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'कहीं जगह की कमी, कहीं आधार वेरिफिकेशन की अड़चन', बंगाल SIR में जजों ने खोली चुनाव आयोग की पोल!

पश्चिम बंगाल में SIR अपीलों पर सुनवाई कर रहे जजों ने आधार वेरिफिकेशन से आदेश अपलोड करने में परेशानी और ट्रिब्यूनल की बदहाल व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

  • बंगाल SIR अपीलों के अंतिम आदेश आधार वेरिफिकेशन की तकनीकी समस्या के कारण पोर्टल पर अपलोड नहीं हो पा रहे हैं।

  • जजों ने ट्रिब्यूनल में जगह और बुनियादी सुविधाओं की कमी पर चुनाव आयोग से शिकायत की है।

  • न्यायाधीशों ने साप्ताहिक मानदेय ₹25,000 से बढ़ाकर ₹50,000 करने की मांग की है।

  • SIR से जुड़ी 38.31 लाख अपीलें दाखिल हुई थीं, जिनमें 10 सितंबर तक केवल 1.26 लाख पर फैसला हुआ था।

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से प्रभावित लोगों की अपीलों पर सुनवाई कर रहे न्यायाधीशों ने चुनाव आयोग की डिजिटल व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पोर्टल पर आधार प्रमाणीकरण अनिवार्य किए जाने के कारण वे अपीलों पर अंतिम आदेश जारी करने के बाद उन्हें ऑनलाइन अपलोड नहीं कर पा रहे हैं। 'द इंडियन एक्सप्रेस' को मिले आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, न्यायाधीशों ने पिछले चार हफ्तों में कम से कम दो बार यह समस्या उठाई और इसे दूर करने की मांग की है।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब पश्चिम बंगाल में SIR के तहत मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ बड़ी संख्या में अपीलें दाखिल हुई हैं। न्यायाधीशों ने तकनीकी खामियों के साथ-साथ ट्रिब्यूनल में कामकाज की खराब परिस्थितियों पर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि सीमित जगह, बुनियादी सुविधाओं की कमी और मानदेय से जुड़ी समस्याएं न्यायिक कामकाज को प्रभावित कर रही हैं।

आधार वेरिफिकेशन की अनिवार्यता पर जजों ने उठाए सवाल

चुनाव आयोग के आईटी विभाग ने SIR से जुड़ी अपीलों की सुनवाई के लिए अलग डिजिटल पोर्टल तैयार किया है। सितंबर में इसके नए संस्करण की जानकारी न्यायाधीशों को दी गई थी। 21 सितंबर को आधार प्रमाणीकरण का विकल्प शुरू होने के तीन दिन बाद, 24 सितंबर को ट्रिब्यूनल के प्रभारी ने चुनाव आयोग के अधिकारियों को पत्र लिखकर इस व्यवस्था को हटाने की मांग की। पत्र में कहा गया कि अंतिम आदेश जारी करने के लिए पोर्टल पर आधार वेरिफिकेशन की स्क्रीन हटाई जानी चाहिए।

इसके बाद 12 अक्टूबर को मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय ने एक अपील पर फैसला करने का अनुरोध भेजा। अगले दिन, 13 अक्टूबर को ट्रिब्यूनल के प्रभारी ने जवाब दिया कि मौजूदा सिस्टम में अंतिम आदेश अपलोड करने की सुविधा काम नहीं कर रही है। उन्होंने बताया कि इस समस्या के बारे में 24 सितंबर को ही आयोग को सूचित कर दिया गया था। ट्रिब्यूनल ने एक बार फिर व्यवस्था दुरुस्त करने का अनुरोध किया, ताकि अपीलों पर सुनवाई और आदेश अपलोड करने का काम सुचारु रूप से हो सके।

पोर्टल में दूसरी तकनीकी सीमाओं की शिकायत भी की गई थी। 7 अक्टूबर को प्रकाशित 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, एक दर्जन से अधिक ट्रिब्यूनल के न्यायाधीशों ने शिकायत की थी कि पोर्टल पर संबंधित लोगों को नोटिस भेजने, अपील के साथ अतिरिक्त दस्तावेज अपलोड करने और ऑनलाइन सुनवाई करने की सुविधा नहीं थी। हटाए गए मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने तथा अपीलकर्ताओं को ट्रिब्यूनल के आदेश डाउनलोड करने की व्यवस्था भी उपलब्ध नहीं थी।

11 अगस्त को हुई बैठक के मिनट्स में इन कमियों का उल्लेख किया गया था। ये रिकॉर्ड चुनाव आयोग और कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी भेजे गए थे। इसके बाद आयोग ने पोर्टल में कुछ बदलाव किए। हालांकि, 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने सूत्रों के हवाले से बताया कि 21 सितंबर को आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए नए पोर्टल की जानकारी देते समय न्यायाधीशों को यह नहीं बताया कि अंतिम आदेश अपलोड करने से पहले निजी आधार नंबर से वेरिफिकेशन करना होगा। इसके अलावा, जजों को अपीलकर्ताओं से केवल चुनाव आयोग द्वारा मान्य 13 तरह के दस्तावेज स्वीकार करने की अनुमति थी।

छोटे कमरों में काम, सुविधाओं की कमी और मानदेय पर नाराजगी

तकनीकी खामियों के अलावा न्यायाधीशों ने ट्रिब्यूनल में काम करने की परिस्थितियों पर भी सवाल उठाए हैं। 1 अक्टूबर को 10 न्यायाधीशों ने चुनाव आयोग और कलकत्ता हाई कोर्ट के सामने अपनी समस्याएं रखीं। उन्होंने बताया कि करीब 12×10 वर्ग फुट के कमरे में सात से आठ कर्मचारियों के साथ काम करना पड़ रहा है। पूरे दिन कंप्यूटर पर काम करने वाले कर्मचारियों के कारण जगह इतनी कम पड़ जाती है कि आराम करने की भी पर्याप्त सुविधा नहीं रहती। न्यायाधीशों ने अलग कमरे और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी का भी जिक्र किया।

न्यायाधीशों के मुताबिक, जोका में बनाए गए ट्रिब्यूनल कोलकाता और न्यू टाउन से करीब 30 किलोमीटर दूर हैं। वहां पहुंचने में दो से तीन घंटे लग जाते हैं और रास्तों की हालत भी ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने के बाद ट्रिब्यूनल जल्दबाजी में बनाए गए थे। लोगों की नाराजगी कम करने के लिए सुनवाई स्थल और कोर्ट रूम बहुत कम समय में तैयार किए गए। केंद्र सरकार की जोका स्थित एक खाली इमारत में 19 अपील ट्रिब्यूनल बनाए गए थे, जिन्हें कुछ महीनों के लिए अस्थायी व्यवस्था के तौर पर शुरू किया गया था।

मानदेय को लेकर भी न्यायाधीशों ने नाराजगी जताई है। फिलहाल उन्हें हर सप्ताह 25,000 रुपये दिए जा रहे हैं। उन्होंने इसे बढ़ाकर 50,000 रुपये प्रति सप्ताह करने की मांग की है। यह मांग जून से मुख्य न्यायाधीश के पास लंबित बताई गई है। न्यायाधीशों ने ट्रिब्यूनल को कोलकाता के किसी केंद्रीय स्थान पर स्थानांतरित करने, कामकाज के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने और कर्मचारियों को अतिरिक्त भुगतान देने का भी सुझाव दिया है। उनका कहना है कि मौजूदा मानदेय उनके पद और न्यायिक गरिमा के अनुरूप नहीं है।

SIR के तहत लाखों नाम हटे, 38.31 लाख अपीलें दाखिल

पश्चिम बंगाल में SIR की प्रक्रिया दूसरे राज्यों से अलग रही। चुनाव आयोग ने पिछले साल अक्टूबर से नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण शुरू किया था। लेकिन पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार और आयोग के बीच भरोसे की कमी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया। अदालत ने मतदाताओं की पात्रता से जुड़े मामलों की जांच न्यायिक अधिकारियों से कराने का निर्देश दिया।

इसके बाद सैकड़ों न्यायिक अधिकारियों ने चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर द्वारा चिह्नित 60.06 लाख मतदाताओं के मामलों की जांच की। इन मतदाताओं के रिकॉर्ड में सॉफ्टवेयर ने तार्किक गड़बड़ियां बताई थीं। जांच के बाद न्यायिक अधिकारियों ने 27.16 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाने का आदेश दिया। ये नाम अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनाव से कुछ ही सप्ताह पहले हटाए गए।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को अपील ट्रिब्यूनल बनाने का आदेश दिया। इन ट्रिब्यूनल में हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को नियुक्त किया गया, ताकि मतदाता सूची से नाम हटाए गए लोग फैसले के खिलाफ अपील कर सकें। पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ी अपीलों की सुनवाई के लिए चुनाव आयोग ने 19 पूर्व न्यायाधीशों को नियुक्त किया।

चुनाव आयोग ने 18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि अब तक 38.31 लाख अपीलें दाखिल हो चुकी हैं। इनमें 22.21 लाख अपीलें उन लोगों की थीं जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे, जबकि 16.10 लाख अपीलें मतदाता सूची में नए नाम शामिल किए जाने के खिलाफ थीं। आयोग के मुताबिक, 10 सितंबर तक केवल 1.26 लाख अपीलों पर ही फैसला हो पाया था।

इस बीच, 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने 21 अक्टूबर को चुनाव आयोग के प्रवक्ता को ईमेल भेजकर पोर्टल की खामियों और ट्रिब्यूनल की व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों पर जवाब मांगा था। रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग की ओर से कोई जवाब नहीं मिला। तकनीकी समस्याओं और कामकाज की परिस्थितियों को लेकर न्यायाधीशों की शिकायतें ऐसे समय सामने आई हैं, जब SIR से प्रभावित मतदाताओं की अपीलों के निपटारे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण चरण में है।

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