विचार

राम पुनियानी का लेख/ अमेरिका में मोहन भागवत: नफरत की सियासत और समावेशिता का मुखौटा

भागवत ने अमेरिका में कहा कि मुस्लिम-मुक्त भारत चाहने वाला हिन्दू, हिन्दू नहीं रहेगा! बहुत अच्छी बात है! लेकिन हम एक व्यक्ति और एक संस्था के बारे में अपनी राय किस आधार पर बनाते हैं? उसकी बातों के आधार पर या उसकी कारगुजारियों के आधार पर?

मेडिसन स्क्वायर में मोहन भागवत, नफरत की सियासत और समावेशिता का मुखौटा
मेडिसन स्क्वायर में मोहन भागवत, नफरत की सियासत और समावेशिता का मुखौटा फोटोः PTI

आरएसएस के मुखिया, सरसंघचालक मोहन भागवत इन दिनों तीन देशों की यात्रा पर हैं। प्रथम चरण में वे अमरीका पहुंचे जहां उनका मुख्य कार्यक्रम न्यूयार्क के मेडिसन स्क्वायर में भाषण था। इस कार्यक्रम में करीब 5,000 लोगों के आने की उम्मीद थी। इस यात्रा का घोषित उद्देश्य था- आरएसएस के बारे में व्याप्त गलत धारणाओं को दूर करना, लोगों से संवाद करना और सारी दुनिया एक है का संदेश देना।

इस कार्यक्रम का कड़ा विरोध हुआ। विरोध करने वालों में लगभग 61 मानवाधिकार संगठन शामिल थे, जिन्होंने संघ परिवार की नफरत की राजनीति पर रोशनी डाली। विरोध करने वालों ने आरएसएस से जुड़े लोगों के लेखन का हवाला दिया जिसमें यहूदियों का कत्लेआम करने के लिए हिटलर की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई थी और हिन्दू राष्ट्रवादियों को राष्ट्रनिर्माण के हिटलर के तरीके का अनुसरण करने के लिए कहा गया था। विरोध प्रदर्शन कर रहे लोग बैनर लिए हुए थे जिन पर लिखा था कि आरएसएस ने महात्मा गांधी की हत्या की थी।

यहां तक कि न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी, जो भारतीय मूल के हैं, ने भी आरएसएस की निंदा की और आरएसएस के आयोजन के प्रति अपनी नाराजगी दर्ज कराई। मगर उन्होंने कहा कि वे इसे रूकवाने में असमर्थ हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जिस भारत में वे बड़े हुए (वे भारतीय फिल्म निर्माता मीरा नायर के पुत्र हैं) उसमें विविधता का सम्मान था, वहीं आज का भारत एक असहिष्णु राष्ट्र बन गया है। कई हिन्दू संगठनों और अन्य मानवाधिकार संगठनों ने भी भागवत विरोधी प्रदर्शनों में भाग लिया।

भागवत का कार्यक्रम 200 से अधिक संगठनों ने आयोजित किया था जो मुख्यतः पहचान से जुड़े मुद्दों पर केन्द्रित रहे हैं। कार्यक्रम में भागवत ने बहिष्करण की अपनी राजनीति को छिपाने का प्रयास करते हुए स्वयं को एक उदार व्यक्ति के रूप में दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि विविधता हमारी जन्मजात एकता का गहना है और मुस्लिम-मुक्त भारत चाहने वाला हिन्दू, हिन्दू नहीं रहेगा! बहुत अच्छी बात है! हम एक व्यक्ति और एक संस्था के बारे में अपनी राय किस आधार पर बनाते हैं? उसकी बातों के आधार पर या उसकी कारगुजारियों के आधार पर? अनेकता में एकता, सद्भाव और धर्मों की सीमाओं के परे लोगों में एकता, भारत के अतीत का हिस्सा रहे हैं। आजादी के संघर्ष के दौरान भगतसिंह के आदर्शों, अम्बेडकर के मूल्यों और गांधी के बंधुत्व के साथ लोगों ने अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने की लड़ाई लड़ी। आरएसएस-हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग लोगों को जोड़ने की इस प्रक्रिया से दूर बने रहे।

इस दौरान आरएसएस न केवल भारतीय राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया के प्रति उदासीन रहा, बल्कि उसने मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाने (और बाद में ईसाईयों के खिलाफ भी) में कोई कसर नहीं छोड़ी और कई तरह से ब्रिटिश शासकों की सहायता की। आरएसएस द्वारा अपनी शाखाओं, स्कूलों, मीडिया और बाद में सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाई गई नफरत की वजह से बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा हुई जिसके मुख्य शिकार मुसलमान हुए। जहां ब्रिटिश राज के दौरान हिन्दू और मुसलमान साम्प्रदायिक तत्वों के बीच लगभग बराबरी का मुकाबला था, वहीं आजादी के बाद आरएसएस की साम्प्रदायिकता का बोलबाला हो गया, जिससे इन दो प्रमुख समुदायों के बीच गहरी खाई बन गई। इसी नफरत के चलते हमने 1993 में मुंबई में, 2002 में गुजरात में, 2013 में मुजफ्फरनगर और 2019 में दिल्ली में मुसलमानों के व्यापक नरसंहार की घटनाएं देखीं।

आरएसएस की राजनीति का असली चेहरा गुजरात के बिलकीस बानो मामले से पूरी तरह साफ है। एक गर्भवती मुस्लिम महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म होता है, और इसके दोषियों को थोड़ा समय जेल में गुजारने के बाद रिहा कर दिया जाता है! यही है उसका महिलाओं के प्रति सम्मान भाव! उसने पवित्र गाय का मामला भी जोरशोर से उठाया जिसके नतीजे में कई मुसलमानों की लिंचिंग हुई। अखलाक, रकबर खान आदि के साथ ही कई दलित भी लिंचिंग का शिकार बने। ऊना में लाठियों और लोहे की छड़ों से दलितों की पिटाई से आरएसएस के दलितों के प्रति रवैये की पोल खुल गई।

1980 के दशक से ईसाई भी आरएसएस के निशाने पर आ गए। जहां पास्टर स्टेन्स और उनके दो मासूम लड़कों को जिंदा जलाए जाने की घटना को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. केआर नारायणन ने ठीक ही मानव जाति के सबसे कलुषित कार्यों में से एक कहा था, वहीं कंधमाल की घटना ने दुबारा यह दिखाया कि ‘ईसाई धर्म विदेशी है‘ का नारा आरएसएस का ही है। उसका ईसाईयों और मुसलमानों के खिलाफ रवैया पिछले करीब एक दशक से और कटु होता गया है। संघ की राजनैतिक शाखा लगभग 12 सालों से केन्द्र की सत्ता पर काबिज है।

हाल में ईसाईयों की प्रार्थना सभाओं पर हमले की घटनाओं में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। मुसलमानों का किस हद तक हाशियाकरण हो चुका है, यह इस बात से जाहिर है कि आरएसएस की राजनैतिक संतान बीजेपी के कुल मिलाकर 1000 से अधिक सांसद और विधायक हैं, मगर उनमें से एक भी मुसलमान नहीं है। यह है मुसलमानों के प्रति समानता का भाव रखने के भागवत के दावे की हकीकत।

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सन् 2025 में यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ), जो एक स्वतंत्र आयोग है जिसे अमरीकी कांग्रेस ने दूसरे देशों में धार्मिक स्वतंत्रता पर निगरानी रखने और अमरीकी सरकार को अनुसंशाएं करने के लिए स्थापित किया था, ने सिफारिश की थी कि अमरीकी सरकार भारत को ‘‘विशेष रूप से चिंता करने योग्य‘‘ राष्ट्र का दर्जा दे। इसने यह सिफारिश भी की थी कि कुछ व्यक्तियों और आरएसएस सहित कुछ संस्थाओं पर लक्षित प्रतिबंध लगाए जाएं जिनमें उनकी संपत्तियों को फ्रीज करना और अमेरिका में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना शामिल हो। सबसे हालिया घटनाक्रम में यूएससीआईआरएफ ने भागवत और आरएसएस के अन्य नेताओं के साथ उच्चाधिकारियों की मुलाकातों और उन्हें राजनयिक शिष्टाचार उपलब्ध कराए जाने के खिलाफ आगाह किया। कई मानवाधिकार संगठनों ने भी अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो से मांग की कि भागवत का अमेरिका का वीजा निरस्त कर दिया जाए या उसे देने से इंकार कर दिया जाए।

आरएसएस का आचरण हमेशा से विविधता का सम्मान करने के उसके दावे के एकदम खिलाफ रहा है। लेकिन भागवत बहुत चतुराई से अपनी संस्था की हकीकत छिपा गए। विविधता का सम्मान करने का मुखौटा सिर्फ दुनिया को भ्रमित करने का प्रयास, एक झांसा है। लेकिन क्या इंटरनेट के इस युग में और मानवाधिकारों को गंभीरता से लेने वाले इस दौर में दुनिया से हकीकत छिपाकर रखना संभव हो सकेगा? जहां आरएसएस से संबद्ध 2,500 से अधिक संस्थाएं दुनिया भर में हैं, वहीं केरेवान पत्रिका के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से ऐसे अध्येता और कार्यकर्ता हैं जो मुसलमानों, ईसाईयों, दलितों, महिलाओं और आदिवासियों की भारत में वास्तविक स्थिति से दुनिया को अवगत करा रहे हैं।

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ऐसा लगता है कि भागवत का मुख्य लक्ष्य विश्वव्यापी एकता को बढ़ावा देना नहीं बल्कि भारत में उसके द्वारा किए गए भयावह कार्यों पर पर्दा डालना है। धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, स्वतंत्र प्रेस, भूख और प्रसन्नता संबंधी वैश्विक सूचकांकों पर भारत की स्थिति में गिरावट और आरएसएस-बीजेपी का उदय एक-दूसरे के समांतर हुआ है। भागवत नफरत की राजनीति को छिपाने की अपनी ‘चतुराई‘ के लिए प्रशंसा के पात्र हैं।

यह भी हो सकता है कि उनका लक्ष्य विविधता का मुखौटा लगाकर, अमेरिका और दुनिया के अन्य देषों में हिन्दू लॉबी को सशक्त करना हो। भारत में शांति कायम रखने के लिए जरूरी है कि हम भारतीय संविधान का पालन करें, जिसका विरोध संघ परिवार करता है। वैश्विक एकता स्थापित करने का सर्वोत्तम माध्यम है संयुक्त राष्ट्र संघ का मानवाधिकार घोषणापत्र। इस दौर में, जब सारी दुनिया एक गांव बन गई है, हिन्दू धर्मग्रंथों को उद्धृत करना एकदम गलत है। इससे हिन्दू श्रेष्ठतावादियों का असली इरादा बेनकाब होता है।

(लेख का अंग्रेजी से हिंदी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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