विचार

राम पुनियानी का लेखः धार्मिक त्यौहार बने नफरत फैलाने के औजार, आखिर ये सांप्रदायिकता हमें कहां ले जाएगी?

भारत मिलीजुली संस्कृति वाला देश रहा है। यहां त्यौहार मेल-मुलाकात के मौके होते हैं, वे हमें रोजमर्रा की नीरस जिंदगी से थोड़े समय के लिए निजात दिलवाते हैं। लेकि साम्प्रदायिकता हमारे जीवन के इस सुहावने पहलू को हमसे छीनती जा रही है।

धार्मिक त्यौहार बने नफरत फैलाने के औजार, आखिर ये सांप्रदायिकता हमें कहां ले जाएगी?
धार्मिक त्यौहार बने नफरत फैलाने के औजार, आखिर ये सांप्रदायिकता हमें कहां ले जाएगी? फाइल फोटो: Getty Images

बकरीद मुसलमानों का दूसरा सबसे बड़ा त्यौहार है। यह कुर्बानी का त्यौहार है। यह पैगम्बर इब्राहिम की अल्लाह के प्रति दृढ़ आस्था के सम्मान में मनाया जाता है। वे अल्लाह की आज्ञानुसार अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए तैयार थे। लेकिन उसके पहले ही अल्लाह ने उनके पुत्र की जगह एक मेढ़ा रख दिया। इस त्यौहार पर आर्थिक दृष्टि से सक्षम मुसलमान बकरे, भेड़, गाय या ऊंट की कुर्बानी की रस्म निभाते हैं। ऐसा पैगम्बर इब्राहिम द्वारा दी गई कुर्बानी के प्रतीकात्मक अनुसरण बतौर किया जाता है।

मुसलमानों के लिए यह आध्यात्मिक त्यौहार होता है जो कुर्बानी और सांझेपन की भावना पर आधारित है। कुर्बान किए गए जानवर का मांस तीन हिस्सों में बांटा जाता है और इस नियम के कड़ाई से पालन की अपेक्षा की जाती है। एक हिस्सा परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए और तीसरा गरीबों और जरूरतमंदों के लिए होता है। इससे जाहिर है कि हमदर्दी, दान और सामुदायिक एकता के भाव इस्लाम में कितने अहम हैं।

Published: undefined

एक लंबे समय से हिंदू त्यौहारों का इस्तेमाल मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाने के लिए किया जाता रहा है। और अब मुस्लिम त्यौहारों का भी उपयोग मुसलमानों के प्रति घृणा फैलाने के लिए हो रहा है। इस साल बकरीद पर मुंबई के मुस्लिम समुदाय को कुर्बानी की रस्म अदा करने में तरह-तरह की मुश्किलात का सामना करना पड़ा। नगरपालिका के नियमों और मुंबई हाईकोर्ट के 2019 के आदेश में आवासीय परिसरों (मगर घर के अंदर नहीं) में कुर्बानी देने की अनुमति कुछ शर्तों के साथ दी गई है।

इस साल तीन आवासीय सोसायटियों में अंतिम क्षणों में अनुमति वापिस ले ली गई। ऐसा मुख्यतः बीजेपी से जुड़े राजनीतिज्ञों (इनमें से एक बीजेपी की राज्य शाखा के उपाध्यक्ष कीरत सोमैया थे) के हस्तक्षेप और बजंरग दल और विहिप कार्यकर्ताओं की जिद की वजह से हुआ। इससे सामान्य जनता और मीडिया का ध्यान इस ओर गया और मुसलमानों के प्रति नफरत भड़की।

Published: undefined

स्वतंत्र पत्रकार ज्योति पुनवानी फ्रंटलाईन में प्रकाशित अपने लेख में लिखती हैं ‘‘हर स्थानीय और बहुत से राष्ट्रीय टीवी चैनलों ने यह खबर बार-बार प्रसारित की और साथ में अवासीय सोसायटियों से बकरे बाहर ले जाते मुसलमानों के वीडियो लगातार दिखाए। इसका नतीजा यह हुआ कि एक समुदाय को अपने दूसरे सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार के दौरान तकलीफ और परेशानी से गुजरना पड़ा। सोशल मीडिया पर मुसलमानों के प्रति नफरती संदेशों की बाढ़ आ गई, जो हमेशा की तरह अर्धसत्य और अतिरेक पर आधारित थे‘‘। पुनवानी बताती हैं कि इन तीनों आवासीय परिसर में कई वर्षों से कुर्बानी दी जा रही थी। यह इस तथ्य के बावजूद कि इनके रहवासियों में हिन्दुओं का बहुमत है। ऐसी एक सोसायटी में बकरों को परिसर में ही रखा गया और ईद के दिन कुर्बानी के लिए निर्धारित स्थान पर ले जाया गया।

इस वर्ष मीरा रोड की एक सोसायटी में बहुत हंगामा हुआ। पूनम एस्टेट क्लस्टर में 25 मई की दोपहर और 26 मई की सुबह गंभीर साम्प्रदायिक तनाव के हालात उत्पन्न हो गए। वहां पिछले सालों की तरह पशुओं को परिसर के अंदर एक अस्थायी शेड में रखा गया था। बजरंग दल और विहिप के कई कार्यकर्ताओं ने यह कहते हुए हंगामा बरपा दिया कि पशुओं को परिसर के अंदर नहीं रखा जा सकता। इससे किसी नियम का उल्लंघन नहीं हो रहा था, इसके बावजूद पुलिस और महानगरपालिका के अधिकारियों ने तनाव उत्पन्न करने वालों का साथ दिया। इस सबसे बढ़कर, कार्यकर्ता मुसलमानों को भयभीत करने के लिए परिसर के अंदर कई सुअर ले आए।

Published: undefined

सामान्यतः त्यौहार शांति और आनंद का संदेश लाते हैं। लेकिन विहिप-बजरंग दल और उनके जैसी मानसिकता के अन्य तत्व इन अवसरों पर भी साम्प्रदायिक तनाव फैलाने से बाज नहीं आते। भारत में मिलजुल कर त्यौहार मनाने और धर्मों की सीमाओं से ऊपर उठकर घुलमिल कर रहने की लंबी परंपरा रही है। लेकिन इस तरह की घटनाओं से बहुत तनाव उत्पन्न हो जाता है। यह तनाव समाज में बढ़ती साम्प्रदायिकता के साथ बढ़ता जा रहा है।

हमने विगत वर्षों में देखा है कि मुस्लिम युवकों को, विशेषकर गुजरात में, गरबा में भाग लेने की इजाजत नहीं दी जाती। गरबा पंडालों में प्रवेश के पहले सख्ती से आधार कार्डों की जांच की जाती है। धमकी भरे लहजे में चेतावनी दी जाती है कि जुमे की नमाज सड़क पर न पढ़ी जाए। यहां तक कि हिन्दू उत्सवों पर भी मुसलमानों को परेशानियां झेलनी पड़ती हैं।

दूसरी ओर कांवड़ यात्राओं के दौरान सड़कों पर नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं और फलों और खाद्य साम्रग्री के विक्रेताओं को अपना नाम दुकान या ठेले पर लिखने को बाध्य किया जाता है। इसके पीछे उद्देश्य यह होता है कि यात्राओं में शामिल लोग मुस्लिमों के होटलों या दुकानों से कुछ न खरीदें। ‘शुद्धता-प्रदूषण‘ के इन नियमों पर अमल सरकारी मशीनरी की मदद से करवाया जाता है।

Published: undefined

रामनवमी और जनमाष्टमी के जुलूसों के चरित्र में आमूल परिवर्तन आ गया है। अपने बचपन में मैं इन जुलूसों में खुशी-खुशी शामिल होता था क्योंकि रास्ते पर मौजूद हर व्यक्ति को प्रसाद दिया जाता था। यहां तक कि मुसलमानों के कई समूह जुलूस में शामिल लोगों के लिए शरबत के स्टॉल लगाते थे। अब ये जुलूस मुस्लिम बहुल इलाकों से निकाले जाते हैं और उस दौरान मुस्लिम विरोधी नारे लगाए जाते हैं। अतिउत्साही तत्व मस्जिदों के सामने नाचते हैं और गालियों व अपशब्दों से भरपूर नारे लगाते हैं। इस सबसे आगे बढ़कर कुछ लोग मस्जिद के शिखर पर चढ़ जाते हैं और वहां फहरा रहे हरे झंडे को हटाकर भगवा झंडा लगा देते हैं। यह कई मौकों पर हुआ है।

यह नफरत हमें आखिर कहां ले जाएगी? यह एक तकलीफदेह सवाल है। भारत मिलीजुली संस्कृति वाला देश रहा है। हमारी संस्कृति ‘अन्य धाराओं‘ से समृद्ध हुई है, हमने अन्य धाराओं को आदर दिया है और मिलजुलकर उत्सव मनाये हैं। त्यौहार मेल-मुलाकात के मौके होते हैं, वे हमें रोजमर्रा की नीरस जिंदगी से थोड़े समय के लिए निजात दिलवाते हैं। साम्प्रदायिकता हमारे जीवन के इस सुहावने पहलू को हमसे छीनती जा रही है।

Published: undefined

इरफान इंजीनियर और नेहा दाभाड़े द्वारा किया गया एक अध्ययन, जिसका विषय ‘वेपनेजाईनेशन ऑफ हिन्दू फेस्टिीवल्स (हिन्दू त्यौहारों का सशस्त्रीकरण) था, त्यौहारों के दुरूपयोग के खतरों के बारे में हमारी आंखें खोल देता है। धर्म आधारित नफरत जैसे-जैसे और ऊंची दीवारें खड़ी कर रही है, मुस्लिम समुदाय को अधिकाधिक डरावने माहौल का सामना करना पड़ रहा है। यह निश्चित ही हमारे समाज की एक बड़ी समस्या है। यह हमारे संवैधानिक मूल्यों पर हमला है, खासकर बंधुत्व के केन्द्रीय मूल्य पर।

समाज के विभिन्न वर्गों के बीच प्यार और सामंजस्य दोबारा कायम करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की जरूरत है। यह हमारे लोकतंत्र को जीवित और सेहतमंद रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

Published: undefined

Google न्यूज़व्हाट्सएपनवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia

Published: undefined