
2026 में जो कुछ दिलचस्प चीजें देखने लायक हैं उनमें एक अधिक रोचक है हमारे समय की दो बड़ी शक्तियों के बीच दुश्मनी।
अमेरिका ने पहले विश्व युद्ध के अंत (1918 में खाई युद्ध के गतिरोध के अंतिम चरणों में अमेरिका का प्रवेश शाही जर्मनी के खिलाफ निर्णायक माना गया था) से लेकर अब तक पूरी एक सदी तक पूरी दुनिया पर अपना प्रभुत्व जमाता रहा है। लेकिन अब यह दौर खत्म हो रहा है, भले अगर यह पहले ही खत्म नहीं हो चुका है।
सन् 2000 में, अमेरिका दुनिया के व्यापार पर राज करता रहा। आज चीन 150 से ज़्यादा देशों के लिए सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है। कई देशों के पास तो कोई विकल्प ही नहीं है: न्यू इंडिया बीजिंग के साथ जुड़ने से हिचकिचा रहा है, लेकिन उसे किसी भी दूसरे देश के मुकाबले चीन से ज़्यादा आयात करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। दुनिया भर में ट्रेड वॉर में जीत हासिल करने से चीन को ऐसा फायदा मिला है जो शायद 25 साल पहले अपने चरम पर होने पर भी अमेरिका के पास नहीं था।
Published: undefined
चीन हर दिन कारोबार से 3 अरब डॉलर अतिरिक्त कमाता है, जो हैरान करने वाला आंकड़ा है, और 2025 के लिए उसके1.1 ट्रिलियन अतिरिक्त डॉलर का यही मतलब है। कारोबार में गतिशीलता के कारण इसके और बढ़ने का अनुमान है। चीन ने 2020 में 10 लाख कारें एक्सपोर्ट कीं और पांच साल बाद यानी 2025 में यह संख्या 70 लाख कारों तक पहुंच गई। ये कारें न सिर्फ बेहतर बल्कि सस्ती भी होती जा रही हैं, जिसका मतलब है कि दुनिया भर में इनकी मांग और बढ़ेगी।
रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में, सोलर और विंड एनर्जी बनाने वाले डिवाइस बनाने में चीन का कोई मुकाबला नहीं है। सोलर इनर्जी में इसका ग्लोबल मार्केट शेयर 85 फीसदी और विंड इनर्जी में लगभग 60 फीसदी है। दुनिया की लगभग 70 फीसदी इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी चीन में बनती हैं। यह दुनिया का आधा या उससे ज़्यादा स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट बनाता है। दुनिया के लगभग तीन-चौथाई ड्रोन चीन निर्मित हैं। अब दुनिया के आधे से ज़्यादा जहाज़ चीन में बनते हैं, खासकर सबसे मुश्किल वाले, जैसे एलएनजी टैंकर, क्रूज़ शिप, बड़े मिलिट्री जहाज़ और कंटेनर शिप जो पूरी दुनिया में सामान ले जाते हैं।
Published: undefined
राष्ट्रपति ट्रंप के शासन में, अमेरिका ने टैरिफ लगाकर दुनिया को धमकाने की कोशिश की। लेकिन सिर्फ़ चीन अकेला खड़ा रहा और उसने सफलतापूर्वक पलटवार किया, जबकि न्यू इंडिया सहित ज़्यादातर देशों ने इसकी मार झेली।
चीन ने इस मोर्चे पर जवाबी वार किया और जीता। ट्रंप को पीछे हटना पड़ा, और आज अमेरिकी रक्षा उद्योग को चीन जाकर हाथ जोड़कर उस सामग्री के लिए भीख मांगनी पड़ रही है जिनके बिना अमेरिका अपने मिसाइल और जेट नहीं बना सकता। कुछ हफ़्ते पहले ट्रंप ने एनविडिया (Nvidia) के उच्च गुणवत्ता वाले चिप्स पर चीन को निर्यात नियंत्रण में में ढील दी थी, लेकिन शी जिनपिंग ने कहा कि चीन इन्हें नहीं खरीदेगा और खुद अपने यहां इनका उत्पादन करेगा, भले ही वे शुरु में थोड़े कम कुशल हों। पिछले महीने, एक रिपोर्ट आई थी कि चीन ने एकमात्र बचे हुए हाई-टेक सेक्टर में सफलता हासिल कर ली है, जहां उसे अभी तक वंचित रखा गया था र वह थी चिप्स के लिए लिथोग्राफी।
इससे लोगों को हैरानी नहीं हुई क्योंकि आम तौर पर यह माना जाता है कि अगर कोई चीज़ मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी है, चाहे वह कितनी भी मुश्किल क्यों न हो, चीन उसे कर ही देगा। यही बात कमर्शियल एयरक्राफ्ट (वाणिज्यिक विमानों) पर भी लागू होती है, जिस पर छह दशकों से ज़्यादा समय से अमेरिका में बोइंग और यूरोप में एयरबस का कब्ज़ा रहा है। चीन ने पिछले साल अपना कमर्शियल जेट पेश किया और 2026 में हम इसे ज़्यादा इस्तेमाल होते देखेंगे। जो पुर्ज़े अभी इंपोर्ट किए जाते हैं, मसलन इंजन टर्बाइन, लैंडिंग गियर, कुछ सॉफ्टवेयर, वे लोकल लेवल पर बनाए जाएंगे।
Published: undefined
चीन ने कुछ महीने पहले अपना पहला स्वदेशी हाई-एंड एयरक्राफ्ट कैरियर चालू किया था, और इस साल शायद वह अपना पहला न्यूक्लियर-पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर भी ले आएगा। ऐसा होने के बाद, दुनिया के इस मैन्युफैक्चरिंग पावरहाउस के लिए इसे कॉपी करना और इसमें सुधार करना बहुत आसान हो जाएगा।
एक अमेरिकी डिफेंस रिपोर्ट में कहा गया है कि 10 साल में चीन के पास लगभग उतने ही एयरक्राफ्ट कैरियर होंगे जितने आज अमेरिका के पास हैं (यानी 11) और असल में पश्चिमी प्रशांत महासागर में उसके पास इनकी संख्या ज़्यादा होगी, जहां सारा एक्शन होता है। हवा में भी यही स्थिति देखने को मिलती है और 2025 में चीन ने ऐसे फाइटर एयरक्राफ्ट दिखाए जो पुराने हो रहे अमेरिकी बेड़े से उन्नत थे।
अमेरिका का दबदबा काफी हद तक इस वजह से था कि दुनिया भर के प्रतिभाशाली लोग अमेरिका चले गए थे। इस खुलेपन से भारतीयों, खासकर मिडिल क्लास को कुछ फायदे हुए, क्योंकि हमारे पास इंग्लिश बोलने का खास फायदा था। ट्रंप की नीतियों ने इसे खत्म कर दिया है, जैसा कि हम एच 1 बी प्रोग्राम की फीस और अमेरिकी यूनिवर्सिटीज़ में आ रही दिक्कतों से देख सकते हैं।
Published: undefined
भारत की तरह, चीन ने भी कभी अप्रवासियों का स्वागत नहीं किया है। लेकिन वह अपनी एकरूपता से खुश है और उसने इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी के ज़ोरदार इस्तेमाल से जनसंख्या में ठहराव से होने वाली कुछ दिक्कतों को खत्म कर कर दिया है।
2018 में, चीन ने पहली बार कारोबार के ज़रिए अमेरिका की खुली दुश्मनी महसूस की। उसे अंदाज़ा था कि क्या होने वाला है और उसने अगले सात साल खुद को तैयार करने में बिताए, ऐसा करने वाला वह अकेला देश था। जब एक साल पहले ट्रंप सत्ता में वापस आए, तब तक वह तैयार था और अब उसे रोकना नामुमकिन हो गया है। उसने यह वक्त यह पक्का करने में बिताया कि वह किसी पर निर्भर न रहे, बल्कि आत्मनिर्भर बने। उसने इतने कम समय में यह इतनी अच्छी तरह से हासिल कर लिया कि अब दुनिया उस पर निर्भर हो गई है।
चीन ने ऐसा अमेरिका द्वारा अपनाए गए रास्ते से उल्टा चलकर किया है। चीन ने सरकार की भूमिका बढ़ाई है, इसने कॉर्पोरेट्स की मनमानी पर रोक लगाई है, इसने सबसे एडवांस्ड टेक्नोलॉजी को रिजेक्ट कर दिया है और अपनी खुद की टेक्नोलॉजी बनाने का फैसला किया है। इसने बैंकों को रियल एस्टेट को लोन देना बंद करने और इसके बजाय इंडस्ट्री को फंड देने के लिए मजबूर किया।
चीन इस सारी तैयारी और उस पर अमल करने की वजह से ही आज उस जगह पर है, जो आबादी के मामले में बूढ़े हो रहे, दुनिया से खुद को अलग कर रहे और पीछे छूट रहे अमेरिका के वैश्विक दबदबे के लिए एकमात्र गंभीर चुनौती बन गया है।
यह देखना दिलचस्प होगा कि हमारे समय के इन दो आधुनिक दिग्गजों के बीच इस बड़ी प्रतिद्वंद्विता में इस साल क्या नया होगा।
Published: undefined
Google न्यूज़, नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia
Published: undefined