विचार

गिरते रुपए से सबकुछ महंगा, लेकिन सरकार की हो गई चांदी 

रुपये की गिरावट, जो आयातकों को नुकसान पहुंचाती है, तेल की कीमतें बढ़ाती है, देश की डॉलर जीडीपी को घटाती है- वही गिरावट, डॉलर बेचे जाने की स्थिति में आरबीआई का मुनाफा बढ़ाती है और सरकार को दी जाने वाली रकम भी।

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रुपये के गिरने को आम तौर पर एक मैक्रोइकोनॉमिक समस्या माना जाता है। इससे आयात की लागत बढ़ती है, महंगाई का दबाव बढ़ता है, निवेशक परेशान होते हैं और राष्ट्रीय गौरव को ठेस पहुंचती है। लेकिन भारत के हालिया अनुभवों ने एक अजीब विरोधाभास पैदा किया। रुपये की वही कमजोरी, जो बाहरी तनाव पैदा करती है, उसने केन्द्र सरकार का बड़ा वित्तीय फायदा भी किया। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा रुपये को संभालने के लिए डॉलर बेचने से बड़ा मुनाफा हुआ है, जिसे बाद में सरप्लस के तौर पर केन्द्र सरकार को ट्रांसफर कर दिया जाता है। इस तरह आरबीआई सिर्फ करेंसी को मैनेज नहीं कर रहा, वह सरकार के लिए कोषाध्यक्ष जैसा बन गया। इसे थोड़ी गहराई से समझने की जरूरत है।

आरबीआई के सेंट्रल बोर्ड ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केन्द्र सरकार को 2,86,588 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड सरप्लस ट्रांसफर मंजूर किया है। वित्त वर्ष 2024-25 में यह राशि 2,68,590 करोड़, 2023-24 में 2,10,874 करोड़ और वित्त वर्ष 2022-23 में 87,416 करोड़ रुपये थी। यह ताजा ट्रांसफर आरबीआई की मजबूत कमाई पर आधारित है, जिसमें रुपये को सहारा देने के लिए बड़े पैमाने पर डॉलर बेचने से हुआ मुनाफा और विदेशी संपत्तियों पर ज्यादा आय शामिल है।

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2.9 खरब रुपये कोई छोटी-मोटी रकम नहीं। यह केन्द्र सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग 8 फीसद है। इससे सरकार को बिना टैक्स बढ़ाए, खर्च में कटौती किए या बाजार से ज्यादा कर्ज लिए, वित्तीय राहत मिल जाती है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और राजकोषीय घाटे पर बढ़ते दबाव के इस दौर में, यह उपयोगी सहारा है। लेकिन चिंता का कारण भी यही है क्योंकि ऐसा सहारा कब एक आदत बन जाए, पता भी नहीं चलता।

गणित सीधा है। आरबीआई ने सालों डॉलर जमा किए, जब रुपया मजबूत था। जब वह आज उन डॉलरों को कमजोर विनिमय दर पर बेचता है, तो उसे रुपये में फायदा होता है। यह फायदा मुद्रा भंडार की दोबारा वैल्यू लगाने से होने वाला कागजी नहीं, बल्कि असली फायदा है। मुद्रा से जुड़ी गतिविधियों से होने वाली असली कमाई आरबीआई की आय में शामिल होती है, और फिर सरकार को दिए जाने वाले उसके सरप्लस में जाती है।

इसका मतलब है कि रुपये की कमजोरी से सरकार को आर्थिक रूप से अचानक बड़ा फायदा हुआ है। यह बात सुनने में थोड़ी अजीब लग सकती है, लेकिन यह इस विरोधाभास को पूरी तरह से सामने लाती है। रुपये की यही गिरावट, जो आयातकों को नुकसान पहुंचाती है, तेल की कीमतें बढ़ाती है, भारत की डॉलर जीडीपी को कम करती है और विदेशी निवेशकों को परेशान करती है- वही गिरावट, डॉलर बेचे जाने की स्थिति में आरबीआई के मुनाफे को बढ़ा देती है।

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यह एक और वजह से भी मायने रखता है। अगर भारत की नॉमिनल जीडीपी रुपये के हिसाब से 10 फीसद बढ़ती है, लेकिन डॉलर के मुकाबले रुपया 10 फीसद से ज्यादा गिर जाता है, तो डॉलर के हिसाब से जीडीपी में मुश्किल से कोई बढ़ोतरी हुई। 

कोई देश घरेलू तौर पर तेजी से बढ़ सकता है, लेकिन अगर मुद्रा में गिरावट से उसकी बढ़त खत्म हो जाए, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह रुका हुआ सा लग सकता है। इसलिए, रुपये की लगातार कमजोरी एक रणनीतिक चिंता का विषय बन सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि रुपये को किसी भी कीमत पर बचाया ही जाए। भारत एक ‘चालू खाते के घाटे’ वाली अर्थव्यवस्था है। यानी, वह जितना निर्यात करता है, उससे कहीं ज्यादा तेल, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य चीजें आयात करता है।

साथ ही, मीडियम टर्म में इसकी महंगाई दर भी अमेरिका से अधिक रहती है। रुपये का थोड़ा-बहुत कमजोर होना स्वाभाविक है और यह फायदेमंद भी हो सकता है। एक कमजोर करेंसी ‘शॉक एब्जॉर्बर’ का काम करती है। यह निर्यात की प्रतिस्पर्द्धा-क्षमता को बचाए रखती है, गैर-जरूरी आयात को हतोत्साहित करती है और अर्थव्यवस्था को बाहरी असंतुलन के प्रति सचेत रखती है।

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खतरा सीधे मुद्रा अवमूल्यन से नहीं, बल्कि अव्यवस्थित अवमूल्यन से होता है। यहीं पर आरबीआई का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है: अस्थिरता को नियंत्रित करने, घबराहट को रोकने और उम्मीदों को स्थिर करने के लिए। लेकिन किसी स्तर की रक्षा करना अस्थिरता को नियंत्रित करने से अलग है। अगर बाजार को यकीन हो जाता है कि आरबीआई हमेशा एक विशेष स्तर की रक्षा करेगा, तो बड़े आयातक और डॉलर उधार लेने वाले अपने जोखिमों को कम कर सकते हैं। कृत्रिम रूप से मजबूत रुपया आयात को बढ़ावा देता है, निर्यात को हतोत्साहित करता है और समायोजन में देरी करता है। अंततः होने वाला सुधार अधिक कष्टदायक हो जाता है।

इसमें एक वित्तीय नैतिकता का मुद्दा भी है। अगर रुपये को बचाने से आरबीआई को बड़ा मुनाफा होता है, और उस मुनाफे से केन्द्र सरकार को अपना घाटा कम करने में मदद मिलती है, तो रुपये के अवमूल्यन में एक छिपा वित्तीय फायदा दिखने लगता है। यह कोई स्वस्थ प्रोत्साहन ढांचा नहीं। किसी भी सरकार को केंद्रीय बैंक की विदेशी मुद्रा गतिविधियों को बार-बार होने वाली आय का जरिया नहीं मानना ​​चाहिए।

भारत की राजकोषीय प्रणाली में सरकारी उधार के लिए पहले से ही एक अंतर्निहित तंत्र है। वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) के माध्यम से, बैंकों के लिए जरूरी है कि वे अपनी जमा राशि का बड़ा हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करें। इससे सरकारी ऋण के लिए एक निश्चित बाजार तैयार होता है। यह लंबे समय से चला आ रहा है, और भारत की वित्तीय संरचना का अभिन्न अंग है। लेकिन, यह एक तरह का ‘वित्तीय दमन’ है: नियमों के जरिये, घरेलू बचत का एक हिस्सा सरकारी उधार की ओर मोड़ दिया जाता है। अगर इसके अलावा, सरकार आरबीआई के बड़े अधिशेष हस्तांतरणों पर भी निर्भर हो जाती है, तो मौद्रिक प्राधिकरण और राजकोषीय सहायता के बीच की सीमा धुंधली पड़ने लगती है।

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आरबीआई वित्त मंत्रालय नहीं। इसका काम कीमतों में स्थिरता, वित्तीय स्थिरता, मुद्रा प्रबंधन और मौद्रिक विश्वसनीयता बनाए रखना है। यह सरकार के लिए बैंकर का काम भी करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह सरकार के लिए सिर्फ पैसे कमाने का जरिया बनकर रह जाए। चुनी हुई सरकारें स्वाभाविक ही ज्यादा खर्च करना, कम ब्याज दर पर कर्ज लेना और आसानी से फाइनेंस मिलना पसंद करती हैं। लेकिन इन्हीं कारणों से मौद्रिक संस्थाओं को बाहरी दबावों से सुरक्षित रखने की जरूरत होती है।

रुपये की कहानी भारत की बाहरी फाइनेंसिंग की चुनौती से भी जुड़ी है। कुल एफडीआई इनफ्लो बेशक अच्छा दिखे, लेकिन पैसे वापस ले जाने, विनिवेश और बाहर जाने वाले फ्लो की वजह से शुद्ध एफडीआई में खासी गिरावट आई है। विदेशी कंपनियां और प्राइवेट इक्विटी निवेशक बाजार से बाहर निकल रहे हैं। भारतीय इक्विटी बाजार कुछ हद तक इसलिए महंगे बने हुए हैं, क्योंकि घरेलू एसआईपी इनफ्लो स्थिर और मजबूत हैं। मजबूत घरेलू मांग बड़े एफआईआई आउटफ्लो के बावजूद बाजार में बड़ी गिरावट को रोकती है।

इससे एक सवाल खड़ा होता है। क्या घरेलू निवेशक, एसआईपी और आईपीओ सब्सक्रिप्शन के जरिये, परोक्ष रूप से विदेशी निवेशकों के लिए मुनाफेदार निकासी को आसान कर रहे हैं? हाल के कई बड़े आईपीओ में, जुटाए गए पैसे का बड़ा हिस्सा कंपनी के लिए नई पूंजी के तौर पर नहीं, बल्कि मौजूदा निवेशकों द्वारा ‘ऑफर फॉर सेल’ के रूप में गया है। नए निवेशक भविष्य के वादों पर पैसा लगाते हैं; जबकि पुराने निवेशक नकद पैसा लेकर निकल जाते हैं। यह गैर-कानूनी नहीं। बाजार ऐसे ही काम करते हैं। लेकिन जब यह चलन ज्यादा बढ़ जाए, तो इसकी बारीकी से जांच-पड़ताल होनी चाहिए।

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कई बड़ी विदेशी कंपनियां पूरी तरह या आंशिक रूप से भारत से बाहर निकली हैं: होलीसिम, फोर्ड, हार्ले डेविडसन,सिटी बैंक का रिटेल बिजनेस, मेट्रो एजी, जीएम, केर्न, लैफ्रेज… वगैरह। हर की अपनी वजह। लेकिन अगर सबको एक साथ देखें, तो ये बड़ी आर्थिक समस्या का संकेत करते हैं: भारत एक बाजार के तौर पर तो आकर्षक है, लेकिन यहां बिजनेस खड़ा करना, उसे चलाना आसान नहीं।

इसका मतलब यह नहीं है कि विदेशी निवेशकों का भरोसा खत्म हो गया है। गूगल के डेटा सेंटर प्लान, जियो में मेटा और गूगल का निवेश, और अन्य रणनीतिक निवेश दिखाते हैं कि ग्लोबल पूंजी अब भी भारत में आना चाहती है। लेकिन, डिजिटल पैमाने के लिए भारत में आना और गहरे मैन्युफैक्चरिंग में धैर्य के साथ पूंजी लगाना- दोनों में फर्क है। भारत को टिकाऊ एफडीआई की जरूरत है, न कि सिर्फ वैल्यूएशन के आधार पर आने-जाने वाले निवेश की।

इस संदर्भ में, रुपया सिर्फ स्क्रीन पर दिखने वाला नंबर नहीं। यह तेल पर निर्भरता, सोने का आयात, बाहरी वित्तपोषण में कमी, पोर्टफोलियो प्रवाह, घरेलू बाजार के मूल्यांकन और कारोबार के भरोसे को दिखाता है। आरबीआई इस सफर को आसान बना सकता है, लेकिन वह रास्ते को हमेशा के लिए नहीं बदल सकता।

(अजित रानाडे जाने-माने अर्थशास्त्री हैं। सौजन्य: बिलियन प्रेस)

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