
क्या किसी भारतीय नागरिक के ‘छह या उससे ज्यादा’ बच्चे हों, तो महज इस आधार पर उसका मताधिकार छिन सकता है? जवाब है, हां- क्योंकि वाराणसी कैंट के 35 साल के वोटर सोनू गिरी के साथ यही हुआ। 6 जनवरी 2026 को वोटर लिस्ट का ड्राफ्ट जारी होने के कुछ समय बाद, सोनू को चुनाव आयोग से नोटिस मिला। इसमें उनके ‘छह या उससे ज्यादा’ बच्चे होने पर जवाब मांगा गया था। अंतिम मतदाता सूची में सोनू गिरी का नाम नहीं था।
सोनू अकेले नहीं हैं। ‘नवजीवन’ ने वाराणसी कैंट विधानसभा क्षेत्र के चार मतदान केन्द्रों- हमीदिया मदरसा, बजरडीहा (177); गोयनका संस्कृत महाविद्यालय, अस्सी संगम (345); मरकज़ी मदरसा अंसारुल उलूम, काज़ीपुरा खुर्द (15); और कन्या प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालय, संकुलधारा (228)- के 20 बूथों की मतदाता सूचियों की पड़ताल में पाया कि ऐसे आधारों पर बड़ी संख्या में नाम हटाए गए।
49 साल के गिरिजेश कुमार (अस्सी संगम) को भी नोटिस मिला, जिसमें ‘दादा-दादी से उम्र का अंतर 40 साल से कम’ और ‘छह या उससे ज्यादा बच्चे होने’ की वजह दर्ज थी। 38 साल के जितेंद्र मौर्य (संकुलधारा) को मिले नोटिस में ‘नाम में गड़बड़ी’ के साथ ‘छह या उससे ज्यादा बच्चे’ वाली वजह बताई गई।
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अंतिम मतदाता सूची में सोनू, गिरिजेश, जितेंद्र सहित हटाए गए कई वोटरों को ‘क्यू’ कैटेगरी में रखा गया- जिसका मतलब था ‘अयोग्य’। हटाए गए अन्य वोटरों को ‘ई’ (मृत), ‘एस’ (शिफ्टेड), ‘आर’ (दोबार/डुप्लीकेट), ‘एम’ (लापता) जैसे कोड दिए गए थे।
सोनू गिरी के बूथ हमीदिया मदरसा में आयोग ने 150 नाम हटाए, जिनमें 61 पुरुष और 89 महिलाएं थीं। कारणों में ‘अंतिम एसआईआर के साथ मैपिंग न होना’ (91 मतदाता) और ‘छह या उससे ज्यादा बच्चे’ (27 मतदाता) शामिल थे।
गोयनका संस्कृत महाविद्यालय में 78 महिलाओं सहित 187 मतदाताओं के नाम कटे। कारण: ‘मैप न होना’ (102 मतदाता), ‘दादा-पोते की उम्र में 40 साल से कम का अंतर’ (40) और ‘छह या उससे ज्यादा बच्चे’ (20)।
काज़ीपुरा खुर्द में 114 मतदाताओं (56 महिलाएं) के नाम हटे; 103 नाम इसलिए हटाए गए क्योंकि ‘अंतिम एसआईआर के साथ मैप नहीं किया जा सका’। कन्या प्राइमरी और अपर प्राइमरी गर्ल्स स्कूल में भी 57 नाम हटाए गए।
भारत निर्वाचन आयोग ने 28 जून 2025 को घोषणा की कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत, ‘सिर्फ 18 वर्ष से अधिक आयु के भारतीय नागरिक, जो किसी विधानसभा क्षेत्र के सामान्य निवासी हैं, ही मतदाता बन सकते हैं।’
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यूपी का एसआईआर दिखाता है कि चुनाव आयोग ने मतदाता पात्रता के मानदंड ही बदल डाले हैं। ‘छह या उससे अधिक बच्चे’ वाले आधार पर सवाल लाज़मी है, कि आयोग ने तय कैसे किया कि किसी के कितने बच्चे हैं? फार्म में बच्चों की संख्या तो पूछी नहीं गई थी; सिर्फ आधार, ईपीआईसी और मोबाइल नंबर के साथ मतदाता के पिता/अभिभावक, माता और पति के नाम पूछे गए थे।
मेरठ दक्षिण में एसआईआर के दौरान बीएलओ रहीं स्कूल टीचर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि उनकी नजर में ऐसे मामले हैं, जिनमें माता-पिता और वोटर की उम्र के बीच 15 साल से कम के अंतर पर नाम हटे। हालांकि छह या उससे ज्यादा बच्चे वाली वजह से नाम हटने की उन्हें कोई जानकारी नहीं।
नौ साल यूपी के मुख्य चुनाव अधिकारी के तौर पर काम कर चुके डॉ. नूर मोहम्मद कहते हैं- “ऐसा नहीं हो सकता! भारत में वयस्क मताधिकार प्रणाली लागू है। गणना के दौरान दिया गया डेटा महज ‘तार्किक विसंगतियों’ के आधार पर खारिज नहीं हो सकता। पात्रता तय करने का एकमात्र आधार न्यूनतम आयु की शर्त है।” उन्होंने कहा कि बच्चों की संख्या या अन्य विसंगति वाली बात बेमानी है।
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वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने 19 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में दलील दी, “ऐसे मापदंड के आधार पर ऐसी प्रोफाइलिंग, जिसे (आयोग ने) अभी-अभी गढ़ा है, अवांछनीय है। इसके लिए वैधानिक स्वीकृति कहां है? मतदाता सूची का संतान से क्या लेना-देना? ”
आयोग के वकील की दलील थी कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के रिकॉर्ड में ऐसे मतदाताओं की संख्या असामान्य रूप से ज्यादा मिली जिनके बच्चों की संख्या भी असामान्य रूप से ज्यादा थी: 4.59 लाख वोटरों के पांच से ज्यादा बच्चे थे, 2.06 लाख के छह से ज्यादा और 8,682 के 10 से ज्यादा। ‘द प्रिंट’ के अनुसार, आयोग का दावा तो यह भी था कि उसे 100 से ज्यादा बच्चे वाले वोटर भी मिले!
डॉ. नूर को यह सब बेतुका लगता है: पूरी प्रक्रिया ही संदिग्ध थी और इसे दोबारा किया जाना चाहिए।
वह बताते हैं- “पहले, फार्म-6 में वोटर से सिर्फ उसकी उम्र पूछते थे; 18 साल से ज्यादा उम्र का कोई भी व्यक्ति रजिस्टर हो सकता था। रिकॉर्ड न होने पर परिवार या गांव के मुखिया का बयान ही पर्याप्त होता। आपत्ति पर जांच होती। विवाद में डॉक्टर की राय मायने रखती। मुझे एक मामला पता है, जिसमें दो भाई-बहनों की उम्र का फर्क सिर्फ तीन महीने दर्ज था।” अब जिस शिक्षक ने जन्म की तारीखें दर्ज की थीं, स्वाभाविक है कि उसका ध्यान कहीं और रहा होगा।
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माता-पिता या दादा-दादी के साथ उम्र के अंतर पर उनका कहना है, “पिता के साथ 15 साल उम्र का अंतर दिखाना अपने आप में बेतुका है। क्या आयोग मान बैठा है कि अब बाल विवाह नहीं होते? ज्यादातर मामलों में, पिता और दादा की उम्र भी सही दर्ज नहीं होती।”
यूपी के सीईओ नवदीप रिणवा ने 10 अप्रैल को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि बिना उचित प्रक्रिया कोई नाम नहीं हटाया गया: “कोई नाम ड्राफ्ट लिस्ट में था, लेकिन फाइनल लिस्ट से गायब है, तो मतलब यह कि या तो उस वोटर के खिलाफ फॉर्म 7 भरा गया, या ईआरओ ने नोटिस पर सुनवाई के बाद हटाया।”
उन्होंने बताया कि 1.04 करोड़ मतदाता इसलिए हटाए गए क्योंकि वे अपनी ‘विरासत’ मैप करने में नाकाम रहे, और 2.22 करोड़ मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगतियों’ के कारण चिह्नित किया गया। 14 जनवरी 2026 से नोटिस भेजे गए और 27 मार्च तक सुनवाई पूरी की गई।
एसआईआर्र से पहले, यूपी में मतदाताओं की संख्या 15.44 करोड़ थी। मसौदा सूची में घटकर 12.55 करोड़ और अंतिम मतदाता सूची में 13.39 करोड़ रही।
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रिणवा ने बताया कि 6 जनवरी के बाद 8,15,999 नाम हटे। 3,50,436 नोटिस का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए, 3,28,350 लोग गैर-हाजिर थे या अन्यत्र चले गए थे, 79,076 लोग कहीं और रजिस्टर्ड थे और 55,865 लोगों की मृत्यु हो चुकी थी। 2,269 लोगों के नाम इसलिए हटे क्योंकि वे भारतीय नागरिक नहीं थे या उनकी उम्र 18 साल से कम थी।
उन्होंने इसपर कुछ नहीं कहा कि ड्राफ्ट लिस्ट के दौर में नाम कैसे हटे। एसआईआर ने यूपी में 2.05 करोड़ लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिया है।
पश्चिम बंगाल के विपरीत, जहां न्यायिक अधिकारियों को तार्किक विसंगतियां सुलझाने में लगाया गया था और एक न्यायाधिकरण अब भी 27 लाख अपीलों पर काम कर रहा है, यूपी के हटाए गए मतदाताओं को लेकर कुछ भी साफ नहीं है। रिणवा ने कहा है कि प्रभावित मतदाता ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ के तहत अपना नाम हटने के खिलाफ अपील कर सकते हैं। पहली अपील मतदाता सूची प्रकाशित होने के 15 दिनों के भीतर जिला मजिस्ट्रेट के सामने दायर हो सकती है, और दूसरी जिला मजिस्ट्रेट के आदेश के 30 दिनों के भीतर मुख्य निर्वाचन अधिकारी के सामने।
हालांकि, इसकी कोई खास उम्मीद नहीं है।
(*यूपी के सीईओ और चुनाव आयोग से हमारे ईमेल का जवाब मिलते ही हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे।)
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