
संसद की विदेश मामलों की समिति ने कहा है कि हाल के घटनाक्रम से भारत के लिए महत्वपूर्ण और रणनीतिक महत्व वाले चाबहार बंदरगाह के भविष्य पर संकट के बादल छा गए हैं। हालांकि, समिति ने इस बात का स्वागत किया कि केंद्र इन घटनाक्रमों के प्रभावों को दूर करने के लिए सभी संबंधित पक्षों के संपर्क में है।
विदेश मंत्रालय की अनुदान मांगों (2026-27) पर विदेश मामलों की समिति की 12वीं रिपोर्ट मंगलवार को संसद में प्रस्तुत की गई। कांग्रेस सांसद शशि थरूर विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष हैं। समिति की यह टिप्पणी काफी मायने रखती है क्योंकि यह पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और चाबहार परियोजना में भारत की भागीदारी पर अमेरिकी प्रतिबंधों या ‘टैरिफ’ नीतियों में हाल ही में हुए बदलावों की पृष्ठभूमि में आई है।
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रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘समिति ने पाया कि चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए वर्ष 2025-26 के बजट अनुमान में 100 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिसे संशोधित अनुमान में बढ़ाकर 400 करोड़ रुपये कर दिया गया था। जनवरी 2026 तक आवंटित राशि का पूरी तरह से उपयोग हो चुका था।’’
विदेश मंत्रालय ने समिति को बताया कि ‘‘2026-27 के दौरान इस मद के तहत कोई राशि आवंटित नहीं की गई है क्योंकि भारत ने 2024 में हस्ताक्षरित मुख्य अनुबंध के अनुसार बंदरगाह उपकरणों की खरीद के लिए 12 करोड़ अमेरिकी डॉलर के योगदान की अपनी प्रतिबद्धता पहले ही पूरी कर ली है।’’
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रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘हाल के घटनाक्रम से चाबहार बंदरगाह के भविष्य पर संकट के बादल छा गए हैं।’’ समिति का मानना है कि चाबहार, भारत के लिए एक ‘‘महत्वपूर्ण और रणनीतिक महत्व का बंदरगाह’’ है, क्योंकि यह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करता है। यह अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा से जुड़ने के लिए भी एक महत्वपूर्ण बंदरगाह है।
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समिति ने कहा कि वह इस बात का स्वागत करती है कि भारत सरकार इन घटनाक्रमों के प्रभावों को दूर करने के लिए सभी संबंधित पक्षों के साथ निरंतर संपर्क में है। रिपोर्ट के अनुसार, समिति चाहती है कि मंत्रालय इस संबंध में सभी योजनाओं और प्रगति की जानकारी समिति को देते रहे। सरकार ने पांच फरवरी को संसद को बताया था कि वह चाबहार परियोजना में भारत की भागीदारी पर अमेरिकी प्रतिबंधों या टैरिफ नीतियों में हाल में हुए बदलावों के प्रभावों को दूर करने के लिए सभी संबंधित पक्षों के संपर्क में है।
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