
कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR की संवैधानिक वैधता को मान तो लिया है, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने जितने जवाब दिए हैं, उतने ही प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं।
स्पष्ट किया गया है कि नागरिकता के विषय में अंतिम संस्था चुनाव आयोग नहीं है। इसमें नागरिकता एक्ट के अंदर निर्णायक संस्था competent authority, जैसे- गृह मंत्रालय आदि हैं। वहीं, ये भी कहा गया है कि चुनाव आयोग इस मुद्दे को सिर्फ प्रशासनिक रूप से डील कर सकता है।
इसमें ये भी लिखा है कि जहां नागरिकता का प्रश्न उठता है, वहां चुनाव आयोग को ये मुद्दा गृह मंत्रालय जैसी competent authority को रेफर करना होगा। ऐसे में उनका निर्णय बाध्य होगा।
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• देश के कई राज्यों में 7.5 करोड़ लोगों को नागरिकता का निर्णय लेने से पहले कैसे हटाया गया?
• इन करोड़ों लोगों का मताधिकार एक ऐसी संस्था द्वारा कैसे छीन लिया गया, जिसे ये अधिकार ही नहीं है?
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले में पैरा 97 से लेकर पैरा 101 तक पढ़ा जाए तो समझ आएगा कि चुनाव आयोग की गंभीर खामियां थीं और उनमें सुधार सिर्फ इसलिए आया, क्योंकि कई राजनीतिक दल, NGOs कोर्ट तक गए थे
• बिहार में 65 लाख निष्काषित डिलीशन हुए थे, उनके नाम दोबारा प्रकाशित करना और उसका कारण देना भी इसलिए संभव हो पाया क्योंकि कई राजनीतिक दल, NGOs ने इस मामले में याचिका दी थी
• अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक पार्टियों को हाईकोर्ट द्वारा पार्टी बनाया गया, फिर BLAs और पैरालीगल को शामिल किया गया- ये सिखाने और बताने के लिए कि फॉर्म कैसे भरा जाता है। इसका मतलब ये है कि चुनाव आयोग ने जल्दबाजी में खामियों के साथ एक प्रोग्राम लॉन्च किया।
अगर ये प्रोग्राम बिना सिविल सोसायटी के हस्तक्षेप और बिना राजनीतिक दलों, NGOs की याचिकाओं के चलने दिया जाता तो खामियां रहतीं। इसमें सुधार सिर्फ इसलिए हो पाया, क्योंकि इन संस्थाओं ने इसकी मांग की थी। मगर दुखद है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की खामियों पर कोई टिप्पणी नहीं की।
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SIR में एक मूल गलती है, जिसके ऊपर सुप्रीम कोर्ट ने कोई कमेंट नहीं किया है- वो है बेहद कम समय सीमा।
⦁ बिहार में SIR के लिए 4 महीने दिए गए
⦁ पश्चिम बंगाल में SIR के लिए 5 महीने दिए गए
ऐसे में अगर SIR को आने वाले चुनावों के लिए शुरू किया जाता, तो ये समस्याएं नहीं होती। दुर्भाग्य है कि इस मुद्दे पर चुनाव आयोग ने कुछ नहीं कहा।
वहीं, चुनाव आयोग लोगों को वोटर लिस्ट से पहले हटाता है और निर्णय बाद में आता है, इसके बीच में चुनाव हो जाता है- सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में भी चुनाव आयोग को जिम्मेदार नहीं ठहराया है।
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