
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्रीय मंत्रिमंडल के उस फैसले पर आपत्ति जताई है जिसमें 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान वैधानिक संरक्षण दिया गया है।
ओवैसी ने कहा कि इस गीत को राष्ट्रगान के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह एक देवी को समर्पित गीत है। ओवैसी ने कहा कि राष्ट्र किसी देवी-देवता के नाम पर नहीं चलता और न ही यह किसी एक देवी-देवता का है।
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बृहस्पतिवार को ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा, "जन गण मन भारत और उसके लोगों का उत्सव मनाता है, न कि किसी विशेष धर्म का। धर्म राष्ट्र के बराबर नहीं है। वंदे मातरम लिखने वाला व्यक्ति ब्रिटिश राज के प्रति सहानुभूति रखता था और मुसलमानों से घृणा करता था। नेताजी बोस, गांधी, नेहरू और टैगोर सभी ने इसे अस्वीकार किया।’’
भारत के संविधान का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि प्रस्तावना की शुरुआत "हम लोग" से होती है, न कि "भारत मां" से। यह "विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा की स्वतंत्रता" का वचन देता है।उन्होंने कहा कि संविधान का पहला प्रावधान, अनुच्छेद एक, "इंडिया जो कि भारत है’’ को राज्यों के संघ के रूप में वर्णित करता है।
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औवैसी ने कहा कि संविधान सभा में, कुछ सदस्यों ने प्रस्तावना की शुरुआत किसी देवी के नाम से करने की इच्छा जताई और उन्होंने विशेष रूप से वंदे मातरम का उल्लेख किया। अन्य सदस्यों ने प्रस्तावना की शुरुआत "ईश्वर के नाम पर" से करने और "इसके नागरिकों" के स्थान पर "उसके नागरिकों" का प्रयोग करने की इच्छा व्यक्त की, हालांकि ये सभी संशोधन खारिज कर दिए गए।
उन्होंने कहा, ‘‘इंडिया यानी भारत, अपने लोगों से बना है। यह राष्ट्र कोई देवी नहीं है, यह किसी देवी-देवता के नाम पर नहीं चलता और न ही यह किसी एक देवी-देवता का है।’’
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इसी बीच, तेलंगाना भाजपा अध्यक्ष एन रामचंदर राव ने सरकार के फैसले पर ओवैसी की आपत्तियों पर असहमति जताते हुए कहा कि एआईएमआईएम नेतृत्व किसी भी प्रकार के सांस्कृतिक एकीकरण को धार्मिक विशिष्टता के लिए खतरा मानता है।
उन्होंने कहा कि यह सिर्फ ओवैसी तक ही सीमित नहीं है, जिन्ना ने भी इसी राह का अनुसरण किया था।
उन्होंने कहा कि जिन्ना ने कांग्रेस सदस्य के रूप में अपने राजनीतिक करियर के शुरुआती चरण में वंदे मातरम का विरोध नहीं किया था, और उनका विरोध कांग्रेस छोड़ने के बाद ही सामने आया।
राव ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘ इससे हमें क्या पता चलता है? एक बार जब राजनीति धार्मिक विशिष्टता पर निर्भर हो जाती है, तो सभ्यता के हर प्रतीक को खतरे के रूप में चित्रित किया जाता है।
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