
राजस्थान में 309 शहरी स्थानीय निकायों के चुनावों के परिणाम आज घोषित किए जाएंगे। इसके साथ ही 38,889 उम्मीदवारों के चुनावी भाग्य का फैसला होगा और 10 नगर निगमों, 47 नगर परिषदों तथा 252 नगर पालिकाओं में शासी बोर्डों के गठन का रास्ता साफ होगा। मतगणना सुबह 8 बजे शुरू हो गई है और सभी शहरी स्थानीय निकायों के परिणाम दोपहर तक घोषित होने की उम्मीद है।
राजस्थान में चुनाव दो चरणों में 9 और 11 सितंबर को हुए थे। सोमवार को पूरे राज्य में एक साथ मतगणना हो रही है। अधिकांश शहरी स्थानीय निकायों में वोटों की गिनती संबंधित मुख्यालयों पर की जा रही है, जबकि बीकानेर में मतगणना जिला मुख्यालयों में हो रही है। दोनों चरणों में कुल 73.56 प्रतिशत मतदान हुआ, जो पिछले शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के मुकाबले तीन प्रतिशत से अधिक है।
इस चुनाव में प्रमुख राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के अलावा बड़ी संख्या में निर्दलीय भी मैदान में हैं। भाजपा ने 9,290 और कांग्रेस ने 9,027 उम्मीदवार उतारे हैं। निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या 18,732 है। इनके अलावा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के 948, आम आदमी पार्टी (आप) के 311, बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के 298, सीपीआई (एम) के 185 और भारतीय आदिवासी पार्टी (बीएपी) के 98 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं।
निर्दलीय उम्मीदवारों की इतनी बड़ी संख्या चुनाव के बाद शासी बोर्डों के गठन में अहम भूमिका निभा सकती है। खासकर उन शहरी स्थानीय निकायों में जहां मुकाबला कड़ा है और किसी भी प्रमुख पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, वहां निर्दलीय उम्मीदवारों का रुख बोर्ड गठन के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
राज्य चुनाव आयोग ने मतगणना के परिणाम और अपडेट अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करने की व्यवस्था की है। जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ेगी, शहरवार और शहरी निकायवार तस्वीर भी सामने आती जाएगी।
राजस्थान में पहली बार 'एक राज्य-एक चुनाव' मॉडल के तहत सभी 309 शहरी स्थानीय निकायों के परिणाम एक साथ घोषित किए जा रहे हैं। इससे पहले शहरी स्थानीय निकाय चुनाव अलग-अलग चरणों में होते थे और पूरी चुनावी प्रक्रिया एक साल से अधिक समय तक चलती थी। ऐसे में सोमवार के नतीजे यह शुरुआती संकेत भी देंगे कि एक साथ चुनाव कराने का नया मॉडल स्थानीय निकायों की पारंपरिक राजनीतिक गतिशीलता को कितना प्रभावित करता है।
नतीजों की एक साथ घोषणा के बाद राजनीतिक दलों के सामने बहुमत जुटाने की चुनौती भी रहेगी। खासतौर पर त्रिशंकु स्थिति वाले निकायों में बोर्ड गठन के लिए आपसी बातचीत करनी पड़ सकती है और पार्टियों को इसके लिए बहुत कम समय मिलने की संभावना है।