
हाल में ही नॉर्वे के एक समाचारपत्र में एक कार्टून प्रकाशित किया गया था- जिसमें हमारे प्रधानमंत्री मोदी बीन बजाते हुए मदारी वाली मुद्रा में बैठे थे और उनके सामने सांप नहीं बल्कि पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल वाला नोजल था। जाहिर है सामने सांप नहीं था तो सपेरे की बात स्पष्ट नहीं थी। पर, उस कार्टून पर खूब हंगामा मचा जबकि पेट्रोल के दाम लगातार सांप जैसे ही बढ़ते जा रहे हैं। इस कार्टून को नस्लभेदी और औपनिवेशिक मानसिकता वाला बताया गया। स्पष्ट सपेरा नहीं होने के बाद भी यहां हरेक जगह सपेरा की ही बात की गई। बीजेपी जिस सनातन धर्म की बात करती है, उसमें सांप को पूजा जाता है, नाग-पंचमी एक त्योहार है। तमिलनाडु के महाबलीपुरम और कर्नाटक के बेलूर स्थित गुफाओं और मंदिरों में सांप की आकृतियाँ पत्थरों को तराश कर बनाई गई हैं। भगवान शंकर के हरेक मंदिर में सांप की आकृति है।
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प्रधानमंत्री मोदी को भी सांप बहुत प्रिय हैं, पर सनातन विचारधारा के विपरीत उनके सांप पूज्य नहीं बल्कि उनके लिए विलेन हैं। 30 मई 2025 को बिहार की एक रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद की तुलना सांप से की थी और कहा था कि आतंकवाद को सांप जैसा बिल से निकाल कर उसका फन कुचल देंगें। बिहार विधानसभा के चुनावी नतीजों के बाद उन्होंने एक भाषण में कहा कि आरजेडी को तो नतीजों के बाद सांप सूंघ गया होगा।
बिहार में ही वर्ष 2015 के विधानसभा चुनावों से पहले एक रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में– माइक पर जनता की तरफ अजीब सी मुस्कान चेहरे पर लादे थोड़ा तिरछे खड़े होकर और दोनों हथेलियों को आपस में मसलते हुए– कहा था, मुझे तो पता ही नहीं चलता है कि चंदन कुमार कौन है और भुजंग प्रसाद कौन है। भुजंग, सांप का पर्यायवाची शब्द है और उस समय नीतीश कुमार और लालू यादव एक साथ बीजेपी के विरुद्ध चुनाव लड़ रहे थे। जरूर किसी रैली में उन्होंने, आस्तीन का सांप, भी कहा होगा। यह महज इत्तेफाक नहीं हो सकता कि बिहार की धरती पर ही प्रधानमंत्री मोदी को सांप अचानक याद आते हैं। संभव है, जैसे उन्हें गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य विकास की परिभाषा गढ़ते नजर आते हैं वैसे ही बिहार सांप और सपेरों का इलाका नजर आता हो।
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वर्ष 2014 के बाद से राजनीति में और अब तो न्यायालयों और संवैधानिक संस्थाओं में भी आम आदमी की तुलना में जानवरों और जंतुओं के नाम अधिक गूंजते हैं। न्यायालयों को सड़कों के आवारा कुत्तों से संबंधित बहस में कई महीने लग जाते हैं पर जब लाखों लोगों के मतदान के अधिकार की बात आती है तब एक-दो सुनवाई के बाद ही मतदान का अधिकार छीन लिया जाता है। दुनिया के किसी भी देश में, विशेष तौर पर तथाकथित प्रजातान्त्रिक देश में, शायद न्यायालय द्वारा लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित करने का इस तरह का निर्णय न्यायालय, वह भी देश की सबसे बड़ी न्यायालय ने, नहीं सुनाया होगा। मतदान का अधिकार तो प्रजातंत्र का केंद्र है, पर हमारे तथाकथित प्रजातन्त्र में प्रजातंत्र का केंद्र नहीं बल्कि केंद्र की सत्ता को बचाने की कवायद को ही प्रजातंत्र कहा जाता है।
प्रजातंत्र में योग्य/अयोग्य का निर्णय सुनाए बिना किसी से मतदान का अधिकार छीन लेना उस व्यक्ति को कमतर इंसान का दर्जा देना ही है। यह आम आदमी के विभाजन का एक नया वर्ग भी है– एक वर्ग जो मतदान कर रहा है और दूसरा जिसे इसका अधिकार नहीं है। ऐसे न्यायालयों से आप समानता और निष्पक्षता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं, कैसे न्याय की उम्मीद कर सकते हैं?
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अब तो न्यायालय भी जनता को कॉकरोच और परजीवी जैसे विशेषण से नवाजती है। प्रधानमंत्री मोदी भी परजीवी जैसे शब्दों का खूब इस्तेमाल करते हैं। आम जनता के लिए कॉकरोच, घुन, दीमक और परजीवी जैसे शब्दों के बढ़ते इस्तेमाल से इतना तो तय है कि देश की सत्ता, न्यायालय और संवैधानिक संस्थाएं पूरी तरह से एकाकार हो चुकी हैं और आम जनता को इंसान ही नहीं समझतीं।
वर्ष 2014 से पहले के दौर में सत्ता, न्यायालय और संवैधानिक संस्थाओं के शीर्ष पर बैठे लोगों से और मीडिया से सामान्य लोग शिष्ट और सुसंकृत भाषा सीखते थे। उस दौर में उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के वक्तव्यों को इनवर्टेड कोमा के भीतर उद्धृत किया जाता था। आज स्थितियां बिल्कुल विपरीत हैं, उच्च पदों पर बैठे लोगों के वक्तव्यों को शिष्ट लोगों के बीच आप पूरा सुना भी नहीं सकते।
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पहले आईएएस और विदेश सेवा से जुड़े लोगों को सटीक और संक्षिप्त जवाब या वक्तव्य के लिये जाना जाता था, अब उन्हें उबाऊ, लचर, तथ्यहीन और मूल विषय से भटके हुए वक्तव्यों के लिए जाना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी के हाल के 5 देशों की यात्रा के दौरान बार-बार ऐसे उबाऊ वक्तव्य हमारे सामने आए। जब छात्र हिन्दी में निबंध लिखते हैं तब कुछ छात्र बार-बार अतिरिक्त उत्तर पुस्तिका लेकर लिखते ही चले जाते हैं– पर, उस निबंध में मूल विषय कई बार पूरी तरीके से नदारद रहता है। यही हाल अब विदेश सेवा के प्रवक्ताओं का हो गया है।
माननीय न्यायालयों ने तो कॉकरोच के बाद पर्यावरण संरक्षण के लिए आवाज उठाते तमाम कार्यकर्ताओं को भी देश के लिए खतरा करार दिया। इस देश में वैसे भी आम इंसान हैं ही कहाँ? सबसे ऊपर जो हैं, वे स्वघोषित “नॉन-बायोलॉजीकल” हैं। उनके चारों तरफ प्रचारक हैं, कुछ हिंसक हैं, दो-तीन अरबपति हैं और अंध-भक्त हैं। देश में शेष जो हैं, उनमें कुछ पाकिस्तानी हैं, कुछ घुसपैठिए हैं, कुछ परजीवी हैं, कुछ कॉकरोच हैं, कुछ सांप हैं– जाहिर है इंसान नहीं है।
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जब हम ध्रुवीकरण या सामाजिक विभाजन की बात करते हैं तब हिन्दू-गैर हिन्दू से आगे नहीं सोचते। पर, अब हरेक संदर्भ में हम विभाजित हैं। अब तो आर्थिक तौर पर लूट-पिटा मध्यम वर्ग भी दो वर्गों में बंट गया है। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार देश के 25 करोड़ गरीब, गरीबी को लांघकर मध्यम वर्ग में पहुंच गए हैं। यहां तक यह वक्तव्य सामान्य और सामाजिक विकास को दर्शाने वाला लगता है। पर, प्रधानमंत्री मोदी ने आगे बताया कि मध्यम वर्ग में प्रवेश कर चुके 25 करोड़ लोगों को मुफ्त 5 किलो अनाज मिलता रहेगा।
जाहिर है, अब मध्यम वर्ग की दो श्रेणी है– एक जिसे हरेक महीने 5 किलो मुफ़्त अनाज मिलता है और दूसरा जिसे मुफ़्त अनाज नहीं मिलता। इसी तरह देश की सामान्य आबादी की भी दो श्रेणियां हैं– एक का नाम अंधभक्त है और दूसरे को आप कॉकरोच या फिर किसी भी दूसरे जन्तु/जानवर के नाम से पुकार सकते हैं। आश्चर्य यह है दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश में इंसानों की भारी किल्लत है। यहां किसी के इंसान बनते ही सत्ता उसे किसी जानवर का नाम दे देती है।
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