ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी का वेलबीइंग रिसर्च सेंटर, संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट सौल्युशंस नेटवर्क और गैलप के सहयोग से हरेक वर्ष वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट प्रकाशित करता है और हाल में ही प्रकाशित इसके 2026 के संस्करण में विश्वगुरु मोदी जी का तथाकथित विकसित भारत कुल 147 देशों में 116वें स्थान पर है।
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वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स पिछले चौदह वर्षों से प्रकाशित किया जा रहा है और भारत इस सूची में लगातार सबसे पिछले देशों के साथ ही खड़ा रहता है। भारत का पिछड़ना इस लिए भी आश्चर्य का विषय है क्योकि यहां प्रचंड बहुमत (जनमत या वोटों की चोरी में मतभेद हो सकता है) वाली ऐसी सरकार है जो लगातार जनता की हरेक समस्या सुलझाने का दावा करती रही है। सत्ता के अनुसार उसने पानी, फ्री अनाज, बिजली, कुकिंग गैस और इसी तरह की बुनियादी सुविधाएं हरेक घर में पहुंचा दी है, सबको रोजगार दे दिया है, गरीब तो इतिहास बन चुके हैं, पर इंडेक्स तो यही बताता है कि दुनिया के सबसे दुखी देशों में हम शामिल हैं। इंडेक्स में तो हम चीन, पाकिस्तान और लगातार अशांत रहे नेपाल से भी पीछे हैं।
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इस इंडेक्स में हमेशा की तरह यूरोप के नोर्डिक देश सबसे आगे हैं। सबसे खुश देशों में लगातार नौवीं बार फिनलैंड प्रथम स्थान पर है, इसके बाद क्रम से आइसलैंड, डेनमार्क, कोस्टा रिका, स्वीडन, नॉर्वे, नीदरलैंड, इजराइल, लक्सेम्बर्ग और स्विट्ज़रलैंड हैं। पहले 10 देशों में केवल कोस्टा रिका, ऑस्ट्रेलिया और इजराइल ही नार्डिक देशों में शामिल नहीं हैं। इंडेक्स में सबसे नीचे के स्थान पर, यानि 147वें स्थान पर, अफ़ग़ानिस्तान है, इससे पहले क्रम से सिएरा लियॉन, मलावी, ज़िम्बाब्वे, बोत्सवाना, येमेन, लेबनान, कांगो, ईजिप्ट और तंजानिया हैं। भारत के पड़ोसी देशों में सबसे अच्छे स्थान पर चीन है, यह इंडेक्स में 65वें स्थान पर है। नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और अफगानिस्तान इस इंडेक्स में क्रमशः 99, 104, 127, 129, 134 और 147वें स्थान पर हैं।
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इस इंडेक्स में अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम जैसे देश शुरुआती 20 देशों की सूचि के बाहर हैं, जबकि मेक्सिको, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे देश क्रम में 10 से 20 के बीच हैं। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था में शामिल देशों में मेक्सिको 12वें, ऑस्ट्रेलिया 15वें, जर्मनी 17वें, अमेरिका 23वें, कनाडा 25वें, यूनाइटेड किंगडम 29वें, ब्राजील 32वें, फ्रांस 35वें, सिंगापुर 36वें, इटली 38वें, अर्जेन्टीना 44वें, जापान 61वें, दक्षिण कोरिया 67वें, रूस 79वें, तुर्किए 94वें, और दक्षिण अफ्रीका 101वें स्थान पर है। अपने नागरिकों को मौलिक अधिकारों से वंचित रखने वाले, युद्ध और गृहयुद्ध की विभीषिका झेलते और लम्बे आन्दोलनों के झेलते देश के नागरिक भी हमसे अधिक खुश हैं। हंगरी इंडेक्स में 74वें स्थान पर और फिलिस्टिन 109वें स्थान पर है। वर्ष 2006 से 2010 की तुलना में वर्ष 2024 के इंडेक्स में जिन देशों की खुशी सबसे कम हो गयी थी, उनमें मोदी जी के गारंटी और संकल्प का विकसित भारत भी शुमार है। सामाजिक असमानता में भारत 118वें स्थान पर, सामाजिक सपोर्ट में 123वें स्थान पर और नेगटिव ईमोशन्स में हम 117वें स्थान पर हैं।
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स्वघोषित विश्वगुरु के देश की जनता के दुखों का आलम यह है कि लगातार रेत, गृहयुद्ध, युद्ध और आतंकवाद की मार झेलते मध्य-पूर्व के अधिकतर देश भी हमसे अधिक खुश हैं। इस्राइल इंडेक्स में 9वें स्थान पर है, यूनाइटेड अरब अमीरात 21वें, सऊदी अरब 22वें, कुवैत 42वें, बहरीन 55वें, ओमान 58वें, लिबिया 81वें, इराक 95वें, ईरान 97वें, फिलिस्टीन 109वें, इजिप्ट 139वें और लेबेनान 141वें स्थान पर है।
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हैप्पीनेस इंडेक्स के लिए खुशी का आकलन देशों के प्रति व्यक्ति जीडीपी. स्वास्थ्य अनुमानित आयु, लागों से बातचीत, सामाजिक तानाबाना, अपने निर्णयों की आजादी, समाज में भ्रष्टाचार जैसे मानदंडों से किया जाता है। हैप्पीनेस इंडेक्स में देशों के क्रम से स्पष्ट है की जीवंत लोकतंत्र वाले देशों के नागरिक सबसे अधिक खुश हैं, पर हमारे देश में तो लोकतंत्र का जनाजा निकल चुका है। दरअसल वर्ष 2014 के बाद से देश में लोकतंत्र की परिभाषा ही बदल दी गई है। सत्ताधारी और उनके समर्थक कुछ भी करने को आजाद हैं, वे अफवाह फैला सकते हैं, हिंसा फैला सकते हैं, बलात्कार कर सकते हैं, हत्या कर सकते हैं और दंगें भी करा सकते हैं।
दूसरी तरफ, सरकारी नीतियों का विरोध करने वाले चुटकियों में देशद्रोही ठहराए जा सकते हैं, जेल में बंद किये जा सकते हैं या फिर मारे जा सकते हैं। मीडिया, संवैधानिक संस्थाएं और अधिकतर न्यायालय सरकार के विरोध की हर आवाज को कुचलने में व्यस्त हैं। लोकतंत्र की सीढ़ियों पर फिसलने की भारत की आदत पड़ चुकी है, फ्रीडमहाउस के इंडेक्स में भी हमारा देश स्वतंत्र देशों की सूचि से बाहर हो चुका है और आंशिक स्वतंत्र देशों के साथ शामिल हो चुका है। भारत दुनिया का अकेला तथाकथित लोकतंत्र है, जहां सत्ता, अपराधी, आतंकवादी, प्रशासन, सरकार, न्याय तंत्र, मीडिया और पुलिस का चेहरा एक ही हो गया है। अब किसी के चहरे पर नकाब नहीं है और यह पता करना कठिन है कि इनमें से सबसे दुर्दांत या खतरनाक कौन है।
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इस इंडेक्स से इतना तो स्पष्ट है की हमारे देश के लोग सरकार पर भले ही भरोसा करते लगते हों पर संतुष्ट नहीं हैं, खुश नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान जिस तरह से किसानों की समस्याएं, बेरोजगारी, महिलाओं की सुरक्षा, नौकरी से छटनी, अभिव्यक्ति की आजादी, अल्पसंख्यकों का दमन, सामाजिक ध्रुवीकरण, आपसी वैमनस्व और असहिष्णुता जैसी समस्याएं विकराल स्वरुप में उभरीं हैं उसने पूरे समाज को प्रभावित किया है और समस्याओं से घिरा समाज कभी खुश नहीं रह सकता, भले ही सत्ता कितने भी दावे कर ले।
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