विचार

मृणाल पाण्डे का लेख: कोविड ग्रस्त इलाकों पर अब तूफान का कहर, किसकी गलतियों की सजा भुगत रहा आम आदमी?

ऊपरी तौर से यह बात सुनने में अजीब सी लगेगी। लेकिन इन दिनों देश के धुर उत्तर (हिमालय के इलाके) और धुर दक्षिण (तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल) के तटवर्ती क्षेत्र में हर साल मचती तबाही के पीछे कुदरत का तेजी से बिगाड़ा जा चुका असंतुलित समीकरण है।

फोटो: सोशल मीडिया 
फोटो: सोशल मीडिया  

ऊपरी तौर से यह बात सुनने में अजीब सी लगेगी। लेकिन इन दिनों देश के धुर उत्तर (हिमालय के इलाके) और धुर दक्षिण (तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल) के तटवर्ती क्षेत्र में हर साल मचती तबाही के पीछे कुदरत का तेजी से बिगाड़ा जा चुका असंतुलित समीकरण है। लंबे समय से पर्यावरण के विशेषज्ञ और अमिताव घोष जैसे रचनात्मक लेखक हमको समुद्र के बढ़ते जल स्तर, बदलते तापमान और सरकारी ‘विकास कार्यों’ के लिए कुदरती नियमों में बेतरह छेड़छाड़ से आगे हिमालय के ग्लेशियर पिघलने, भूस्खलन और नदियों में भीषण बाढ़ आने की चेतावनी दे रहे थे। हमको यकीन था कि अनादि काल से बर्फीली चोटियों से बहती रही पयस्विनी नदियों का यह देश ईश कृपा से हर हाल में शस्य श्यामल बना रहेगा। यही नहीं तेजी से सार्स या एड्स जैसी वैश्विक महामारियों ने भी सरकारी भौंहों पर शिकन नहीं आने दी। हम कहते रहे कि हमारे पास हर मर्ज के लिए रामबाण औषधीय जड़ी-बूटियों का अथाह भंडार ही नहीं है, हम तो एलोपैथी चिकित्सा के क्षेत्र में भी सारी दुनिया को दवाएं निर्यात करने में अग्रणी हैं। आने दो महामारियों को, हम निपट लेंगे। कोविड-19 की आमद के बाद कई महीनों तक हमारे भाग्य विधाता इसी मान्यता पर ‘विकास’ की योजनाएं बनाते-चलाते रहे।

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2020 में महामारी बढ़ने पर अचानक तालाबंदी की गई, लेकिन विकास की सरकारी समझ को पटरी पर लाने का काम कौन करता जब ठकुर सुहाती ही कुर्सी बचाने का जरिया बन जाए? वन काट कर पर्यटन और वाणिज्य को आसान बनाने के लिए सड़कें बनवाने, या नाजुक क्षेत्रों में नदियों के कुदरती तटबंध तोड़कर वहां टूरिस्ट होटल बनाने और बाढ़, सुखाड़ या आर्थिक नुकसान पर सब चुप रहे। उन्नत सूचना तकनीकी, मेडिकल शोध-बोध संस्थानों और पर्यटन केंद्र की मेगा इमारतें हर जगह बन ही रही थीं, कि उत्तराखंड में धार्मिक टूरिज्म नाम की नई प्रजाति की गाय दरवाजे पर बंध गई। कोविड की मार से तड़पती दिल्ली की अनदेखी करते हुए अच्छे दिन का सपना जीते स्थानीय नेताओं ने कुंभ का घट लपक लिया। बाकायदा सरकारी पोस्टर-विज्ञापन लगा कर भीड़ को बुलाया गया। बंगाल चुनाव को आठ चरणों में फैलाया गया। बड़ी-बड़ी चुनाव रैलियों को आयोजित किया गया। वही हुआ जिसका उनको अंदेशा था।

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इस बीच कुदरती संतुलन में लगातार पैसा कमाई की नीयत से किया गया हस्तक्षेप यह दिन ले आया है कि केदारनाथ से कन्याकुमारी तक महामारी का तांडव जारी है और रुष्ट प्रकृति चक्रवाती तूफानों और भूस्खलन से कुछ ही घंटों में इलाकों का नक्शा मलबे में बदल कर उसे बहा रही है। आज भी चुनाव केंद्र सरकार के लिए अश्वमेधी अश्व है। यह अश्व दिग्विजय को छोड़ा गया तो लोकतंत्र सामंतंत्र बन जाता है। संघीय गणतंत्र के नियम-कायदों को ताख पर रख कर केंद्र शासित गोवा, पुडुचेरी ही नहीं, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड, जैसे संपूर्ण राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले स्वास्थ्य, शिक्षा या खेती जैसे जनता के जीवन मरण के विषयों पर स्वायत्त फैसले स्थगित हो गए। चुनाव हुए तो चुनाव आयोग महामारी के बढ़ने के खतरों पर खामोश रहा। भीड़ भरी रैलियों, धार्मिक आयोजनों और मेले-ठेलों, किसी पर रोक नहीं लगी। और अब देशवासी कोविड की दूसरी लहर की भीषण मार झेल रहे हैं जिसका स्रोत कुंभ तथा रैलियों को बताया जा रहा है। इस समय वैक्सी नहीं महामारी की बाढ़ रोकने की इकलौती राह है। पर अधिकार प्रिय केंद्र ने भारत में वैक्सीन उत्पादन और वितरण के नियमन अपने ही हाथों में रखे। यही नहीं, पिछले सालों में गांवों में जन स्वास्थ्य का काम करती रही गैर सरकारी संस्थाओं के कुछेक प्रतिनिधि नाना अपराधों में लिप्त बता कर गैर जमानती धाराओं की तहत जेल भेज दिए गए। शेष के लिए भी विदेशों से मिलने वाली वित्तीय मदद पाना असंभव बना दिया गया। शक के दायरों में लाल फीतों में जकड़े जनसेवी सघन काम को बंद करने को मजबूर होने लगे। उधर, चिकित्सा क्षेत्र लगातार निजीकृत और मंहगा हो गया। इस सबसे अवध्य गाय बनी कई दवा कंपनियों का मुनाफा बढ़ा और वे कोविड ग्रस्त अमीर देशों से अग्रिम पैसा लेकर उनको जीवन रक्षक टीके तथा दवाएं बाहर निर्यात करने लगे। शुरू में इसे विदेश नीति में गुडविल जीतना बताया गया।

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गोमूत्र के कोविड निरोधक गुणों पर मीडिया में प्रचार करते बाबाओं, साध्वियों और काली चॉकलेट खाकर रोग से बचने की नेक सलाह दे रहे मंत्रियों ने संगीन स्थिति में भी कोई विज्ञान सम्मत सलाह नहीं दी। महामारी के शिकारों, दैनिक मौतों की बाबत जरूरी डेटा जमा करने की बजाय उसे अपने स्तर से देने वाले देशी-विदेशी अखबारों और मान्य संस्थाओं को भारत विरोधी कहा गया। ऐसे माहौल में सरकारी कमेटियों में बिठाए गए कुछे जमीर वाले चिकित्सक त्यागपत्र देकर अलग हो गए। उधर, कई असली-नकली दवा निर्माताओं द्वारा आर्थिक तराजू पर नकली बांट रख कर माल तौला जाना जारी है। महामारी का महाकेंद्र बनी दिल्ली में मुख्यमंत्री के लगभग सारे बड़े अधिकार केंद्र द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल को दे दिए गए। और कई मीडिया कर्मियों, जिन्होंने जनता और सरकार का ध्यान गलत आंकड़ों और नकली दवाओं की तरफ खींचा, को दंडित किया गया। देश के सम्मानित आंकड़े जमा करने वाले शोध संस्थानों, विश्वविद्यालयों, उच्च मेडिकल शोध केंद्रों में सैकड़ों विशेषज्ञ जो पर्यावरण और रोगों की बाबत दशकों से जमा जानकारियों के भंडार थे, उनके सघन ज्ञान और अनुभव के ऊपर धार्मिक ढकोसलों, यज्ञ, भजन, पंचगव्य सेवन और प्रोन्नतिया सेवानिवृत्ति के बाद मलाईदार पद पाने को उत्सुक सरकारी बाबुओं की ठकुर सुहाती भरी राय को तवज्जो मिलती रही। अब तो दादुर बोलि हैं हमहि सुनेगो कौन, कहने वाली किसी कोकिला की तरह उन्होने अंतत: मौन साध लिया।

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दुनिया तथा भारत में उपभोग तथा बंटवारे का पलड़ा हमेशा से अमीर देशों और स्वदेशी अमीरों के पक्ष में भारी रहा है। अमीर लोग स्वार्थी तो होंगे ही, खासकर जब उनकी अपनी जान पर बन आई हो। सो अब यूरोपीय महासंघ, ब्रिटेन, कनाडा या अमेरिका, जो हमसे टीके पा चुके हैं, हमारी जरूरत को दरकिनार कर अपने यहां बने टीके को पहले अपने ही लोगों को देने के पक्ष में हैं। सरकारी कैलेंडर में हमारे दो बड़े कोविड टीका निर्माताओं : भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, को उनकी शुरुआती सफलता के बाद भी सरकार द्वारा सही समय पर थोक ऑर्डर और उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए। लिहाजा वे कहते हैं कि जितनी तादाद में हमको टीके चाहिए, उतने देने में वे असमर्थ हैं। बहुत दबाव पड़ा तो निजी कंपनी के मालिक सपरिवार ब्रिटेन चले गए कि भारत में उनपर नेता और बड़े लोगों का भारी दबाव उनके लिए खतरा बढ़ा रहा है। लो कल्लो बात!

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यह दु:खद है कि जब जनता को आश्वस्ति की सबसे ज्यादा जरूरत है, मसीहाई नेता दुबके हुए हैं। जवाब तलबी के कुछ पोस्टर चिपकाने के अपराध में 17 लोग जेल में डाल दिए गए हैं। और बेदम बना दिए गए गैर सरकारी स्वैच्छिक संगठनों, छंटनी और विभागीय उठापटक के शिकार बनाए गए शिक्षण संस्थाओं के छात्रों, शिक्षकों का देश हित में पीड़ितों की मदद करने का आह्वान किया जा रहा है। सरकारी प्रवक्ता कहते हैं कि न्यस्त राजनीतिक स्वार्थ, सत्तारूढ़ दल और उनके बड़े नेताओं का नाम नाहक बदनाम करने के लिए फेक खबरों और पोस्टरों द्वारा संक्रमण और मौत के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहे हैं। पार्टी के एक बड़े प्रवक्ता ने तल्खी से पूछा कि क्या पहले विपक्षी दलों के शासनकाल में कभी बड़ी तादाद में गंगा जी में लाशें तैरती नहीं देखी गईं? एक अन्य सम्मानित नेता ने कहा कि जो मर गए सो तो मुक्त हो गए। अब तो हम जो बाकी बचे हैं हमको ही मिलजुल कर समस्या से निबटना होगा।

मीडिया का आज यह काम ही नहीं, उत्तर दायित्व भी बनता है कि वह जोखिम उठा कर भी समाज के दीन अनसुने लोगों की जायज आशंकाओं और चिंताओं को उजागर करने का दायित्व गंभीरता से निभाए। जिस आबादी और ज्ञान संपदा को हमने बचाना है वह अगर हमारी असावधानी या डर से साधी गई चुप्पी से नष्ट होती है, तो उस नुकसान की आपूर्ति तकरीबन असंभव होगी।

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