विचार

आस-पड़ोस में अछूत बनता भारत?

चीन से संबंध सुधारने की कोशिशों और पड़ोसी मुल्कों में घटते कूटनीतिक प्रभाव के बीच भारत रणनीतिक संकट जैसी स्थिति में पहुंच गया है।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल ने हाल ही में चीन यात्रा की है
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल ने हाल ही में चीन यात्रा की है 

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल का बीजिंग दौरा, जहां उन्होंने चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ ‘सीमा वार्ता’ की, 12-13 सितंबर को दिल्ली में होने वाले आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले की कूटनीतिक जमीन तैयार करने की कवायद है। अगर राष्ट्रपति शी जिनपिंग सम्मेलन में शामिल नहीं होते हैं, तो आयोजन फीका पड़ जाएगा, और भारत के पास अभी तक उनके शामिल होने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।

विवादित हिमालयी सीमा पर रणनीतिक समीकरण बदलने के लिए चीन द्वारा भारतीय क्षेत्र में सुनियोजित घुसपैठ किए जाने के छह साल बाद भी, भारत सीमा के मुद्दे से बचते हुए रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहा है। यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक दयनीय तमाशा पेश करता है और मोदी सरकार की चीन नीति की विफलता को बेनकाब करता है।

देश के भीतर भले ही मोदी के कड़े और आक्रामक नेतृत्व के बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हों, लेकिन चीन के मामले में भारत का रवैया बेहद दब्बू-सा रहा है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद-जिस दौरान चीन ने पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी, पैंगोंग त्सो और गोगरा हॉट स्प्रिंग्स में घुसपैठ की थी- प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा कर दी थी कि देश की सीमा में कोई नहीं घुसा है। एक खुले झूठ जैसी इस लीपापोती ने भारत के पक्ष को कमजोर किया और बीजिंग को उसकी आक्रामक कार्रवाइयों के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक कवच प्रदान किया। स्थिति यह है कि चीन आज भी सीमा पर लगातार दबाव बनाए हुए है।

आत्मनिर्भरता के तमाम बड़े दावों की भी हवा निकल चुकी है। भारत मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक कच्चे माल के लिए चीन पर खासा निर्भर है। वित्त वर्ष 2025-26 में द्विपक्षीय व्यापार घाटा 112.16 अरब डॉलर था, और यह लगातार बढ़ता जा रहा है (कैलेंडर वर्ष 2026 की पहली छमाही में ही यह 67.1 अरब डॉलर पहुंच चुका है)।

22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद मई 2025 में पाकिस्तान के खिलाफ भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के हमलों ने एक और भी खतरनाक हकीकत को उजागर कर दिया-वह थी चीन-पाकिस्तान साझेदारी के जमीनी सैन्य तालमेल का असली रूप। पाकिस्तान ने चीनी विमानों, मिसाइलों और वायु रक्षा प्रणालियों का इस्तेमाल किया। भारत के उप-सेना प्रमुख ने बाद में यह बयान दिया था कि चीन ने पाकिस्तान को भारतीय रणनीतिक ठिकानों की लाइव जानकारी मुहैया कराई थी। बीजिंग आधिकारिक रूप से कूटनीतिक दूरी बनाए रखने का नाटक करते हुए भी खुलेआम पाकिस्तान का समर्थन कर रहा था।

दो मोर्चों पर मंडराने वाले जिस खतरे को रोकने की जिम्मेदारी भारत की विदेश नीति की थी, वह अब पूरी तरह एक खौफनाक सच्चाई बन चुका है। जहां एक तरफ पाकिस्तान को चीन से बेहतर हथियार, खुफिया जानकारी और कूटनीतिक सुरक्षा कवच मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय सरकार मीडिया की सुर्खियों को प्रबंधित करने में व्यस्त है।

चीनी घेराबंदी का खतरा केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं। चीन पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है, जबकि नेपाल भी लगातार चीनी निवेश और कनेक्टिविटी की ओर झुक रहा है। भारत के पड़ोसी देश पूंजी, बुनियादी ढांचे, बाजारों और कूटनीतिक बढ़त के लिए तेजी से चीन पर निर्भर होते जा रहे हैं। उनका यह चीनी झुकाव बताता है कि भारत अपने पास-पड़ोस को संभालने में कितना नाकाम रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में सत्ता संभालते ही बड़े तामझाम के साथ ‘ पड़ोसी पहले’ नीति की घोषणा की थी। बारह साल बाद, स्थिति यह है कि पड़ोसी देश उनकी सरकार की प्राथमिकताओं में सबसे निचले पायदान पर जा चुके हैं। वर्तमान कार्यप्रणाली यह है कि कम मित्रवत सरकारों पर दबाव बनाया जाए और संबंध बिगड़ने पर थोड़ी-बहुत मदद का झुनझुना थमा दिया जाए। छोटे पड़ोसी देश सम्मान, संप्रभुता का दायरा और एक स्थिर और भरोसेमंद नीतिगत ढांचा चाहते हैं; वे इसे नापसंद करते हैं कि उनके साथ आश्रितों जैसा बर्ताव किया जाए या जब उनके विकल्प से भारत के नाखुश होने पर उन्हें सजा मिले। 

इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण बांग्लादेश है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस द्विपक्षीय रिश्ते को पूरी तरह शेख हसीना के साथ जोड़ दिया था, और उनकी तानाशाही प्रवृत्तियों को नजरअंदाज किया क्योंकि वह भारत के सुरक्षा हितों की रक्षा करती थीं। जब 2024 के जन-विद्रोह ने उन्हें देश छोड़कर भागने पर मजबूर किया, तो भारत ने उन्हें शरण दी। दिल्ली ने उनकी जगह आई अंतरिम सरकार पर अविश्वास जताया। नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने बेहतर रिश्तों की पहल की थी, लेकिन उनकी भारत यात्रा फिलहाल अटक गई है।

ढाका तब और भड़क गया जब भारत हसीना के प्रत्यर्पण की मांगों पर कुंडली मारकर बैठ गया और हसीना ने नई दिल्ली से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। सीमा पर बाड़ लगाने, लोगों को जबरन निर्वासित करने और भाजपा नेताओं के भारत-विरोधी बयानों ने कड़वाहट को और गहरा कर दिया है। रहमान संप्रभु समानता की बात कर रहे हैं। बांग्लादेश अब पाकिस्तान के प्रति नरमी और खुलापन दिखा रहा है, साथ ही चीन के साथ अपने संबंधों को और बेहतर करने में जुटा है-जिसका सीधा परिणाम भारत के घटते प्रभाव के रूप में सामने आ रहा है।

नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह भी अपने देश की कूटनीतिक प्राथमिकताओं को नए सिरे से तय कर रहे हैं। शाह ने अब तक भारत का दौरा नहीं किया है, और उन्होंने काठमांडू में भारतीय राजदूत से मिलने के ठीक बाद चीनी राजदूत से भेंट की, जो उनके खुलेपन का साफ संकेत है। नेपाल कृषि, स्वास्थ्य, पर्यटन और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में भी चीनी निवेश आकर्षित करने में लगा है। 2015 की आर्थिक नाकेबंदी और मोदी के बड़े भाई वाले रवैये की यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं, और मौजूदा भारतीय सरकार यह उम्मीद नहीं कर सकती कि इतिहास और भूगोल हमेशा उसके लिए वफादारी की गारंटी देंगे।

अब बात श्रीलंका की। 2025 में प्रधानमंत्री हरिणी अमरसूर्या ने कुछ ही दिनों के अंतराल पर चीन और भारत का दौरा किया। बीजिंग में उन्होंने कोलंबो पोर्ट सिटी, हंबनटोटा बंदरगाह और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए चीनी समर्थन की खुलकर तारीफ की। वहीं दिल्ली में उन्होंने शिक्षा, प्रौद्योगिकी और संस्थागत सुधारों में भारत को अहम साझेदार बताया। श्रीलंका की यह ‘दोहरी कूटनीतिक चाल’ चीन और भारत के बीच रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों में संतुलन बनाने के लिए है, लेकिन चीन का आर्थिक वजन तेजी से उसके फैसलों को तय कर रहा है।

‘इंडिया-आउट’ अभियान के दम पर मालदीव की सत्ता में आई मोहम्मद मुइज्जू की सरकार ने चीन के साथ अपने संबंध काफी प्रगाढ़ कर लिए हैं। वहां की संसद ने पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ मिलकर सऊदी के नेतृत्व वाले ‘बहुराष्ट्रीय समुद्री रक्षा गठबंधन’ में शामिल होने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी है। इस उभरते हुए सुरक्षा ढांचे से भारत का नदारद रहना एक और स्पष्ट प्रमाण है कि माले अब दिल्ली से परे अपने सामरिक विकल्प तलाश रहा है।

पिछले एक दशक में चीन ने महत्वपूर्ण ढांचागत बढ़त हासिल की है। उसकी अर्थव्यवस्था का आकार बहुत बड़ा है और उसके पास वित्तीय संसाधन तथा सैन्य ताकत भी कई गुना अधिक है। वह बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाएं पूरी कर सकता है और देशों में होने वाले राजनीतिक बदलावों के बावजूद उनके साथ लगातार संवाद बनाए रख सकता है। उसकी विदेश नीति इस क्षेत्र के कई छोटे देशों की जमीनी हकीकत के अनुकूल दिखती है-बीजिंग संप्रभुता और अहस्तक्षेप की भाषा बोलता है। इसके विपरीत, देश के भीतर मोदी सरकार के कदमों और उसकी विदेश नीति के फैसलों ने भारत के पड़ोसियों के लिए चीन के प्रस्तावों को और आकर्षक बना दिया है।

मोदी सरकार का बहुसंख्यकवादी एजेंडा, अल्पसंख्यकों पर हमले, और बंगाल और असम में कथित अवैध प्रवासियों को जबरन खदेड़ने की कोशिशों पर बांग्लादेश, मालदीव और अन्य देशों में बहुत बारीकी से नजर रखी जा रही है। भारतीय मुसलमानों को निशाना बनाने वाली विभाजनकारी बयानबाजी और पाकिस्तान तथा बांग्लादेश को उनके सुरक्षित ठिकाने के रूप में चित्रित करने वाले कुप्रचार ने भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को गहरा धूमिल किया है और उसकी कूटनीतिक गुंजाइश को बेहद संकीर्ण कर दिया है।

अजीत डोवाल का प्रतिनिधिमंडल सीमा प्रबंधन को लेकर कुछ आश्वासनों के साथ 25 अगस्त को बीजिंग से लौट आया, लेकिन इसकी अभी कोई पुष्टि नहीं हुई है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स सम्मेलन की शोभा बढ़ाएंगे या नहीं। अगर शी जिनपिंग एक बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ आ भी जाते हैं, तब भी यह कूटनीतिक शक्ति के अंतर्निहित संतुलन को नहीं बदल पाएगा। चीन अच्छी तरह सीख चुका है कि वह एक ही समय में हिमालयी क्षेत्र में भारत पर दबाव भी बना सकता है, भारतीय बाजार से मुनाफा भी कमा सकता है, पाकिस्तान की सैन्य ताकत को मजबूत भी कर सकता है और पूरे दक्षिण एशिया में अपने रिश्ते गहरे भी कर सकता है। मोदी की विदेश नीति ने रणनीतिक रूप से चीन को भारत की घेराबंदी करने में बहुत मदद की है।

(अशोक स्वेन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं)

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