
देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा पाने वाले इंदौर में अगर नल खोलते ही गंदा, बदबूदार और जहरीला पानी निकले, तो इसे महज बदकिस्मती नहीं कहा जा सकता। यह एक ऐसी सरकारी और प्रशासनिक विफलता है, जो फाइलों में उलझे फैसलों और जमीन पर न उतरे कामों की कीमत लोगों की जान से वसूलती है।
'न्यूज़ 18' की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कई महीनों से इंदौर के अलग-अलग इलाकों में दूषित पानी की शिकायतें सामने आती रहीं। रिपोर्ट के मुताबिक, हालात इतने गंभीर थे कि सिर्फ दिसंबर महीने में ही नगर निगम को 300 से ज्यादा शिकायतें मिलीं, लेकिन ज्यादातर मामलों में समाधान कागजो से आगे नहीं बढ़ सका।
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'न्यूज़ 18' के अनुसार, सबसे भयावह स्थिति भागीरथपुरा (जोन-4) में देखने को मिली। यहां अकेले 23 से अधिक शिकायतें दर्ज कराई गईं। स्थानिय लोगों ने बार-बार बताया कि पानी पीने लायक नहीं है, उसमें बदबू है और रंग भी बदला हुआ है। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचने की बजाय फाइलों के भीतर समाधान तलाशते रहे।
इस देरी की कीमत इलाके के लोगों ने चुकाई। बीमारियां फैलीं, स्वास्थ्य बिगड़ा और अंततः मौतें तक हो गईं।
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भागीरथपुरा में नई नर्मदा पाइपलाइन डालने का मामला नया नहीं था। यह फाइलों में साल 2022 से घूम रहा था, लेकिन जमीनी काम शुरू नहीं हो सका।
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25 नवंबर 2022 को नगर निगम की एमआईसी बैठक में प्रस्ताव क्रमांक 106 सर्वसम्मति से पास हुआ। तय हुआ कि भागीरथपुरा में नर्मदा पाइपलाइन बिछाई जाएगी और नए कनेक्शन दिए जाएंगे। इसके लिए मालवा इंजीनियरिंग एजेंसी का चयन भी कर लिया गया। लेकिन इसके बाद फाइल परिषद कार्यालय में ही अटक गई।
जनवरी 2023 में आयुक्त कार्यालय और फरवरी 2023 में अपर आयुक्त कार्यालय से हस्ताक्षर हुए। यानी सिर्फ एक फाइल को मेज दर मेज घूमने में चार महीने लग गए, और काम वहीं ठहर गया।
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गंदे पानी की शिकायतें लगातार बढ़ती रहीं। आखिरकार 12 नवंबर 2024 को जलकार्य विभाग ने नई पाइपलाइन के लिए टेंडर प्रक्रिया की फाइल बनाई। लेकिन नगर निगम ने पूरे 7 महीने बाद, 30 जुलाई 2025 को जाकर टेंडर जारी किए।
टेंडर प्रक्रिया पूरी हुई, एजेंसी भी फाइनल हो गई, लेकिन वर्क ऑर्डर जारी नहीं हुआ। पांच महीने बीत गए, लेकिन जमीन पर एक इंच भी पाइपलाइन नहीं बिछाई जा सकी।
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जब भागीरथपुरा में हालात बेकाबू हो गए और मामला मीडिया और प्रशासन तक पहुंचा, तब अचानक फाइलों पर रफ्तार आई। बुधवार को जलप्रदाय शाखा के प्रभारी ने कई लंबित फाइलें मंगवाईं और एक साथ हस्ताक्षर किए। इनमें वर्क ऑर्डर से जुड़ी फाइलें भी शामिल थीं, जो लंबे समय से सिर्फ साइन का इंतजार कर रही थीं। अब सवाल यह है कि अगर यह काम पहले हो जाता, तो क्या लोगों की जान जाती?
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भागीरथपुरा में बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े, तब मंगलवार को अधिकारी मौके पर पहुंचे। दावा किया गया कि 7 दिनों में समानांतर पाइपलाइन डाली जाएगी। जल्द पानी की सप्लाई शुरू होगी।
स्थानिय लोगों का सवाल-
जो तेजी अब दिखाई जा रही है, वह पहले क्यों नहीं दिखाई गई?
अखिर प्रशासन क्या कर रहा था?
सरकार क्या कर रही थी, समय से क्यों नहीं उठाए गए कदम?
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जलप्रदाय शाखा की कार्यप्रणाली पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। वर्तमान में इसके प्रभारी कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव हैं, जो 10 साल से अधिक समय से इंदौर में पदस्थ हैं। उन्हें नर्मदा लाइन का विशेषज्ञ माना जाता है।
इसके बावजूद शहर में पानी की समस्या लगातार बनी रही। अब जांच और जिम्मेदारी तय करने की बातें हो रही हैं, लेकिन हकीकत यह है कि कई विभागों की संयुक्त लापरवाही ने इस संकट को जन्म दिया।
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2022: नर्मदा लाइन बदलने की पहली शिकायत
2023-2024: मामला सिर्फ फाइलों में चलता रहा
2025: नल के पानी में सीवरेज मिला, बीमारियां फैलीं
जांच में पानी के दूषित होने की पुष्टि हुई।
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प्रशासन के अनुसार अब तक 8 मौतों की जानकारी सामने आई है।
4 मौतें सीधे तौर पर दूषित पानी से जुड़ी
4 को प्राकृतिक मृत्यु बताया गया
इस घटना ने नगर निगम की जल आपूर्ति व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने दूषित पानी से हुई 14 मौतों के मामले में आर्थिक सहायता की घोषणा की। लेकिन कई परिजनों ने मुआवजे का चेक लेने से इनकार कर दिया।
परिजनों का कहना है, “हमें पैसे नहीं, जिम्मेदारों पर कार्रवाई चाहिए।” अब यह मामला सिर्फ मुआवजे का नहीं, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही तय करने का बन चुका है।
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फाइलें समय पर क्यों नहीं चलीं?
वर्क ऑर्डर जानबूझकर क्यों रोका गया?
क्या दोषियों पर सच में कार्रवाई होगी?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक इंदौर की यह त्रासदी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि प्रशासनिक चेतावनी बनी रहेगी।
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