
जंतर-मंतर मामले पर तुषार मेहता ने किया दिल्ली पुलिस का खंडन
सुप्रीम कोर्ट को बताया गृह मंत्रालय की समिति की रिपोर्ट पर किया गया डीनोटिफाई
सुनवाई के दौरान वकील ने जस्टिस जॉयमाल्य बागची को ट्रॉल किया
नई दिल्ली में जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगह के रूप में बहाल करने की मांग वाली याचिकाओं पर, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्रालय से जवाब मांगा। सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस के रुख से बिल्कुल उलट बात कहते हुए, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस बात से इनकार किया कि इस 'डी-नोटिफिकेशन' (अधिसूचना रद्द करने) का 9 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए मौखिक निर्देशों से कोई लेना-देना है। बता दें कि इससे पहले दिल्ली पुलिस ने हाई कोर्ट को बताया था कि यह 'डी-नोटिफिकेशन' सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद ही किया गया था।
सॉलिसिटर जनरल ने दावा किया कि गृह मंत्रालय ने एक समिति गठित की थी, जिसने एक रिपोर्ट सौंपी थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर जंतर-मंतर को 'डी-नोटिफाई' करने का निर्णय लिया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस निर्णय के पीछे के कारणों को दर्ज किया गया था।
उम्मीद है कि दिल्ली पुलिस और भारत सरकार के जवाबों से स्थिति स्पष्ट होगी और कई सवालों के जवाब मिलेंगे। सवाल हैं कि यह समिति कब गठित की गई थी? इसके सदस्य कौन थे? इसने अपनी रिपोर्ट कब सौंपी? क्या इसने संबंधित पक्षों से सलाह ली थी? अगर दिल्ली पुलिस के दावे को सच मान लिया जाए, तो समिति का गठन 10 अक्टूबर से पहले नहीं हुआ होगा (क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को यह टिप्पणी की थी कि सरकार अन्य जगहों पर विचार कर सकती है) और समिति ने बहुत तेज़ी दिखाते हुए सिर्फ दो दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंप दी।
जंतर-मंतर को 1993 में दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह घोषित किया गया था। ऐसा तब हुआ जब अधिकारियों ने सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए इंडिया गेट के पास 'बोट क्लब लॉन' में प्रदर्शन करने पर रोक लगा दी थी। इस बदलाव से एक ऐसी जगह तय हो गई जहां नागरिक इकट्ठा होकर विरोध-प्रदर्शन कर सकें, और साथ ही शहर के मुख्य प्रशासनिक इलाके में कामकाज में कम से कम रुकावट आए। इसके अलावा 28 अप्रैल 2022 को दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर नंबर एल एंड ओ/48/22 में भी जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगह के रूप में मान्यता दी गई और वहां प्रदर्शन करने के लिए कुछ नियम व शर्तें तय की गईं।
और अब, दिल्ली के पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार द्वारा 11 अक्टूबर 2026 को हस्ताक्षरित एक स्टैंडिंग ऑर्डर के ज़रिए जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगह के रूप में हटा दिया गया। यह फ़ैसला 12 अक्टूबर 2026 को सार्वजनिक किया गया। इसके विकल्प के तौर पर तीन जगहें तय की गईं - रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली में सीबीडी ग्राउंड और बुराड़ी का एक मैदान। ये सभी जगहें मध्य दिल्ली से 4 से 15 किलोमीटर की दूरी पर हैं। इसके अलावा, रामलीला मैदान और सीबीडी ग्राउंड का इस्तेमाल करने के लिए नगर निगम से अनुमति लेनी होगी और हर दिन 1.25 लाख रुपये तक की अलग-अलग फीस चुकानी होगी।
कहा जाता है कि रामलीला मैदान की क्षमता 50,000 लोगों की है, जबकि शाहदरा के सीबीडी ग्राउंड की15,000 और डीडीए के अधिकारक्षेत्र वाले बुराड़ी के मैदान की 80,000, जहां जंतर-मंतर की तुलना में कहीं अधिक भीड़ जुट सकती है। हालांकि, ये तीनों ही मैदान सशुल्क (पेड) हैं और रामलीला मैदान तो लगभग पूरे साल किसी न किसी कार्यक्रम के लिए बुक रहता है। यहां तक पहुँचना भी एक समस्या है; ऐसे में, बिना हफ्तों की योजना और काफी पैसे खर्च किए, अचानक बड़ी संख्या में लोगों का इकट्ठा होना लगभग असंभव होगा। यहां अचानक विरोध-प्रदर्शन (फ्लैश प्रोटेस्ट) करना तो बिल्कुल भी मुमकिन नहीं होगा।
हालाँकि नई जगहों पर बहुत बड़ी भीड़ जुट सकती है, लेकिन ये दिल्ली के राजनीतिक केंद्र से काफी दूर हैं। यहां किसी विरोध-प्रदर्शन को देखने में प्रभावशाली बनाने के लिए बहुत बड़ी संख्या में लोगों की ज़रूरत होती है। मसलन, 'इंडियन एक्सप्रेस' के एक विश्लेषण में बताया गया है कि जंतर-मंतर पर 3,000 लोगों के जुटने से जो 'पूरा भरा हुआ' दिखने का असर होता है, वैसा ही असर बुराड़ी में पैदा करने के लिए हज़ारों-लाखों लोगों की ज़रूरत पड़ेगी।
जंतर-मंतर को फिर से विरोध प्रदर्शन की जगह बनाने की याचिका वकील स्वाति सिंह ने दायर की है। इसमें तर्क दिया गया है कि विरोध प्रदर्शनों को दूर-दराज के इलाकों में स्थानांतरित करने से शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो सकते हैं। याचिका में कहा गया है कि विरोध करने का अधिकार केवल कहीं इकट्ठा होने का अधिकार नहीं है, बल्कि इसका मकसद सरकार और जनता तक अपनी बात पहुंचाना है। विरोध प्रदर्शनों को बाहरी इलाकों में भेजने से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने के संवैधानिक अधिकार कमजोर हो सकते हैं। जंतर-मंतर संसद, मंत्रालयों और मीडिया के करीब है, जिससे यहां होने वाले विरोध प्रदर्शनों को अधिक दृश्यता और प्रभाव मिलता है। इसमें यह भी कहा गया है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हमेशा पहले से तय नहीं होते, क्योंकि सरकार के किसी अचानक लिए गए फैसले के जवाब में भी विरोध प्रदर्शन शुरू हो सकता है।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि डी-नोटिफिकेशन का आदेश मनमाना है और इसमें प्रक्रियात्मक कमियां हैं। विशेष रूप से इसलिए, क्योंकि नए निर्धारित स्थानों के लिए संशोधित मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) अभी जारी नहीं की गई हैं, जिससे विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार के इस्तेमाल का ढांचा अनिश्चित और अधूरा रह गया है।
याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची, कुछ देर के लिए ट्रोल भी हो गए। उन्होंने टिप्पणी करते हुए याचिकाकर्ताओं को याद दिलाया कि डिजिटल तकनीक के इस दौर में दूरी कोई मायने नहीं रखती और दूर-दराज की जगहों से भी लोगों की बात सुनी जा सकती है, तो एक वकील ने तंज कसते हुए कहा, "अगर ऐसा है, तो हम दिल्ली में क्या कर रहे हैं? हम तो केरल में भी हो सकते थे।" याद दिला दें कि न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने ही एक बार सुनवाई के दौरान कहा था कि ‘एसआईआर के कारण मतदाता सूची से बाहर किए गए लोग अगले चुनाव में वोट डालने की उम्मीद रख सकते हैं।’
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भारत सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया और कहा कि वह इस बात की जांच करेगा कि जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन स्थल के रूप में हटाते समय क्या कोई सोच-विचार किया गया था या नहीं।