
वर्ष 2014 से पहले अधिकतर सांसदों और विधायकों के सामने कोई गुस्से में आकर शिकायत करता था तब भी सांसद/विधायक शांति से उसकी बात सुनते थे और आश्वस्त करते थे। इसके बाद से शांति का वह दौर विलुप्त हो चुका है, अब तो सत्ताधारी सांसद/विधायक ही नहीं बल्कि बीजेपी का कोई छुटभैया नेता और यहां तक कि बीजेपी नेताओं के परिवार वाले भी अपने आप को चक्रवर्ती सम्राट और आम जनता के साथ ही विपक्षी दलों के नेताओं को भी इंसान से कमतर समझने लगे हैं।
अपशब्दों, अमर्यादित आचरण, भड़काऊ, हिंसक भाषणों, ध्रुवीकरण वाले वक्तव्य से भी आगे बढ़कर अब तो कैमरे के सामने मंत्री थप्पड़ भी जड़ने लगे हैं। मामला यहीं खत्म नहीं होता, थप्पड़ मारने के बाद मनगढ़ंत कहानियों द्वारा इसे जायज भी ठहराने लगे हैं। फिर पुलिस की क्या मजाल कि उसे थप्पड़ दिखाई भी पड़े, जैसे सत्ताधारियों द्वारा उगले गए हिंसक वक्तव्य सुनाई नहीं पड़ते हैं। न्यायालय बार-बार अपने फैसलों से साबित करता जा रहा है कि न्याय आम आदमी के लिए नहीं है, इसका मकसद सत्ता के काले कारनामों को न्यायिक तौर पर सफेद दिखाना है।
सोशल मीडिया के इस दौर में एक हिंसक सत्ता और मीडिया किस तरह से एक बड़ी आबादी को हिंसक बना सकती है, इसका उदाहरण खोजने के लिए अब अफगानिस्तान, सीरिया या फिर सूडान जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि भारत भी इन्हें देशों के समकक्ष पहुंच चुका है। एक मुख्यमंत्री ने बुलडोजर को इस हद तक जनता के बीच पोपुलर कर दिया है कि अब जनता “बुलडोजर न्याय” की मांग करने लगी है। जनता लिन्चिंग और एन्काउनटर को जायज ठहराने लगी है। पूरे समाज में हिंसा और घृणा भर देना ही बीजेपी राज की सबसे बड़ी उपलब्धि है। जिस हिसाब से नेता थप्पड़ मारने, बुलडोजर के विध्वंसक उपयोग और तमाम अपराधों का महिममंडन कर रहे हैं, उससे तो लगता है कि अगले कुछ वर्षों में नेता कारों के काफिले में नहीं बल्कि टैंकों के काफिले में सड़कों पर नजर आएंगे, विरोधियों पर गोला/रॉकेट बरसाएंगे और जनता स्वागत में तालियां बजाएगी।
तालियों के कुछ उदाहरण तो हम अभी ही देख रहे हैं– आम जनता गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई को जायज ठहराने लगी है, इसके फायदे गिनाने लगी है। एक तर्कहीन समाज निश्चित तौर पर मानसिक विकारों से घिरा होता है, और मानसिक विकारों के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है। अपराधी तो थे ही, अब मानसिक विकारों से ग्रस्त लोग सत्ता पर काबिज हैं, मीडिया संस्थान चला रहे हैं और जनता को केवल गुमराह ही नहीं कर रहे हैं बल्कि मानसिक रोगी बना रहे हैं।
समस्या यह है कि मानसिक विकारों से हम जूझते रह जाते हैं पर कभी इससे सम्बंधित विशेषज्ञों से सलाह नहीं लेते। विश्व स्वास्थ्य संगठन अनेक बार इस बारे में रिपोर्ट प्रकाशित कर चुका है, और भारत को सर्वाधिक अवसाद वाला देश घोषित कर चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में 15 प्रतिशत रोग मानसिक कारणों से हैं, पर भारत में यह इससे भी अधिक है। दूसरी तरफ हमारा देश एक ऐसा देश है, जहां इसकी कोई चर्चा नहीं होती और ना ही कोई पैमाना है जिससे पता किया जा सके की कोई मानसिक तौर पर स्थिर है या अस्थिर। जाहिर है इसी कारण मनोविज्ञान के क्षेत्र में हम पिछड़े देशों में शुमार किये जाते हैं। हमारे देश में प्रति एक लाख लोगों पर 0.301 मनोचिकित्सक और महज 0.047 मनोवैज्ञानिक हैं।
बहुत कम लोगों को पता होगा कि वर्ष 1950 के द रेप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट की धारा 16 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मानसिक तौर पर स्वस्थ्य नहीं है तो वह मतदाता नहीं बन सकता और ऐसा कोई भी व्यक्ति संविधान के अंतर्गत बताये गए पब्लिक ऑफिस, जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मंत्री, संसद सदस्य और विधायक नहीं बन सकता। यह कानून आज भी लागू है, पर क्या आपने कभी देखा है कि मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आपसे कहा गया हो कि किसी मनोचिकित्सक का सर्टिफिकेट लेकर आओ की तुम मानसिक तौर पर स्वस्थ्य हो? या फिर कभी आपने सुना है, संसद सदस्य या विधायक के चुनाव में खड़े उम्मीदवारों से ऐसा कोई सर्टिफिकेट मांगा गया हो या फिर इनका कोई मानसिक स्वास्थ्य जांचने के लिए परीक्षण किया जा रहा हो? जाहिर है, कानून में शामिल करने के बाद भी मानसिक स्वास्थ्य की शर्तों को भुला दिया गया है, नकार दिया गया है। यह ठीक वैसा ही है जैसे सत्ता हमारे भारतीय नागरिक होने को नकार रही है।
कोई भाषणों के बीच में बार-बार आंसू बहाता है, कोई कहता है मुझे चौराहे पर मारना, कोई बलात्कारी से कहता है कि जिसका बलात्कार किया है उससे शादी कर लो, कोई कोविड 19 से असमय होने वाली मौतों को भगवान की मर्जी बताने लगता है, कोई मताधिकार से जनता को वंचित कर रहा है, कोई माइक थामते ही हिंसक भाषा का इस्तेमाल करने लगता है, कोई अपने आप को नॉन-बायोलाजिकल बताने लगता है, कोई थप्पड़ मारता है, कोई बुलडोजर से फूलमाला बरसवा रहा है– यदि आप मानसिक रोगी नहीं हैं, तो ध्यान देकर सोचिये कि मानसिक तौर पर स्वस्थ्य कोई भी व्यक्ति ऐसे वक्तव्य दे सकता है?
वर्ष 2017 में इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च ने देश में मानसिक स्वास्थ्य पर एक बड़ा अध्ययन किया था, इसे स्वास्थ्य विज्ञान से सम्बंधित प्रतिष्ठित जर्नल लांसेट ने प्रकाशित किया था। इस अध्ययन के नतीजे चौकाने वाले थे, इसके अनुसार देश में हरेक सातवां व्यक्ति मानसिक तौर पर बीमार है। देश के कुल 18 करोड़ नागरिक मानसिक व्याधियों से घिरे हैं। देश में अवसाद से लगभग 4.6 करोड़ और तनाव से 4.5 करोड़ आबादी ग्रस्त है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इस दौर में अवसाद एक महामारी की तरह फैल रहा है।
नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे के अनुसार, देश में 15 करोड़ से अधिक आबादी मानसिक रोगों से ग्रस्त है, पर महज 3 करोड़ से भी कम आबादी इसके लिए किसी विशेषज्ञ की सलाह ले रही है। मानसिक रोगों से घिरी आबादी में आत्महत्या की दर अधिक रहती है, और आत्महत्या के सन्दर्भ में हमारा देश विश्वगुरु है।
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यूरोपियन जर्नल ऑफ पॉलिटिकल रिसर्च में यूनिवर्सिटी ऑफ एम्स्टर्डम के मनोवैज्ञानिकों और समाज वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, मनोविकार ग्रस्त राजनेता समाज की समरसता बर्बाद का देते हैं और सामाजिक ध्रुवीकरण को खूब बढ़ा देते हैं– यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसी फूट डालो और राज करो वाली राजनीति। इस अध्ययन के अनुसार दुनिया में अहंकारी, आत्ममुग्ध, मनोरोगी और कपटी नेताओं का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है और इसके साथ ही सामाजिक ध्रुवीकरण भी पहले से अधिक खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है।
ऐसे नेता अपने समर्थकों के बीच समाज के एक वर्ग और विपक्ष के प्रति लगातार हिंसक और वैमनस्य वाली भाषा का प्रयोग कर ही अपने आप को महान दिखाते हैं। समर्थक अपने नेताओं को सही मानकर सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हैं। मतदाता वैचारिक तौर पर ऐसे कपटी और मनोरोगी नेताओं के नजदीक होते हैं और इन्हें ही जीत कर सत्ता में पहुंचा रहे हैं। इससे समाज में वैमनस्य लगातार बढ़ता जा रहा है, पर सत्ता में बैठे नेताओं को अगले चुनावों में जीत का यही एकलौता रास्ता पता है। ऐसे नेताओं के कारण समाज में जातिगत और धार्मिक हिंसा लागातार बढ़ती जा रही है।
अहंकारी और मनोरोगी नेता एक रणनीति, बेईमानी, जोड़-तोड़, विपक्ष का चरित्र हनन, कुप्रचार और सामाजिक ताना-बाना को रौंदते हुए सत्ता तक पहुंचते हैं। यही कपटी नेताओं का चारित्रिक गुण है, राजनैतिक विशेषता है और ऐसे नेताओं का अपना एजेंडा होता है जिसे वे सत्ता में आकर पूरा करते हैं। ऐसे नेताओं के समर्थक अधिक संख्या में, उग्र और हिंसक होते है और ऐसे नेता जैसे ही सत्ता में पहुंचते हैं अपनी हिंसक भाषा और व्यवहार से जनता के बीच पहले से अधिक हिंसा बढ़ाते हैं और सामाजिक ध्रुवीकरण भी। यही इन नेताओं का तुष्टीकरण है और एजेंडा भी। समर्थक अपने नेताओं को सही मानते हैं और उन्हीं का शिद्दत के साथ अनुसरण करते हैं।
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ऐसे समर्थक विपक्षी और लिबरल नेताओं के तथ्य से परिपूर्ण बातों पर नहीं बल्कि अपने नेताओं के अनर्गल प्रलाप पर भरोसा करते हैं। हमारे अपने राजनेता ही हमें अधिक उग्र, असहिष्णु और हिंसक बना रहे हैं और हम आंखें बंद कर उनका समर्थन कर रहे हैं। एक अजीब तथ्य यह भी है कि राजनैतिक और आर्थिक अस्थिरता के दौर में समाज चरम कट्टरपंथी और भाषाई बाहुबली नेताओं पर अधिक भरोसा करने लगता है। यह इन मनोरोगी और कुटिल राजनेताओं को भी पता है, तभी सत्ता में आने से पहले ऐसे राजनेता सामाजिक अस्थिरता बढ़ाने में लिप्त रहते हैं और अपने समर्थकों के बीच यह संदेश पहुंचाने में व्यस्त रहते हैं कि सत्ता का विकल्प केवल कट्टरपंथी नेता ही हैं।
यदि देश का यही हाल रहा और सत्ता निरंकुश रही तो निश्चित तौर पर आने वाले वर्षों में देश की पूरी आबादी मानसिक रोगों की चपेट में होगी। देश की सत्ता जिन हाथों में है, वे सभी मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं। सत्ता का आधार विपक्ष, विकास, इतिहास और व्यवस्था पर लगातार बोला जाने वाला धाराप्रवाह झूठ है। इसमें से अधिकतर झूठ ऐसे होते हैं, जिनकी तालियों और नारों से परे कोई उपयोगिता नहीं होती, पर झूठ उगलने की ऐसी लत है कि संसद से लेकर चुनावों तक झूठ ही झूठ बिखरा पड़ा है। बचपन, शिक्षा, परिवार, कामकाज– सबमें केवल झूठ। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि लगातार जाने-अनजाने झूठ बोलना महज झूठ नहीं है बल्कि एक गंभीर मानसिक रोग है। जब झूठ बोलने की ऐसी लत लगी हो जिसमें सच खोजना भी कठिन हो तब उसे पैथोलॉजिकल लाइंग कहा जाता है और हमारे सत्ता के शीर्ष पर बैठे आकाओं में यही लक्षण हैं।
ऐसा तो संभव ही नहीं है कि देश में इतनी बड़ी आबादी के मनोरोगी होने के बाद भी हमारे जनप्रतिनिधि इससे अछूते हों। आश्चर्य यह है कि इस बारे में मनोचिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों ने पूरी खामोशी बरती है, कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है। जनप्रतिनिधियों के साथ ही मेनस्ट्रीम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो पूरी तरह से मनोरोगियों से भरा पड़ा है। कहीं हम मनोरोगी सांसदों और विधायकों के सन्दर्भ में विश्वगुरु तो नहीं बन रहे हैं?
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