
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रवक्ता सौरव दास ने दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के निर्देश नंबर 4 को लेकर पूरे देश में खतरे की घंटी बजनी चाहिए। इस निर्देश में कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर कार्रवाई जारी रखने और जांच करने की अनुमति दी गई है।
सौरव दास ने कहा है कि यह निर्देश भारत सरकार द्वारा 25 जुलाई 2026 को देश के युवाओं को दिए गए उस पक्के आश्वासन और गारंटी के बिल्कुल उलट है, जिसमें कहा गया था कि सभी एफआईआर वापस ले ली जाएंगी और शांतिपूर्ण आंदोलन में हिस्सा लेने वाले किसी भी प्रदर्शनकारी को सीधे या परोक्ष रूप से निशाना नहीं बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि उसी पक्के भरोसे और पूरी नेक नीयती के साथ, कॉकरोच जनता पार्टी ने अपना देशव्यापी विरोध प्रदर्शन वापस लिया था।
सौरव दास ने आगे कहा, “अब हमें पक्का शक है कि भारत सरकार और बीजेपी शासित राज्य, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच के इस आदेश का इस्तेमाल और उसे हथियार बनाकर, प्रदर्शन करने वाले लोगों के खिलाफ एफआईआर जारी रख सकते हैं और उन्हें परेशान कर सकते हैं। शुरू से ही हमारी यही चिंता थी कि शांतिपूर्ण विरोध को निशाना बनाकर राजनीतिक मकसद पूरे करने के लिए अदालतों का इस्तेमाल सीधे या परोक्ष रूप से किया जा सकता है।“
सीजेपी प्रवक्ता ने कहा कि यह भी उतनी ही चिंता की बात है कि सरकार के वकीलों ने इस अंतरिम आदेश का विरोध नहीं किया, जबकि केंद्र सरकार को अच्छी तरह पता था कि सीजेपी के साथ बातचीत और आश्वासन का दौर कल देर रात तक जारी रहा था और 25 जुलाई को ही एक पक्का समझौता हो चुका था। इसलिए, गारंटी और आश्वास की जानकारी के बिना दिया गया अदालत का आदेश पूरी तरह से अस्वीकार्य है।
सौरव दास ने कहा कि हजारों युवा छात्रों और प्रदर्शनकारियों को गंभीरता के साथ दिए गए सार्वजनिक आश्वासन को बाद की कानूनी गतिविधियों के जरिए चुपके से कमजोर, हल्का या बेमतलब नहीं किया जा सकता। इससे सिर्फ जनता का भरोसा टूटता है।
उन्होंने कहा कि किसी भी स्थिति में, अंतरिम आदेश में ऐसी कोई बात नहीं है जो भारत सरकार या बीजेपी/एनडीए शासित राज्य सरकारों को एफआईआर वापस लेने या शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई न करने का फैसला करने से रोके– जैसा कि बिहार और असम की सरकारों ने किया है। ऐसे मामलों को वापस लेने या उन पर आगे कार्रवाई न करने का अधिकार कार्यपालिका यानी सरकारों के पास ही बना हुआ है। अदालत ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया है कि सरकारों को एफआईआर पर कार्रवाई जारी रखनी ही होगी। ऐसा समझना जानबूझकर गलत अर्थ निकालना होगा। सरकार को 25 जुलाई को किए गए अपने वादे से पीछे हटने के लिए अदालत के आदेश का बहाना नहीं बनाना चाहिए।
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इन सारे तथ्यों के मद्देनजर सीजेपी ने मांग की है कि भारत सरकार और संबंधित बीजेपी/एनडीए की राज्य सरकारें, इस गंभीर आश्वासन की शर्तों को तुरंत सुप्रीम कोर्ट के सामने चल रही कार्यवाही में रखें, ताकि देश के युवाओं से किए गए वादों के बारे में पूरी पारदर्शिता बनी रहे और कोर्ट भविष्य में इस पर उसी प्रकार कोई आदेश दे सके।
उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं ने नेक नीयत से यह समझौता किया था। उस भरोसे को तोड़ा नहीं जाना चाहिए। संवैधानिक महत्व वाले संस्थानों का कभी भी राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए और न ही गारंटियों से मुकरने के लिए उनका हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
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सीजेपी ने याद दिलाया है कि भारत सरकार के लिए अपनी गारंटियों को पूरा करने की समय-सीमा आज खत्म हो रही है। सीजेपी ने कहा है कि “हम सरकार से अपील करते हैं कि वह अपने सभी वादे पूरे करे: एफआईआर वापस ले, यह सुनिश्चित करे कि किसी भी प्रदर्शनकारी के खिलाफ भविष्य में कोई दंडात्मक कार्रवाई न हो, और उस आश्वासन का अक्षरशः और उसकी मूल भावना के अनुरूप पालन करे, जिसके कारण यह प्रदर्शन समाप्त हुआ था।“
सीजेपी ने चेतावनी भी दी है कि अगर ऐसा नहीं हुआ, और जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, तो 'कॉकरोच जनता पार्टी' के पास उन छात्रों और युवा प्रदर्शनकारियों के बचाव में अपना देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन फिर से शुरू करने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा, जो न सिर्फ़ अपने लिए, बल्कि इस देश के भविष्य के लिए खड़े हुए थे। पार्टी ने कहा कि ”जो सरकार अपना वादा तोड़ती है, वह युवाओं के चुप रहने की उम्मीद नहीं कर सकती। अगर गारंटियों का सम्मान नहीं किया गया, तो भारत की सड़कें एक बार फिर युवाओं की आवाज बन जाएंगी।“
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