
इन दिनों वाराणसी में गंगा नदी उफान पर है और लगभग सभी घाट डूबे हुए हैं। पर, हमेशा गंगा ऐसी नहीं रहती– गर्मियों में एक पतली सी धारा रह जाती है और पानी अनेक घाटों से दूर हो जाता है। इस वर्ष के अप्रैल महीने में वाराणसी की गंगा में पानी की इतनी कमी देखी गई थी, जितनी सामान्यतया जून के महीने में देखी जाती है। पानी की कमी से नदी का पानी घाटों से दूर हो जाता है और प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है।
नेचुरल हज़ार्डस नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, गंगा में पानी के सर्वाधिक बहाव की दर प्रति दशक 17 प्रतिशत की दर से गिर रही है। यही स्थिति देश की दूसरी नदियों की भी है। जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि के कारण एक तरफ तो हिमालय के ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ते जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ वर्षा की अवधि और पैमाना लगातार बदलता जा रहा है। बारिश के तीन महीने अब आनंद का मौसम नहीं रहा है, रिमझिम फुहारें साहित्य में ही रह गई हैं– अब तो बहुत कम समय में ही अत्यधिक बारिश हो जाती है। इस दौरान चारों तरफ पानी भर जाता है, बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है और फिर एक लंबे समय तक सूखे जैसा मौसम रह जाता है। ग्लेशियर और बारिश में बदलाव के कारण गंगा और यमुना जैसी हिमालयी नदियों में पानी का बहाव कम होता जा रहा है। इस समस्या को बड़े बांधों और बैराजों ने और गंभीर बना दिया है। एक तरफ नदियों में पानी का बहाव कम हो रहा है तो दूसरी तरफ सघन शहरीकरण ने पानी की मांग को तेजी से बढ़ा दिया है।
परंपरागत तौर पर अपने पूरे 2525 किलोमीटर लंबे मार्ग पर गंगा हमेशा से आस्था का प्रतीक रही है, पर बीजेपी के दौर में आस्था कहीं नेपथ्य में है और कम से कम वाराणसी में यह अब पूरी तरह से व्यापार और पर्यटन का एक साधन है। वाराणसी का नाम इस पूरे क्षेत्र के वरुणा और असी नदियों के बीच स्थित होने के कारण रखा गया था। दोनों नदियों को हमेशा से गंगा की सहायक नदियों का दर्जा मिला था, वरुणा तो आज भी सरकारी फाइलों में नदी है, पर असी नदी तो नमामि गंगे में अस्सी नाला करार दी गई है। असी नदी की व्यथा केवल नाले वाली दुर्दशा ही नहीं है बल्कि गंगा से मिलने के अंतिम 2 किलोमीटर मार्ग को भी बेशर्मी से डायवर्ट कर दिया गया है।
बनारस की इस प्रमुख नदी को डायवर्ट करने का मुख्य कारण, इसके गंगा से मिलने के प्राचीन स्थान अस्सी घाट के पास, भव्य आरती और सांस्कृतिक/राजनैतिक आयोजनों के लिए जगह बनाना था। इसका एक नतीजा यह हुआ कि हमेशा अस्सी घाट को छूकर बहने वाली गंगा नदी अब साल के अधिकतर समय घाट और घाट की सीढ़ियों से लगभग 200 मीटर दूर रहती है। नमामि गंगे की रूपरेखा में असी नदी गंगा की सहायक नदी है जबकि सरकारी फाइलों में और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कुछ रिपोर्ट में इसे अस्सी नाला बताया गया है। इस कदम का कुछ विरोध किया गया पर बीजेपी की उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र की मोदी सरकार ने विरोध की इन आवाजों को खामोश कर दिया।
प्रधानमंत्री मोदी की प्लेबुक में देश के गौरव और परंपरा को नष्ट करने और पर्यावरण विनाश के अभिन्न अंग हैं। इसमें भव्य मंदिर, मंदिरों के बड़े कॉरिडर और बड़े घाट शामिल हैं- इसके लिए प्राचीन भवनों, मंदिरों और नदी के किनारों को बेदर्दी से गिराया गया। विश्वनाथ मंदिर के कॉरिडर बनाते समय तो असंख्य प्राचीन मंदिरों और इमारतों को ढहाया गया। वाराणसी की गंगा तो साफ नहीं हुई पर प्राचीन घाटों की शृंखला में “नमो घाट” जुड़ गया।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर आज भी असी नदी का मुद्दा सामने आता है, पर सरकारी रवैये में कोई अंतर नहीं आता। फरवरी 2026 में वाराणसी में बारिश के पानी के लिए बने स्टॉर्मवाटर ड्रेन में शहर के गंदे पानी और औद्योगिक गंदे पानी को मिलाए जाने से संबंधित एक याचिका की सुनवाई करते हुए एनजीटी की मुख्य पीठ ने प्रश्न उठाया था कि असी नदी को क्यों एक नाला मान लिया गया है, जबकि रिवर गंगा अथॉरिटी ऑर्डर 2016 में इसे सहायक नदी का दर्जा मिला है। इस ऑर्डर के अनुसार किसी सहायक नदी को गंगा की मुख्य धारा में मिलने से नहीं रोका जा सकता है, जबकि असी नदी को नाले में परिवर्तित कर अब गंगा की मुख्य धारा में मिलने से रोका जा रहा है।
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एनजीटी ने इस सुनवाई के दौरान वाराणसी के घरों में सीवरेज कनेक्शन मिलने में होने वाली देरी पर भी नाराजगी जाहिर की थी। इसके अनुसार कुल 4.14 लाख घरों को सीवरेज तंत्र से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, पर फरवरी 2026 तक महज 1.56 लाख घरों को ही इस तंत्र से जोड़ा जा सका है। दूसरी तरफ वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों से कुल 76 नाले गंगा में मिलते थे, तमाम सरकारी दावों के बाद भी इनमें से 31 नालों को अभी तक गंगा में सीधा मिलने से रोका नहीं जा सका है।
मार्च 2024 में एनजीटी ने बताया था कि वाराणसी में 1280 लाख लीटर गंदा पानी अभी भी बिना किसी उपचारण के ही सीधा नदी तक जा रहा है। नवंबर 2024 में एनजीटी ने वाराणसी के जिलाधिकारी को आदेश दिया था कि घाटों पर यह सूचना लगाएं कि गंगा का पानी सीधे पीने (आचमन) और नहाने योग्य नहीं है।
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लोकसभा में 5 फरवरी 2026 को प्रश्न संख्या 1136 के उत्तर में बताया गया था कि वाराणसी में गंगा का पानी पहले से साफ, यानि प्रदूषण के स्तर में सुधार हो रहा है। वर्ष 2015 में इसका पानी प्रायोरटी क्लास iii में था जबकि अब यह सबसे साफ श्रेणी, प्रायोरिटी क्लास v में है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पानी में कार्बनिक प्रदूषण के स्तर, जिसे बॉयोकेमीकल आक्सीजन डिमांड से मापा जाता है, के आधार पर नदियों के खंड को 5 प्रायोरिटी क्लास में वर्गीकृत किया है, इसमें क्लास i सबसे प्रदूषित है और क्लास v सबसे साफ पानी है।
इसी उत्तर के माध्यम से लोकसभा को जानकारी दी गई कि वर्ष 2015 से वर्ष 2025 तक उत्तर प्रदेश के स्टेट मिशन ऑफ क्लीन गंगा के माध्यम से वाराणसी में कुल 857.38 करोड़ रुपये खर्च किए गए, यानि औसतन 78 करोड़ रुपये प्रति वर्ष। लेकिन वर्षवार खर्च में बहुत अंतर है- वर्ष 2015 में 170.16 करोड़ रुपये, वर्ष 2018 में 139.59 करोड़, वर्ष 2017 में 125.93 करोड़ रुपये की तुलना में वर्ष 2023 में महज 13.71 करोड़ रुपये और वर्ष 2024 में 17.36 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए। आश्चर्य यह है कि 2020 के कोविड काल में भी 70.79 करोड़ रुपये खर्च किए गए। वर्षवार खर्च के आंकड़ों से एक तथ्य स्पष्ट तौर पर उभरता है- उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के एक वर्ष पहले और चुनाव के वर्ष में गंगा की सफाई के नाम पर किया जाने वाला खर्च अचानक बढ़ जाता है।
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उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट पर वाराणसी की गंगा नदी की जल गुणवत्ता के जनवरी से जुलाई 2026 तक की अवधि के आंकड़े उपलब्ध हैं। वाराणसी में गंगा के प्रवेश करते समय इस अवधि के दौरान बीओडी का औसत 2.4 मिलीग्राम प्रति लिटर, टोटल कोलीफॉर्म 1109 एमपीएन प्रति 100 मिलिलिटर और फीकल कोलीफॉर्म 551 एमपीएन प्रति 100 मिलिलिटर रहता है। गंगा के वाराणसी से गुजर कर पार करते-करते यही आंकड़े क्रमशः 3.5 मिलीग्राम प्रति लिटर, 12714 एमपीएन और 5980 एमपीएन हो जाता है।
इन आंकड़ों से इतना स्पष्ट होता है कि वाराणसी में प्रदूषण के कारण जलीय जीवों में पानी में घुलित आक्सीजन की मात्रा थोड़ी कम हो जाती है और गंदी पानी में पनपने वाले बैक्टीरिया के चुनिंदा समूहों की संख्या में लगभग 11 गुणा वृद्धि हो जाती है। आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो आचमन करने योग्य पानी में टोटल कोलीफॉर्म की संख्या 50 एमपीएन और नहाने योग्य पानी में इसकी संख्या 500 एमपीएन से अधिक नहीं होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी ने भव्यता और इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर वाराणसी के इतिहास, विविधता, परंपरा और संस्कृति को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। गंगा नदी भी अब प्राचीन विरासत का नहीं बल्कि बाजार का और व्यापार का प्रतीक बन गई है।
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