
इन दिनों भारतीय लोकतंत्र सर्वाधिक चर्चा में है। लोकतंत्र को लहुलुहान करने और उसे बचाने के लिए संघर्ष करने वालों की खबरों से मीडिया भरा हुआ है। हमारा देश सैकड़ों सालों की गुलामी और आतताइयों की बर्बरताओं से 1947 में मुक्त हुआ। स्वाधीनता के लिए मर-मिटने वालों के नेतृत्व में आजादी आई। इसी के साथ नेतृत्वकर्ताओं के सामने चुनौती भी आ खड़ी हुई थी, कि वे अपने देश के लिए किस तरह की शासन व्यवस्था चाहते हैं। राजतंत्र, तानाशाही, सैन्य-तानाशाही, एक दलीय लोकतंत्र अथवा व्यापक स्वरूप वाला लोकतंत्र।
उनके सामने अनेक विकल्प थे। असली सवाल था नियत का। नियत बहुत साफ थी इसलिए न तो राजतंत्र चुना गया, न तानाशाही। न सैन्य-तानाशाही और न ही एक दलीय लोकतंत्र। भारत ने आम जन के मताधिकार से चुनी जाने वाली सरकार की स्थापना के लिए व्यापक स्वरूप वाला लोकतंत्र चुना। सब विचारधाराओं और राजनैतिक दर्शनों के लिए खुले दरवाजे वाला लोकतंत्र। सभी धर्मावलंबियों, सभी वर्णों और जातियों, तथा सभी भाषाओं और विचारवालों के मत का समान मूल्य तय हुआ।
बीसवीं सदी में ही और भी बहुत से देश स्वतंत्र हुए चीन, वियतनाम और उत्तर कोरिया ने एकदलीय लोकतंत्र, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ब्रूनेई ने पूर्ण राजशाही, म्यांमार ने लोकतंत्र चुना था, परंतु तुरंत ही सैन्य जुंटा की तानाशाही आ गई, लीबिया एक तानाशाही से मुक्त होकर दूसरी तानाशाही में चला गया है। बेलारूस में अधिनायकवादी शासन है। ऐसे भी देश हैं, जहां एक दिखावटी लोकतंत्र है, पर उसकी नकेल फौज के हाथों में है।
अस्सी साल हो चुके हैं और दुनिया के विशालतम भारतीय लोकतंत्र की ताकत कम नहीं हुई है। उस पर झंझावात आते रहे हैं, आते रहेंगे, पर वह अविचल बना रहेगा। उसकी जड़े बहुत गहरी हैं। इतिहास में खोज करेंगे तो उसकी जड़ें आज से दो हजार साल पीछे तक जाती हैं। जबलपुर में नर्मदा नदी के जलप्रपात धुआंधार वाले भेड़ाघाट के निकट ही एक गांव है, तेवर। असल में यह प्राचीनकाल की समृद्ध नगरी त्रिपुरी है। त्रिपुरी का विवरण पुराणों में भी मिलता है, परंतु उसका असली परिचय है कि वह कल्चुरियों की आदि-राजधानी रही है। इस त्रिपुरी में इतिहास का एक स्वर्ण काल छिपा हुआ है।
इतिहासकारों और पूरातत्ववेत्ताओं का ध्यान तेवर की ओर आकृष्ट हुआ और खोजों का क्रम चल पड़ा। जनरल कनिंघम ने तिओरी यानी तेवर के दो मंदिरों की खबर लेने के लिए इंजीनियर युले को कहा था। युले तत्कालीन वायसराय लार्ड कैनिंग के शिविर की व्यवस्था के संदर्भ में सन् 1860 में भेड़ाघाट आया था। युले ने मंदिरों की तलाश की और उसे त्रिपुरी के अब तक अज्ञात रहे खंडहर मिले। 1861 के ‘जर्नल ऑफ दि एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल’ के अनुसार युले ने तेवर में देहरा में स्थित मंडप के अवशेष देखे थे और उनके विवरण के साथ उसका एक रेखाचित्र भी बनाया था। जनरल अलेग्जेंडर कनिंघम ने सन् 1873-74 में त्रिपुरी की यात्रा की और तेवर के अवशेषों पर एक रिपोर्ट तैयार की, जिसका प्रकाशन ‘आर्कियोलाॅजिकल सर्वे रिपोर्ट’ में हुआ।
1952-53 में सागर विश्वविद्यालय ने डॉ. मोरेश्वर गंगाधर दीक्षित के निर्देशन में, करनबेल के हथियागढ़ नामक टीले पर, छोटे पैमाने का उत्खनन कार्य कराया। इसका उद्देश्य था, त्रिपुरी के गुप्त और कल्चुरिकालीन मध्यवर्ती इतिहास की सामग्री की खोज करना। असली और महत्वपूर्ण उत्खनन कार्य 1953 में संपन्न हुआ। मध्यप्रदेश सरकार के पुरातत्व विभाग, सागर और बड़ोदा विश्वविद्यालय तथा डेक्कन कॉलेज, पूना की ओर से एक संयुक्त-अभियान की योजना बनाई गई। अभियान के निर्देशक बने विख्यात पुरातत्वशास्त्री डॉ. हसमुख धीरजलाल सांकलिया। दूसरा चरण 1966-67 में सागर विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग ने आचार्य कृष्णदत्त वाजपेयी के निर्देशन में संपन्न हुआ।
अवशेषों का अध्ययन करने पर यह ज्ञात हुआ कि त्रिपुरी ईसा पूर्व 1000 के आसपास ही बस चुकी थी। अर्थात् उसका अस्तित्व लगभग तीन हजार वर्ष पुराना है। इसके बाद त्रिपुरी के कल्चुरी-काल तक के प्रमाण मिलते हैं। ये पुरा-अवशेष ताम्राष्मयुगीन-संस्कृति का परिचय देते हैं। इस युग के स्तरों में सूक्ष्म पाषाण-अस्त्र और लाल सतह पर काली चित्रकारी से युक्त मिट्टी के बर्तनों तक के अवशेष मिले।
ये प्रमाण बताते हैं कि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में, त्रिपुरी एक स्वतंत्र जनपद राज्य की राजधानी बनी। यह तथ्य त्रिपुरी के सिक्कों में सम्राटों के अंकित नामों से घोषित किया गया है। कालांतर में त्रिपुरी किसी एक ही राजवंश के हाथों में स्थिर नहीं रही, बल्कि उसे सातवाहनों, शकों और बोधियों द्वारा अपने साम्राज्य में शामिल किया गया।
कल्चुरि राजवंश के प्रथम सम्राट का नाम कृष्णराज था। ईस्वी सन् 550 से 1740 तक लगभग बारह सौ वर्षों की अवधि में कल्चुरि-नरेशों ने भारतवर्ष के उत्तर अथवा दक्षिण स्थित किसी न किसी प्रदेश में अपना राज्य चलाया है। जिस तरह शक-कुषाणों ने ईस्वीं सन् 78 में अपना संवत् स्थापित किया था, उसी तरह कल्चुरियों ने भी ईस्वीं सन् 249 से ‘कल्चुरि-संवत्’ की स्थापना की।
पंचायती-राज व्यवस्था और प्रजातंत्र-व्यवस्था का बीज-रूप भी, त्रिपुरी के कल्चुरियों के शासन में ही, सर्वप्रथम दिखाई देता है। नगरों और गांव की स्थानीय व्यवस्था के लिए ‘पंचकुल’ की स्थापना की गई थी। इसमें प्रायः 5 सदस्य होते थे। शिलालेखों के अनुसार, उनकी सदस्य संख्या कभी-कभी दस भी होती थी। प्रत्येक विभाग के लिए ‘पंचकुल’ होते थे। अर्थात् शासन में प्रजा की भागीदारी को महत्व दिया जाता था। चुने गए सदस्य महत्तर कहलाते थे। ये पाच महत्तर अपने में से ही एक प्रमुख का चुनाव करता था, उसे महत्तम कहा जाता था। शिलालेखों मे महत्तम को ‘पांचकुलिक’ भी कहा गया है। पांचकुलिक राजधानी में रहता था।
महत्तम के गुण निर्धारित थे, कि उसे आदर्श नागरिक, धर्मज्ञ, कार्य-दक्ष और इंद्रिय-निग्रही होना चाहिए। पंचुकुल के अधिकारों में शामिल था, कर-उपार्जन, ग्राम विकास में व्यय करने का, आर्थिक दंड लगाने का, न्यायदान, देवालय और भूमि व्यवस्था का अधिकार।
त्रिपुरी के कुछ प्राचीन ताम्रपटों में ‘गमागयिक’ पद नाम के अधिकारी का उल्लेख भी आया है। यह अधिकारी गांव और नगर में बाहर से आने-जाने वालों की निगरानी करता रहा होगा। महाप्रतिहार राजा से मिलने वालों को राजा तक ले जाता था और राजा द्वारा दी गयी आज्ञाओं तथा व्यवस्थाओं से, संबंधित राज्य-अधिकारियों को अवगत कराता था। राजगुरू राजा को सलाह देता था। उसका दरबार में काफी प्रभाव होता था। त्रिपुरी के कल्चुरियों के दान-पत्रों में राजन्, सामन्त, भोगिक, विषयपति, राष्ट्र और ग्राम के महत्तर आदि का उल्लेख हुआ है। बड़े प्रांत के अधिपति ‘राजन्’ कहलाते थे और छोटे प्रांत के सामंत।
कुछ पदनामों के ठीक-ठीक आशय ज्ञात नहीं किए जा सके हैं, परंतु उनका उल्लेख भी शिलालेख में हुआ है, जैसे- खंडवाल, खंडपाल, बलाधीर, माकुतिक आदि। आय के अनेक साधन थे। त्रिपुरी के कल्चुरियों के दान-पत्रों में ‘उद्रंग’ और ‘उपरिकर’ नाम आए हैं। उद्रंग जमीन के लगान के लिए और उपरिकर व्यापारियों-शिल्पियों आदि से लिया जाने वाला कर था। इसके अलावा नमक-निर्माण, लोहे की खदान, वन, चारागाह, आम और महुआ के वृक्षों आदि पर भी कर लिया जाता था। सब्जियों, हाथी, घोड़े आदि जानवरों के विक्रय पर भी कर-व्यवस्था थी। बिलहरी से प्राप्त शिलालेख बताता है, कि घोड़े के लिए दो ‘पौर’ और हाथी के लिये चार ‘पौर’ लिया जाता था। ‘पौर’ चांदी का एक छोटा सिक्का होगा ऐसा अनुमान किया जाता है।
जिस देश की आत्मा में लोकतंत्र बसा हो, वह कभी-कभार लोकतंत्र के रास्ते में भटक तो सकता है, परंतु हट नहीं सकता। उसकी शक्ति उसके नागरिकों में बसती है। इतिहास और संस्कृति में समाई हुई है। अयोध्यापति राम अपने एक साधारण नागरिक के अंगुली उठाने पर अपनी पत्नी सीता का परित्याग कर सकते हैं, तो उस देश के नागरिक प्राणों का त्याग कर भी उसी आदर्श की रक्षा कर सकते हैं।
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