
बिहास की राजधानी पटना के बीचो-बीच स्थित बांकीपुर में जन सुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी के गढ़ बांकीपुर में पार्टी को हरा दिया। यह सीट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के इस्तीफ़े के बाद खाली हुई थी। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के एक हफ़्ते बाद आए इस नतीजे को कई राजनीतिक जानकार छात्र आंदोलन के बाद सत्ताधारी भगवा पार्टी के ख़िलाफ़ एक तरह का जनमत संग्रह मान रहे हैं।
लेकिन वह एक बात जिसका जिक्र कम हो रहा है, वह यह है कि राम मंदिर ट्रस्ट से करोड़ों रुपये की कथित लूट ने भी 30 जुलाई को वोटिंग के दिन बीजेपी के बहुत सारे वोटर्स को बूथ तक आने से रोकने में अहम भूमिका निभाई, जिससे भगवा पार्टी की हार का रास्ता साफ हो गया। बीजेपी और उसके सहयोगियों की तमाम कोशिशों के बावजूद, इस सीट पर सिर्फ़ 34.31 फीसदी ही वोटिंग हुई, जो पिछले चुनाव के मुकाबले लगभग सात प्रतिशत कम और यहां अब तक की सबसे कम वोटिंग थी।
राम मंदिर फंड में बड़े पैमाने पर हेराफेरी का आरोप सामने आने के बाद बीजेपी की तरफ झुकाव रखने वाले मतदाताओं के एक बड़े हिस्से का पार्टी को लेकर उत्साह कम हुआ है। यहां महत्वपूर्ण है कि नीट का पेपर 3 मई को लीक हुआ था, लेकिन छात्रों का गुस्सा 20 जुलाई को फूटा—यानी 21 जून को दोबारा परीक्षा होने और उसके बाद नतीजे घोषित होने के लगभग एक महीने बाद।
शायद दिल्ली और भारत के दूसरे हिस्सों में आम लोगों का गुस्सा इतना ज़बरदस्त नहीं होता, अगर जून में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेताओं पर राम मंदिर को लेकर 'डकैती' का आरोप अंदर से ही न लगाया गया होता। इसके चलते बीजेपी कार्यकर्ताओं में अपने उम्मीदवार के लिए ज़ोर-शोर से प्रचार करने का नैतिक साहस नहीं रहा।
आखिर क्यों बांकीपुर चुनाव अलग था?
मध्य प्रदेश के दतिया और गुजरात के मंज़लपुर में हुए उपचुनावों के नतीजों पर मीडिया का ध्यान अपेक्षाकृत कम रहा। हालांकि, दतिया में बीजेपी के एक धड़े ने खुली बग़ावत की थी क्योंकि पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया गया था।
इसके बरअक्स, सबकी नज़रें बांकीपुर पर टिकी थीं, क्योंकि यहां बीजेपी के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा था। पार्टी के मौजूदा प्रमुख अप्रैल में राज्यसभा के लिए चुने जाने से पहले 2006 से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इससे पहले, उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा 1995 से 2005 तक, यानी अपनी मृत्यु तक, यहां के विधायक थे। वहीं दूसरी ओर, दतिया में मौजूदा कांग्रेस विधायक के अयोग्य घोषित होने के बाद चुनाव हुए, जबकि बीजेपी विधायक की मृत्यु के बाद मांजलपुर सीट खाली हुई थी।
नितिन नवीन के बिहार के तीन दौरे, उनका घर-घर जाकर प्रचार और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ मिलकर किए गए रोड शो और रैलियां भी वोटरों, खासकर बीजेपी के पारंपरिक समर्थकों में जोश नहीं भर पाए। 34.31% वोटिंग का मुख्य कारण चुनावी रणनीतिकार से 'जन सुराज पार्टी' के संस्थापक बने प्रशांत किशोर का चुनावी मैदान में होना माना गया। जंतर मंतर पर भूख हड़ताल और उसके बाद दिल्ली, पटना, मुंबई, कोलकाता और अन्य जगहों पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' और छात्र संगठनों के बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन ने अयोध्या में भ्रष्टाचार के सनसनीखेज खुलासे से भड़की आग में घी का काम किया।
इसके अलावा, 9 जुलाई को अभिषेक कुमार सिन्हा 'बंटी' के हाई-प्रोफाइल नॉमिनेशन के ठीक एक दिन बाद ही 'भगवा पार्टी' द्वारा अचानक उम्मीदवार बदल दिए जाने से पार्टी के आम कार्यकर्ताओं में काफी अविश्वास पैदा हो गया। समर्थकों को सबसे ज़्यादा गुस्सा इस बात से आया कि 32 साल के नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार घोषित किया गया, जिनका कोई खास राजनीतिक कद नहीं था।
बांकीपुर में पढ़े-लिखे मिडिल क्लास की बड़ी आबादी है और यह राज्य में बीजेपी के सबसे मज़बूत गढ़ों में से एक है, इसलिए प्रशांत किशोर के सामने किसी कमज़ोर उम्मीदवार को उतारना एक बड़ी गलती थी। इससे यह संदेश गया कि बीजेपी ने अपने वोट-बैंक को हल्के में लिया है। सम्राट चौधरी को बिहार में थोपे जाने के तरीके को लेकर पहले से ही काफी नाराज़गी थी। ऐसे कद के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी खुद को 'अलग तरह की पार्टी' कैसे कह सकती है?
मुख्यमंत्री की मौजूदगी में नॉमिनेशन पेपर भरने के एक दिन बाद ही नितिन नवीन के करीबी माने जाने वाले बंटी को हटाने के लिए जो तर्क दिया गया, उससे पार्टी के आम कार्यकर्ता संतुष्ट नहीं हुए। कहा गया कि पार्टी के आलाकमान—ज़ाहिर है, नवीन के अलावा किसी और ने—बंटी से अपना नामिनेशन वापस लेने को कहा था, क्योंकि उनके माता-पिता कुख्यात चारा घोटाले में दोषी ठहराए गए थे। लेकिन बीजेपी नेताओं के एक गुट का तर्क है कि सम्राट चौधरी की कैबिनेट में बीजेपी मंत्री नीतीश मिश्रा के पिता और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्रा भी उसी करोड़ों रुपये के चारा घोटाले में दोषी ठहराए गए थे। तो फिर यह दोहरा मापदंड क्यों?
तो फिर क्या रही वजह?
ऐसी प्रतिष्ठित सीट, जहां बीजेपी का वोट बैंक मजबूत है (बांकीपुर में मुस्लिम और यादव केवल 20% वोट हैं) की हार से नितिन नवीन और बिहार में भगवा पार्टी के पहले मुख्यमंत्री, दोनों की छवि को झटका लगा, जिन्होंने जनता दल (यूनाइटेड) के दिग्गज नेता नीतीश कुमार की जगह 15 अप्रैल को ही पदभार संभाला था। यदि नितिन नवीन अपने द्वारा खाली किए गए निर्वाचन क्षेत्र में जीत सुनिश्चित नहीं कर सकते, तो वह पूरे भारत में पार्टी को जीत कैसे दिला पाएंगे? इससे भी अधिक, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में - जिस पद पर कभी अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और अन्य दिग्गज नेता थे - वह अपने भरोसेमंद लेफ्टिनेंट (बंटी) को भी अपमानित होने से नहीं रोक सकते? क्या वह सचमुच पार्टी चला रहे हैं या सिर्फ एक मोहरा भर हैं?
दूसरी तरफ, बाकीपुर में मिली जीत पीके के लिए एक नई ऊर्जा की तरह है, जिनकी पार्टी पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में सभी सीटें हार गई थी। अब मुख्य सवाल यह है कि क्या वह 'एकला चलो रे' की नीति अपनाएंगे या 'इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस' (INDIA) के साथ जुड़ेंगे। बहुत कुछ बिहार की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के रुख पर निर्भर करेगा।
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए