विचार

भारत में कभी भी आ सकती है नेपाल जैसी आपदा, हिमालय को पीएम मोदी की नीतियों से सबसे बड़ा खतरा

दुनिया का तापमान बढ़ रहा है, ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और वैश्विक स्तर पर नदियों के बहाव में अंतर आ रहा है। नदियों में पानी की कमी से पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है और समाज में अस्थिरता बढ़ रही है। इन सबके बीच सारी सरकारें सो रही हैं।

भारत में कभी भी आ सकती है नेपाल जैसी आपदा, हिमालय को पीएम मोदी की नीतियों से सबसे बड़ा खतरा
भारत में कभी भी आ सकती है नेपाल जैसी आपदा, हिमालय को पीएम मोदी की नीतियों से सबसे बड़ा खतरा फोटोः महेंद्र पांडे

नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को अचानक आए फ्लैश फ्लड ने जिस तरह तबाही मचाई और जान-माल का नुकसान पहुंचाया, वैसी आपदा भारत में कभी भी आ सकती है। तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अतिरिक्त हमारे क्षेत्र के हिमालय को सबसे बड़ा खतरा प्रधानमंत्री मोदी के इंफ्रास्ट्रक्चर के संदर्भ में विस्तारवादी नीतियों से है। वर्ष 2014 के बाद से हिमालय को प्राकृतिक तौर पर एक संवेदनशील क्षेत्र कभी समझा ही नहीं गया, बल्कि एक ऐसा इलाका समझा गया, जहां एक्स्प्रेसवे, हाईवे, पुलों, टनेल, बांधों, पनबिजली योजनाओं और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का जाल बिछाया जा सकता है।

केदारनाथ की घटना से भी हमने सबक नहीं लिया

वर्ष 2016 के केदारनाथ की घटना से भी हमने कोई सबक नहीं लिया। दूसरे देशों में अब प्रमुख पर्यटन स्थलों पर सैलानियों की संख्या में सख्ती से कटौती की जा रही है, वहीं हमारी सरकारें हिमालय के पर्यटन स्थलों पर बेकाबू होती भीड़ के आंकड़ों पर अपनी पीठ थपथपाती हैं, इसे उपलब्धि प्रचारित करती हैं। एक्स्प्रेसवे और हाईवे को “आल वेदर” बताया जाता है, पर भूस्खलन की बढ़ती दर से इन्हें कभी भी बंद करना पड़ता है। हिमालय के अनेक हिस्सों में लगातार विभिन्न प्रकार की आपदाएं आ रही हैं, पर खबरें दबा दी जाती हैं।

नेपाल त्रासदी का प्रमुख कारण तापमान वृद्धि

नेपाल में 26 अगस्त की त्रासदी में 1300 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई और 5000 से भी अधिक लापता हैं। वैज्ञानिक लगातार इसके कारणों का आकलन कर रहे हैं– सबसे पहले ग्लेशियल झील को कारण बताया गया फिर दूसरे अनेक कारण बताए गए– पर सबमें तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन का योगदान स्वीकार किया गया। अब लंदन के इम्पीरीयल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने वैज्ञानिकों के अंतरराष्ट्रिय दल के साथ मिलकर इसका कारण बताया है।

इसके अनुसार, संभव है कि इस क्षेत्र में वर्ष 2015 में जब 7.8 तीव्रता का भूकंप आया था, तब चट्टानें कमजोर हो गई होंगी या उनमें दरार आ गई होगी। लेकिन चट्टानें जब तक ग्लेशियर की घनी बर्फ से ढकी रहीं तब तक सुरक्षित रहीं। इसके बाद तापमान वृद्धि के कारण ग्लेशियर का आकार घटता गया और जब ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर गिर होगा तब चट्टानों के हिस्से भी इसके साथ नीचे गिरे होंगें।

इन वैज्ञानिकों के अनुसार 26 अगस्त को लँगतांग लिरुन्ग चोटी से लगभग 11 करोड़ घनमीटर आयतन का ग्लेशियर का टुकड़ा चट्टानों के साथ टूटकर लगभग 1400 मीटर नीचे गिरा होगा, इसका पूरा आकार 2 लाख वर्ग मीटर रहा होगा। इतने भारी-भरकम हिस्से का गहराई में गिरने के प्रभाव से स्थानीय स्तर पर भूकंप के झटके भी महसूस किए गए। इसके बाद पानी के निचले हिस्सों में फैलने की गति लगभग 150 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच गई। इस कारण किसी को संभलने का अवसर नहीं मिला और सब कुछ समाप्त हो गया।

भारत में कभी भी आ सकती है नेपाल जैसी आपदा, हिमालय को पीएम मोदी की नीतियों से सबसे बड़ा खतरा

ग्लेशियर झीलें लगातार दिखने वाला खतरा

वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में बताया है कि जुलाई और अगस्त के महीनों में इस हिमालायी क्षेत्र का तापमान रिकार्ड स्तर तक पहुंच गया था– तापमान पिछले 30 वर्षों के औसत से 5 सेल्सियस अधिक तक पहुंच गया था। इस पूरे क्षेत्र का औसत तापमान पूर्व औद्योगिक काल की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच गया है। वर्ष 1980 के बाद से पहाड़ों पर जिस ऊंचाई पर बर्फ जमना शुरू होता है, वह ऊंचाई 100 मीटर प्रति दशक की दर से बढ़ रही है।

यही सारी स्थिति भारत के हिमालयी क्षेत्र में भी है, तापमान वृद्धि के अतिरिक्त यहां ग्लेशियल झीलों की संख्या भी अधिक है। जलवायु परिवर्तन की मार तो धीरे-धीरे असर करती है, पर ग्लेशियर झीलें तो लगातार दिखने वाला खतरा हैं। अरेखांकित प्रश्न 3249 के उत्तर में 20 मार्च 2025 को लोकसभा में बताया गया था कि भारत के हिमालयी क्षेत्र में कुल 9575 ग्लेशियर हैं, जिनमें से सबसे अधिक जम्मू और कश्मीर और लद्दाख के क्षेत्र में 5262, हिमाचल प्रदेश में 2735, उत्तराखंड में 968, सिक्किम में 449 और अरुणाचल प्रदेश में 161 हैं।

इन सभी ग्लेशियर का सम्मिलित क्षेत्र 37465 वर्ग किलोमीटर है। इसी उत्तर में इन ग्लेशियर के सिकुड़ने की दर भी बताई गई थी– यह पराणिकi ग्लेशियर के लिए 1.68 मीटर प्रति वर्ष है, जबकि बुरफू ग्लेशियर के लिए 69.7 मीटर प्रतिवर्ष है। शेष सभी ग्लेशियर के लिए यह दर इन्हीं दोनों संख्याओं के बीच है। गंगोत्री ग्लेशियर के लिए यह दर 16.7 मीटर प्रतिवर्ष है।

दुनिया जलवायु परिवर्तन के परिणाम को लेकर उदासीन

इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन द्वारा 22 अप्रैल 2024 को एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से जानकारी दी गई थी कि भारतीय हिमालय क्षेत्र में 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र वाली 2431 ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें से 676 झीलों का आकार साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है, 601 ग्लेशियर के आकार में तो दुगुने से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।

जलवायु परिवर्तन से जुड़े तीन प्रमुख कदम हैं– इसे नियंत्रित करना, इसके प्रभावों से आबादी को बचाना और इससे हुए नुकसान की भरपाई करना– पर दुखद यह है कि पूरी दुनिया इनमें से किसी भी कदम की तरफ नहीं बढ़ रही है। पृथ्वी के बढ़ते तापमान से सबसे अधिक प्रभावित ग्लेशियर होते हैं। पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में पृथ्वी का औसत तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, पर ग्लेशियर पहाड़ों पर जिस ऊंचाई पर बनते हैं– अनुमान है कि उन क्षेत्रों का तापमान पृथ्वी के औसत तापमान वृद्धि की तुलना में दुगुना है। तापमान वृद्धि के कारण ग्लेशियर के पिघलने की दर लगातार बढ़ रही है।

अधिकतर ग्लेशियर से बहने वाला पानी किसी नदी में जाता है पर अनेक ग्लेशियर ऐसे भी हैं जिनसे बहने वाला पानी इसके ठीक नीचे के क्षेत्र में या आसपास के निचले हिस्से में जमा होता है और यह पानी पत्थरों और मलबों से रूककर एक झील जैसी आकृति बना लेता है। जब इसमें अधिक पानी जमा होता है तब किनारे के पत्थरों और मलबों पर दबाव बढ़ जाता है जिससे ये टूट जाते हैं। ऐसी अवस्था में झील में जमा पानी एक साथ तीव्र वेग से नीचे के क्षेत्रों में पहुंचता है जिससे फ्लैश फ्लड या आकस्मिक बाढ़ आती है। ऐसी बाढ़ से जानमाल, संपत्ति और इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचता है।

दुनिया में कुल 215000 ग्लेशियर

अनुमान है कि दुनिया में कुल 215000 ग्लेशियर हैं, जिनमें से आधे से अधिक वर्ष 2100 तक पूरी तरह पिघल कर ख़त्म हो चुके होंगें। पिछली शताब्दी के दौरान औसत सागर तल में जितनी बढ़ोत्तरी हुई है, उसमें से एक-तिहाई योगदान ग्लेशियर के पिघलने से उत्पन्न पानी का है। जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि ग्लेशियर के पिघलने की दर बढ़ा रही है और इसके साथ ही ग्लेशियर झीलों की संख्या भी बढ़ रही है। वर्ष 2020 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दुनिया में ग्लेशियर झीलों की संख्या में पिछले 30 वर्षों के दौरान 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हो गयी है। इस अध्ययन को उपग्रह से प्राप्त चित्रों के आधार पर किया गया था। ग्लेशियर झील खतरनाक होती हैं क्योंकि कभी भी इनका किनारा टूट सकता है और निचले क्षेत्रों में भयानक तबाही ला सकता है।

नेचर कम्युनिकेशंस नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दुनिया के 30 देशों की 9 करोड़ से अधिक आबादी लगभग 1089 ग्लेशियर झीलों के जल-ग्रहण क्षेत्र में बसती है। इसमें से लगभग डेढ़ करोड़ आबादी ग्लेशियर झीलों के जल-ग्रहण क्षेत्र के एक किलोमीटर दायरे में रहती है और इस आबादी पर ग्लेशियर झील के टूटने के बाद आकस्मिक बाढ़ का सबसे अधिक खतरा है। यह डेढ़ करोड़ आबादी दुनिया के महज 4 देशों में बसती है– भारत, पाकिस्तान, चीन और पेरू। इसमें से 90 लाख आबादी हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों में है, जिसमें से 50 लाख से अधिक आबादी भारत के उत्तरी क्षेत्र और पाकिस्तान में है।

ग्लेशियर झीलों पर पहले भी अनेक अध्ययन किये गए हैं, पर यह पहला अध्ययन है जो यह बताता है कि ग्लेशियर झीलों के टूटने के बाद सबसे अधिक खतरा कहां हो सकता है। हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों में ग्लेशियर झील के टूटने के बाद लाखों लोगों की मौत होती है और संपत्ति के साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर का भारी नुकसान होता है, जबकि अमेरिका के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में हिमालय की तुलना में दुगुनी ग्लेशियर झीलें हैं, पर वहां इनके टूटने पर अधिक नुकसान नहीं होता। पिछले वर्ष पाकिस्तान की अभूतपूर्व बाढ़ में ग्लेशियर झीलों का पानी भी शामिल था।

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ग्लेशियर झीलें पहले से अधिक खतरनाक हुईं

वैज्ञानिक जर्नल नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 1900 की तुलना में ग्लेशियर झीलों के बनने के क्षेत्रों की औसत ऊंचाई बढ़ रही है, ग्लेशियर झीलें पहले की तुलना में कुछ सप्ताह पहले ही बनने लगी हैं और अब ग्लेशियर झीलों में आने वाले पानी का आयतन कम हो रहा है। जाहिर है, ग्लेशियर झीलें अब पहले से अधिक खतरनाक हो गई हैं क्योंकि पानी के अपेक्षाकृत कम आयतन में भी टूट सकती हैं। इस अध्ययन के लिए वर्ष 1900 के बाद से 1500 से अधिक ग्लेशियर झील के टूटने के बाद आई आकस्मिक बाढ़ से बहने वाले पानी का आयतन, सबसे अधिक बहाव, उनके समय और झील की समुद्र तल से औसत ऊंचाई का आकलन किया गया है। यह भी देखा गया है कि साल-दर-साल इनमें क्या अंतर आया है। इस अध्ययन को यूनिवर्सिटी ऑफ पाट्सडैम के वैज्ञानिक जॉर्ज वेह के नेतृत्व में किया गया है।

इस अध्ययन के अनुसार पिछले कुछ दशकों के दौरान ग्लेशियर झीलों की संख्या में तेजी आई है, पर अब इन झीलों में एकत्रित पानी का आयतन और इनके टूटने के बाद पानी के सर्वाधिक बहाव में वर्ष 1900 की तुलना में कमी देखी गयी है। ग्लेशियर झीलें वर्ष 1900 में साल के जिस समय बना करती थीं अब उस समय से कई हफ्तों पहले ही झीलें बन जाती हैं। वर्ष 1900 की तुलना में हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों में झीलें औसतन 11 सप्ताह पहले ही बन जाती हैं, जबकि यूरोपियन आल्प्स में 10 सप्ताह पहले और उत्तर-पश्चिम अमेरिका में यह समय 7 सप्ताह पहले का है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि हिमालय के ऊपरी ग्लेशियर के क्षेत्रों में जो तापमान औसतन 11 सप्ताह बाद होता था, अब वही तापमान 11 सप्ताह पहले ही आ जाता है। इस अध्ययन के अनुसार एंडीज, आइसलैंड और उत्तरी ध्रुव के पास स्थित देशों में ग्लेशियर झीलों की समुद्र तल से ऊंचाई 250 से 500 मीटर से अधिक बढ़ गयी है।

दुनिया का तापमान बढ़ रहा है, ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और वैश्विक स्तर पर नदियों के बहाव में अंतर आ रहा है। नदियों में पानी की कमी से पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है और समाज में अस्थिरता बढ़ रही है। इन सबके बीच सरकारें सो रही हैं।

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