
एक देश की कल्पना करें जो खुद को विश्वगुरु कहता है, लेकिन जिसकी ऊर्जा नीति, विदेश नीति और औद्योगिक नीति तीनों एक ही धुरी पर घूमती हैं, कुछ चुनिंदा लोगों का फायदा, बाकी सबके लिए नैरेटिव। यह कहानी वहीं से शुरू होती है।
सरकार ने घोषणा की, भारत 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य। पीएम-कुसुम, पीएलआई योजना, सेकी के ठेके, हज़ारों करोड़ की सब्सिडी। जनता ने तालियां बजाईं। लेकिन ज़मीन पर यह हुआ कि 2023-24 में भारत ने चीन से लगभग ₹32,000 करोड़ के सौर पैनल और सेल आयात किए, और सभी देशों से मिलाकर कुल आयात ₹51,000 करोड़ से ऊपर पहुंच गया। इस खेल में सबसे ऊपर है वारी एनर्जीज़ और चुनावी बॉन्ड में बीजेपी को सबसे ज़्यादा देने वालों में मेघा इंजीनियरिंग शीर्ष पर रही। फॉर्मूला सीधा है चंदा पार्टी को , ठेका सरकार से, पैनल चीन से, लेबल अपना, मुनाफा कम्पनी को और बोझ करदाता पर। मेक इन इंडिया नहीं, लेबल इन इंडिया।
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यह सौर ऊर्जा का झांसा था। अब तेल देखिए। भारत अपनी 85% से ज़्यादा तेल जरूरत आयात से पूरी करता है। असली ऊर्जा सुरक्षा के लिए ज़रूरी था कि ओएनजीसी जैसी कंपनियां विदेश में तेल के कुएं खरीदें, अपना स्थायी स्रोत बनाएं, वो रास्ता बंद हो गया। लेकिन रिलायंस को रूस से सस्ता कच्चा तेल मिला, जामनगर में परिष्कृत हुआ, यूरोप को बेचा गया, मुनाफा हुआ, रिलायंस का। ऊर्जा सुरक्षा बनी, नहीं। साथ में एथनॉल मिश्रण की नीति चली, गाड़ी के इंजन की उम्र घटी, नई गाड़ियां जल्दी बिकेंगी और इलेक्ट्रिक वाहन का ढोंग इसलिए नहीं कि बिजली से चलेंगे, बल्कि इसलिए कि तेल की पर निर्भरता छुपाने का नैरेटिव चाहिए था। जब सौर ऊर्जा नकली हो और तेल परनिर्भर हो तो बचता है कोयला और वहां भी हाल यह है कि कई बिजली संयंत्रों में भंडार बहुत कम है। तीनों ऊर्जा स्रोत तेल, कोयला, सौर तीनों में या तो परनिर्भरता है या मिलावट।
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अब जरा बाहर देखिए। ईरान-अमेरिका टकराव में होर्मुज़ जलसंधि पर खतरा मंडरा रहा है, वही रास्ता जिससे भारत का बड़ा हिस्सा तेल आता है। ईरान जो कभी इजराइल और अमेरिका के हमले चुपचाप झेलता था, अब एफ-35 तक को टक्कर दे रहा है और अमेरिका युद्धविराम की गुजारिश कर रहा है। यह सिर्फ ईरान की कहानी नहीं है, यह बता रहा है कि जो देश अपनी असली ताकत बनाते हैं, दुनिया उनके साथ बैठकर बात करती है। भारत के पास अगर होर्मुज जलसंधि बंद हो जाए तो? न पर्याप्त रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, न घरेलू उत्पादन, न वैकल्पिक स्रोत। उस दिन कोई सोशल मीडिया की रील काम नहीं आएगी।
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यहीं असली सवाल आता है। 50 साल पहले भारत गरीब था, लेकिन उसने इसरो बनाया, एचएमटी खड़ा किया, हाल चलाया, हरित क्रांति लाया। गरीब था पर निर्माता था। आज जीडीपी बड़ी है लेकिन अर्धचालक नहीं बनते, लड़ाकू विमान नहीं बनते, सौर सेल नहीं बनती। हम दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातक हैं, चीन के सबसे बड़े ग्राहकों में हैं। उपभोक्ता राष्ट्र की कोई विदेश नीति नहीं होती, सिर्फ आयात के आदेश होते हैं। इसीलिए नेपाल आंख दिखाता है, बांग्लादेश अकड़ता है। फ्रांस की सड़कों पर भले अफ्रीका का माहौल हो, लेकिन एक पनडुब्बी आती है तो दुनिया झुकती है, क्योंकि वो बनाते हैं, बेचते हैं, ताकत रखते हैं। जिस देश की बड़ी आबादी की असली चिंता रोज़मर्रा की है, उसे राष्ट्रवाद की आड़ में मुफ्त डेटा और सोशल मीडिया पर रील दे दो, चेतना वहीं रुक जाती है।
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इतिहास में वो मोड़ सबसे महंगे पड़ते हैं जब कोई देश असली ताकत बनाने की जगह नैरेटिव बनाता रहता है। तेल संकट आया, होर्मुज़ जलसंधि बंद हुई, कोयले की कमी गहरी हुई तो इंस्टाग्राम की रील में आग लगेगी, शाब्दिक नहीं, बल्कि बिजली ही नहीं होगी चलाने की। विश्वगुरु वो होता है जिसका चेला हो, जिसकी तकनीक हो, जिसकी ऊर्जा हो, जिसकी शर्तें हों।
अभी हम दुनिया के सबसे बड़े ग्राहक हैं, चीन के, अमेरिका के, रूस के। यह विश्वगुरु नहीं — यह विश्व-उपभोक्ता है, और उपभोक्ता की, इतिहास में, अपनी कोई शर्त नहीं होती।
(यह लेख मंजीत आनंद साहू ने लिखा है।)
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