विचार

खनिजों की चमक में खोता संविधान: ओडिशा के आदिवासी संघर्ष और विकास मॉडल

देश के अनेक हिस्सों में जल, जंगल, जमीन और खनिज संपदा को लेकर लगातार संघर्ष हो रहे हैं। बहस अब केवल खनन या भूमि अधिग्रहण तक सीमित नहीं रही, बल्कि राज्य और कार्पोर्ट द्वारा प्राकृतिक संसाधनों की “संगठित लूट” के खिलाफ सामूहिक विरोध में बदलती दिखाई देती है।

ओडिशा में पेसा अधिनियम लागू करने की मांग लगातार जोर पकड़ रही है
ओडिशा में पेसा अधिनियम लागू करने की मांग लगातार जोर पकड़ रही है 

भारत स्वयं को विश्व की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। देश में औद्योगिक पार्क और खनिज उत्पादन को भारत की प्रगतिशील उपलब्धि बताया जा रहा है, लेकिन इस चमकदार आर्थिक कहानी के पीछे एक दूसरा भारत भी मौजूद है। वह भारत जो जंगलों, पहाड़ों और नदियों के बीच रहता है; जिसकी पहचान उसकी भूमि, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी है, जो विकास के नाम पर लगातार अपना अस्तित्व खोता जा रहा है।

ओडिशा इस विरोधाभास का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। ओडिशा देश के कुल बॉक्साइट संसाधनों का लगभग 41% हिस्सा रखता है। कुछ रिपोर्टों में यह हिस्सा 50-59% तक बताया जाता है। राज्य में लौह अयस्क, कोयला, क्रोमाइट (भारत का 98% उत्पादन) और अन्य खनिजों की भी प्रचुरता है। लेकिन जहां ये खनिज पाए जाते हैं - रायगड़ा, कालाहांडी, कोरापुट, मलकानगिरि और सुंदरगढ़ - ओडिशा के सबसे गरीब और आदिवासी-बहुल जिलों में शामिल हैं, जहां गरीबी दर राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है और मानव विकास सूचकांक (HDI) बेहद कम है। यह संघर्ष इसी दूसरे भारत की कहानी हैं।

यह मसला केवल खनन का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या भारत का विकास मॉडल संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों, आदिवासी स्वायत्तता और लोकतांत्रिक सहमति पर आधारित होगा, या फिर राज्य और कॉर्पोरेट गठजोड़ की शक्ति पर?

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आदिवासी समाज के लिए भूमि केवल संपत्ति नहीं है। उनके लिए पहाड़ देवता हैं, जंगल जीवन हैं और नदियाँ संस्कृति हैं। इसलिए जब खनन परियोजनाएँ आती हैं, तो आदिवासी समुदाय इसे केवल आर्थिक नुकसान नहीं बल्कि अपने अस्तित्व पर हमला मानता है। नीयामगिरि आंदोलन इस संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक बना। डोंगरिया कोंध समुदाय नीयामगिरि पर्वत को अपना देवता मानता है। जब वेदांता को वहाँ बॉक्साइट खनन की अनुमति देने की प्रक्रिया शुरू हुई, तब स्थानीय समुदायों ने वर्षों तक संघर्ष किया।

2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने ओडिशा माइनिंग कार्पोरेशन बनाम वन एवं पर्यावरण मंत्रालय मामले में ऐतिहासिक निर्णय देते हुए ग्राम सभाओं को यह अधिकार दिया कि वे तय करें कि उनके धार्मिक और सामुदायिक अधिकार प्रभावित होंगे या नहीं। यह केवल एक कानूनी निर्णय नहीं था; यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर था। पहली बार देश के सबसे हाशिए पर खड़े समुदायों की आवाज़ को सर्वोच्च न्यायिक मान्यता मिली।

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उसके बाद यह संघर्ष समाप्त हो गया? उत्तर है, नहीं।  2023 में सिजिमाली बॉक्साइट ब्लॉक वेदांता लिमिटेड (मैत्री इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से) को नीलामी में आवंटित किया गया। स्थानीय आदिवासी समुदाय विरोध कर रहे हैं। मीडिया रेपोर्ट्स व स्थानीय लोगों के अनुसार ग्राम सभाओं में सहमति जबरन (नकली सहमति और दबाव के माध्यम से) ली गई। कई दस्तावेजों में हस्ताक्षर बिना लोगों की जानकारी के लिए गए। आज नीयामगिरि के आसपास के क्षेत्रों; सिजिमाली, कुटरुमाली, माजिंगमाली और अन्य क्षेत्रों में नई खनन परियोजनाएँ प्रस्तावित की जा रही हैं। ग्राम सभाओं को महज़ औपचारिकता बना दिया गया है, पुलिस की मौजूदगी में बैठकें करवाई जा रही हैं, और सहमति की प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संविधान की मूल भावना पर प्रश्न है।

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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार स्पष्ट किया है कि जीवन का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि गरिमामय जीवन जीने का अधिकार भी है। स्वच्छ जल, स्वस्थ पर्यावरण, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान भी इसी अधिकार का हिस्सा हैं। इसी प्रकार अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है और अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति तथा शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार सुनिश्चित करता है। वहीं आदिवासी समुदायों के लिए संविधान में अतिरिक्त सुरक्षा भी दी गई है। पाँचवीं अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन और उनकी विशेष सुरक्षा की व्यवस्था करती है। पेसा अधिनियम यानी पंचायत (अधिसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम 1996 स्पष्ट रूप से कहता है कि अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को प्राकृतिक संसाधनों और विकास परियोजनाओं पर निर्णय का अधिकार है। वन अधिकार अधिनियम, 2006 आदिवासी समुदायों के पारंपरिक वन अधिकारों को कानूनी मान्यता देता है।

लेकिन, जमीनी वास्तविकता इससे बिलकुल इतर है अगर यह केवल आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों का हनन नहीं है बल्कि यह प्राकृतिक कानून के भी खिलाफ है। सामाजिक वैज्ञानिक जेम्स स्कॉट ने अपनी पुस्तक “सीइंग लाइक ए स्टेट में लिखा था कि राज्य अक्सर स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक संरचनाओं को नजरअंदाज करके विकास परियोजनाएं लागू करता है। परिणामस्वरूप विकास लोगों के लिए अवसर नहीं, बल्कि संकट बन जाता है। ओडिशा के पिछले दो दशकों का संघर्ष इसी बात की पुष्टि करते हैं।

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यहाँ सबसे गंभीर और चिंताजनक प्रश्न केवल भूमि अधिग्रहण का नहीं है, बल्कि राज्य द्वारा असहमति और प्रतिरोध को देखने के बदलते राजनीतिक दृष्टिकोण का भी है। लोकतंत्र की मूल आत्मा केवल चुनावों में नहीं, बल्कि नागरिकों की असहमति व्यक्त करने की क्षमता में निहित होती है। विरोध किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसकी जीवन्तता का संकेत होता है। किंतु जब किसी समुदाय की आवाज़ को सुनने के बजाय उसे सुरक्षा के प्रश्न, कानून-व्यवस्था की समस्या या संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगता है; जब ग्राम सभाओं जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं को वास्तविक निर्णयकारी मंच के बजाय प्रशासनिक औपचारिकता में परिवर्तित कर दिया जाता है; और जब आंदोलनों को लोकतांत्रिक संवाद की बजाय नियंत्रण और दमन के चश्मे से समझा जाता है, तब यह केवल स्थानीय संघर्ष नहीं रहता, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण का संकेत बन जाता है।

यह केवल ओडिशा के जंगलों, पहाड़ों और आदिवासी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है; यह आज पूरे देश में विकास और संसाधनों के नियंत्रण को लेकर उभरते एक बड़े राजनीतिक प्रश्न का हिस्सा बन चुका है। देश के अनेक हिस्सों, जिनमें छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों में भी जल, जंगल, जमीन और खनिज संपदा को लेकर ऐसे ही संघर्ष लगातार हैं। यह बहस अब केवल खनन या भूमि अधिग्रहण तक सीमित नहीं रही, बल्कि राज्य और कॉर्पोरेट संरचनाओं द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के “संगठित लूट” (संसाधनों के संगठित दोहन) में बदलती दिखाई देती है।

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इन सबसे बचने के लिए नीतिगत स्तर पर कुछ कदम आवश्यक हैं: पहला, ग्राम सभाओं की सहमति को पूरी तरह स्वतंत्र और पारदर्शी बनाया जाए। दूसरा, वन अधिकार अधिनियम और पेसा के प्रावधानों का कठोर पालन सुनिश्चित हो। तीसरा, विस्थापन और पुनर्वास की प्रक्रिया को कानूनी औपचारिकता नहीं बल्कि मानवाधिकार के प्रश्न के रूप में देखा जाए। चौथा, आदिवासी समुदायों को विकास का साझेदार बनाया जाए, केवल पीड़ित नहीं। पाँचवाँ, खनन परियोजनाओं के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों की स्वतंत्र समीक्षा हो।

अंत में, सवाल केवल यह नहीं है कि आदिवासी समाज से जल, जंगल और जमीन छीने जा रहे हैं; असली प्रश्न यह है कि इन संसाधनों की रक्षा की नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारी सबसे अधिक उन्हीं समुदायों पर क्यों डाल दी गई है? विडंबना यह है कि जिन जंगलों, नदियों और पहाड़ों को बचाने के लिए आदिवासी समाज दशकों से संघर्ष कर रहा है, उनके संरक्षण का सतप्रतिशत लाभ विशेषकर शहरी आबादी, उद्योगों और व्यापक जनसमूह को प्राप्त होता है। जबकि स्वच्छ हवा, जल स्रोत, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की साझा संपत्ति हैं। फिर भी विकास और पर्यावरण के प्रश्न पर जो बौद्धिक और नागरिक विमर्श अब तक निर्मित हुआ है, वह अक्सर सीमित अभिजात वर्ग, विश्वविद्यालयों, नीति संस्थानों और शहरी सिविल सोसाइटी के दायरों तक सिमट कर रह गया है।

यह केवल संवाद की कमी नहीं, बल्कि भाषा और संवेदनशीलता की भी समस्या है, जिसने इस बहस को आम नागरिकों से दूर रखा है। इसलिए जिम्मेदारी राज्य या सरकार का तो है ही, बल्कि समाज और सिविल सोसाइटी की भी उतनी ही है कि वे इस विमर्श को अधिक सहज, सरल और जन-केंद्रित बनाएं। क्योंकि जल-जंगल-जमीन की रक्षा केवल आदिवासी समाज का दायित्व नहीं हो सकता; यह उस हर नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है जो इसी हवा में सांस लेता है, इसी पानी को पीता है और इसी पर्यावरणीय संरचना पर अपना जीवन निर्भर पाता है।

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