल-अंबिया' केंद्रीय मुख्यालय की ओर से जारी एक बयान में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि यदि शत्रुतापूर्ण गतिविधियां फिर से शुरू होती हैं, तो ईरानी सशस्त्र बल जवाब देने के लिए पूरी तरह से तैयार और तत्पर हैं।
ईरानी सेना लगातार यह संकेत भी दे रही है कि हिज़्बुल्लाह एक एकीकृत रणनीतिक ढांचे का हिस्सा बना हुआ है; साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि इज़रायल द्वारा तनाव को और बढ़ाने पर, इसका जवाब भी कहीं अधिक व्यापक हो सकता है। लेबनान सरकार और इज़रायल के बीच, अमेरिका की मध्यस्थता से हो रहे संपर्कों की ख़बरों को इस रूप में देखा जा रहा है कि यह ईरान को अलग-थलग करने और भविष्य में होने वाली किसी भी व्यवस्था पर उसके प्रभाव को सीमित करने की एक कोशिश है।
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पर्यवेक्षकों ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल के असामान्य रूप से बड़े आकार और उसकी व्यापकता पर गौर किया है। राष्ट्रपति पेज़ेश्कियन को छोड़कर, ईरान का लगभग पूरा शीर्ष नेतृत्व इस्लामाबाद में मौजूद है; इसमें सुरक्षा, राजनीतिक, सैन्य, आर्थिक और कानूनी विशेषज्ञों के साथ-साथ परमाणु वैज्ञानिक भी शामिल हैं।
ग़ालिबफ़ और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची के अलावा, सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि अली अकबर अहमदीन, सेंट्रल बैंक के गवर्नर अब्दोलनासेर हेम्मती, कई उप विदेश मंत्री और ईरानी संसद के सदस्य ईरानी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हैं।
ध्यान रहे कि ईरान द्वारा यूरेनियम का संवर्धन (एनरिचमेंट) और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ अभी भी सबसे बड़ी अड़चनें बने हुए हैं, जबकि ईरान सभी प्रतिबंधों को हटाने, अपनी संपत्ति को मुक्त करने और ओमान के साथ मिलकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर अपने क्षेत्रीय अधिकार पर ज़ोर दे रहा है। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल और यूएई ने यह तर्क दिया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ एक अंतर्राष्ट्रीय स्ट्रेट है। समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीएलओएस) के तहत, जहाज़ों और विमानों को आवागमन और उड़ान भरने की स्वतंत्रता प्राप्त है। उन्होंने तर्क दिया है कि ये अधिकार किसी भी बातचीत के अधीन नहीं हैं और कोई भी देश इन अधिकारों को निलंबित नहीं कर सकता।
लेकिन, यूएनसीएलओएस को ईरान ने कभी भी मंज़ूरी नहीं दी; उसका तर्क है कि यह स्ट्रेट ईरान और ओमान के क्षेत्रीय जल क्षेत्र के भीतर आता है। यहां तक कि यूएनसीएलओएस के भाग-3 (अनुच्छेद 37-44) के तहत भी, लागू व्यवस्था "ट्रांजिट पैसेज" की है, न कि "नौवहन की स्वतंत्रता" यानी फ्रीडम ऑफ नेविगेशन की। ट्रांजिट मार्ग तटीय देशों को समुद्री मार्गों पर नियामक अधिकार प्रदान करता है।
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एक अमेरिकी नागरिक, जिसे ईरान में अमेरिकी दूतावास में छात्रों द्वारा एक साल तक बंधक बनाकर रखा गया था, उसने टाइम डॉट कॉम से बातचीत में कहा, “पाकिस्तान में होने वाली बातचीत से शायद कुछ भी हासिल न हो। बातचीत शुरू होने से पहले ही खत्म हो सकती है। उसका कहना है कि, ‘मैंने ईरान के साथ अमेरिकी कूटनीति को इतनी बार नाकाम होते देखा है कि मैं गिन भी नहीं सकता, और आमतौर पर इसके पीछे वही वजहें होती हैं — बहुत ज़्यादा घमंड, बहुत कम सब्र, और कमरे के एक कोने में माचिस लिए खड़ा इज़रायल। लेकिन एक बात जो मैं अपने दिल की गहराइयों से जानता हूँ, वह यह है: एक और युद्ध ईरान को तोड़ नहीं पाएगा... ईरान टूटता नहीं है — वह सब कुछ अपने अंदर समेट लेता है, खुद को हालात के मुताबिक ढाल लेता है, और इंतज़ार करता है...।”
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