
गणेशोत्सव करीब आ चुका है। 14 सितंबर से शुरू होने वाले इस पर्व से पहले पुणे के प्रगतिशील तबकों और रूढ़िवादी ताकतों के बीच उत्सव के दौरान डीजे और कानफोड़ू साउंड सिस्टम के इस्तेमाल को लेकर विवाद छिड़ गया है।
विवाद की शुरुआत 25 अगस्त को नगर निगम प्रशासन द्वारा बुलाई गई सार्वजनिक बैठक से हुई, जहां 37 वर्षीय विद्यानंद बापट को अपमानित कर निकाल बाहर किया गया था। शहर के केन्द्र में स्थित नारायण पेठ के रहने वाले बापट खुद को नास्तिक और तर्कवादी बताते हैं। उस बैठक में बापट ने गणेशोत्सव के दौरान डीजे, उच्च डेसिबल वाले साउंड सिस्टम और ढोल-ताशा के जुलूसों पर कड़ा ऐतराज जताया और सार्वजनिक स्थलों पर इनके इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की। उन्होंने ध्वनि प्रदूषण और यातायात में आने वाली भारी रुकावटों का मुद्द उठाया और अपने तर्क के पक्ष में ठोस आंकड़े भी दिए। गणेश मंडलों के लोगों को यह बात नागवार गुजरी और उनके समर्थक आक्रामक हो उठे। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस को बापट को सुरक्षित बाहर निकालना पड़ा।
इस टकराव का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और बापट की मुहिम रातों-रात पूरे शहर में बहस का मुद्दा बन गई। मराठी अखबारों, टीवी चैनलों, सोशल मीडिया और आम लोगों की जुबान पर यह चर्चा छा गई। शहर के जो नागरिक रातों की नींद हराम होने, सड़कें बंद होने और उत्सव के कानफोड़ू शोर को लेकर लंबे समय से परेशान थे, उन्हें मानो आवाज मिल गई। एक बीपीओ में काम करने वाले और सामाजिक रूप से प्रभावशाली कोकणस्थ (चितपावन) ब्राह्मण समुदाय से आने वाले बापट के समर्थन में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए।
30 अगस्त को ये लोग ‘गुड लक चौक’ पर जुटे। इसके बाद रविवार, 6 सितंबर को सैकड़ों लोगों ने मौन विरोध मार्च निकाला। उनका कहना था कि इन त्योहारों का अनियंत्रित शोर अब दहशत पैदा करने लगा है। उन्होंने साफ किया कि वे गणेशोत्सव के आयोजन के खिलाफ नहीं हैं, उनका विरोध कानफोड़ू डीजे और बेतहाशा शोर को लेकर है। इसपर बापट का कहना है कि बड़े साउंड सिस्टम और ढोल-ताशा की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि जब इन विशालकाय साउंड बॉक्सों की छूट मिलती है, तो डेसिबल के तय पैमानों को सुनिश्चित करना नामुमकिन हो जाता है। वह कहते हैं, ‘परंपरा के नाम पर किसी भी चीज की इजाजत नहीं दी जा सकती... इस तर्क से तो कोई यह भी कह सकता है कि सती प्रथा और बाल विवाह भी पुरानी परंपराएं थीं और उन्हें भी जारी रहना चाहिए।’
शहर के रूढ़िवादी तबकों को यह तार्किक सवाल रास नहीं आया। 3 सितंबर को स्थानीय गणेश मंडल के पूर्व अध्यक्ष संतोष चव्हाण ने बापट को सरेआम थप्पड़ जड़ दिया। दर्ज एफआईआर के अनुसार, चव्हाण ने उन्हें नास्तिक और ‘गणपति-विरोधी’ कहा। इस कायराना हमले ने पुणे के प्रबुद्ध नागरिकों के आक्रोश को और भड़का दिया।
ऑडियोलॉजिस्ट कल्याणी मांडके सालों से इस मुद्दे को जनस्वास्थ्य के गंभीर खतरे के रूप में उठाती रही हैं। 2024 में उन्होंने गणेशोत्सव के दौरान शोर पर नियंत्रण के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का दरवाजा खटखटाया था। इसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं। कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पुणे (सीओईपी) के अध्ययन में पाया गया कि लक्ष्मी रोड पर 2023 के उत्सव के विसर्जन वाले दिन औसत ध्वनि स्तर 105.2 डेसिबल तक पहुंच गया था, जो कि आवासीय क्षेत्रों के लिए तय दिन की 55 डेसिबल और रात की 45 डेसिबल की कानूनी सीमा से अधिक था।
अगस्त 2024 में गणेशोत्सव से ठीक पहले एनजीटी ने पंडालों और विसर्जन जुलूसों में ध्वनि स्तर की रियल-टाइम निगरानी, लाउडस्पीकरों की क्षमता के नियमन, ढोल-ताशा-झांझ वादकों की संख्या सीमित करने, नियमों के उल्लंघन पर साउंड सिस्टम जब्त करने और विसर्जन जुलूसों में डीजे पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी नगर निगम अधिकारियों को सड़कों पर अवैध अस्थायी ढांचों और अत्यधिक शोर के खिलाफ सख्त कार्रवाई का निर्देश देते हुए चेतावनी दी थी कि प्रशासन की निष्क्रियता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन माना जा सकता है। लेकिन एनजीटी के सख्त आदेश और हाईकोर्ट की गंभीर टिप्पणियां सत्ता और प्रशासन के बहरे कानों पर बेअसर साबित हुईं।
पुणे का इतिहास प्रगतिशील सोच और स्वयंभू ‘सनातनियों’ में तीखे और अक्सर हिंसक टकरावों से भरा रहा है। वास्तव में, थोपी गई परंपराओं पर तार्किक सवाल उठाना महाराष्ट्र की ऐतिहासिक परंपरा रही है। तेरहवीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर ने ‘ज्ञानेश्वरी’ के जरिये भगवद्गीता को जनभाषा मराठी में प्रस्तुत किया था। यह कोई आधुनिक तर्कवादी घोषणापत्र नहीं बल्कि एक धार्मिक ग्रंथ था, लेकिन उस दौर में संस्कृत ग्रंथ को आम जनता की भाषा में ले जाना अपने आप में एक क्रांतिकारी सांस्कृतिक कदम था। उस समय ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहनों को पुणे के अभिजात्य रूढ़िवादी वर्ग के भारी आक्रोश और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा था।
संत तुकाराम सहित वारकरी संत भी कोई आधुनिक धर्मनिरपेक्षतावादी नहीं थे। उनका विद्रोह धर्म और आस्था की परिधि के भीतर ही था। तुकाराम के भक्तिमय अभंगों ने कर्मकांडी आडंबरों, जातीय अहंकार और धर्म सत्ता पर चंद लोगों के एकाधिकार को चुनौती दी थी।
आगे चलकर ज्योतिराव फुले ने जातिगत पदानुक्रम और व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया। आगरकर और गोखले ने आधुनिक तर्क, विवेक और समाज-सुधार को अपनी राजनीति के केंद्र में रखा। पुणे का गणेशोत्सव-बल्कि पूरे महाराष्ट्र का समाज-आज भी इसी वैचारिक द्वंद्व और खिंचाव को समेटे हुए है।
1890 के दशक में बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरू किया गया आधुनिक सार्वजनिक गणेशोत्सव दरअसल औपनिवेशिक हुकूमत के खिलाफ जनता की लामबंदी और ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती देने के लिए एक क्रांतिकारी जन-मंच के रूप में उभरा था। लिहाजा, भगवान गणेश की पूजा तो एक प्राचीन परंपरा है, लेकिन गणपति को सड़कों पर लाकर जन-उत्सव बनाना कोई सदियों पुरानी परंपरा नहीं।
यह सार्वजनिक उत्सव भी एक सदी से अधिक के सफर में काफी बदल चुका है और आज इस पर एक खास राजनीतिक रंग चढ़ चुका है, जहां सत्ता से जुड़े राजनेता अपने वोट बैंक को लामबंद करने के लिए इन कानफोड़ू और दिखावटी आयोजनों पर पानी की तरह पैसा बहाते हैं। बापट की मुहिम दरअसल इसी गढ़ी गई आधुनिक ‘परंपरा’ को आईना दिखाने की कोशिश है। जहां तिलक ने गणेशोत्सव को सामाजिक चेतना और जन-लामबंदी का जरिया बनाया था, वहीं बापट आज यह सीधा सवाल पूछ रहे हैं कि क्या आस्था और उत्सव के नाम पर सड़कों पर मनमाने कब्जे को जायज ठहराया जा सकता है, खासकर तब जब वह नागरिकों के निजी जीवन और शांति के लिए खुला खतरा बन चुका हो?
सड़क वह सार्वजनिक स्थान है जहां हर नागरिक के अधिकार एक-दूसरे से जुड़ते हैं और टकराते हैं। किसी व्यक्ति या समुदाय के उत्सव मनाने के अधिकार को दूसरे नागरिक के बिना किसी बाधा के आने-जाने और सुरक्षित रहने के अधिकार का सम्मान करना होगा। आपके जश्न को मेरी शांति की इच्छा का आदर करना चाहिए। टकराव तब पैदा होता है जब एक विशेषाधिकार बाकी सब मानवीय और नागरिक अधिकारों को कुचल देना चाहता है।
बापट एक पल में ठेठ, धाराप्रवाह मराठी में अपनी बात रखते हैं और अगले ही पल सामाजिक सिद्धांतों के हवाले देते हुए उतनी ही सहजता से अंग्रेजी बोलने लगते हैं। उनकी यह शैली महाराष्ट्र की समृद्ध तार्किक वाद-विवाद की परंपरा को फिर से जीवंत करती है। बस माध्यम बदल चुका है-जहां पहले पर्चे और सार्वजनिक सभाएं वैचारिक अखाड़ा हुआ करती थीं, आज वही जगह सोशल मीडिया ने ले ली है।
बापट लगातार यह कहते रहे हैं कि उन्हें किसी की निजी आस्था से कोई ऐतराज नहीं। वह केवल एक नागरिक और जनस्वास्थ्य से जुड़े सवाल उठा रहे हैं। सार्वजनिक स्थलों पर लाउडस्पीकरों और ढोल-ताशा पर पूरी तरह पाबंदी लगाने की उनकी मांग शायद बहुत सख्त लग सकती है। यहां तक कि कुछ गणेश मंडलों ने भी सुझाव दिया है कि ढोल और स्पीकरों की संख्या सीमित करके और कानूनी डेसिबल सीमाओं का सख्ती से पालन करके बीच का रास्ता निकाला जा सकता है। लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा के कई नेताओं के लिए बापट की इन जायज नागरिक मांगों के आगे झुकने का सीधा मतलब उस सियासी रसूख और ध्रुवीकरण की जमीन को खोना है, जो उन्होंने उत्सव के राजनीतिक इस्तेमाल के जरिये तैयार की है।
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