
मोदी जी के जन्मदिन पर आदेश था कि आशीर्वाद के दीये जलाएं। 76 वर्ष के बुजुर्ग तो आशीर्वाद देते हैं, लेते नहीं मगर भाजपाई उल्टी खोपड़ी के होते हैं। इस उम्र के तमाम लोग जब कुछ और सोचना शुरू कर देते हैं, 25 साल से पद पर जमे इस शख्स को छोटों-बड़ों सबका आशीर्वाद चाहिए था। उम्र आराम करने की है, आराम करो। तो मिल गया लोगों का आशीर्वाद?जल गए आशीर्वाद के दीये?
हां सरकारी आदेश से जो दीये जले, उनमें आशीर्वाद रूपी जितना तेल हो सकता है, उतना था और उतनी देर वे ईमानदारी से जले भी! तेल के नीचे एथेनॉल था। उसके संपर्क में आते ही ईमानदारी से वे बुझ गये। बताते हैं कि अकेले उज्जैन के क्षिप्रा तट पर पच्चीस लाख सरकारी दीये जले। सरकार किसी की हो, अगर सच नहीं बोलती तो झूठ भी नहीं बोलती। वैसे भी दीये सरकारी, बत्ती सरकारी, तेल सरकारी, अफसर सरकारी, अखबार और टीवी चैनल सरकारी तो झूठ बोलने की जरूरत क्यों! हां सब सरकारी, वहां सफलता भी सरकारी! फिर वह प्रधानमंत्री के जन्मदिन के दीयों की संख्या हो या मुख्यमंत्री के जन्मदिन के दीयों की! सरकारी काम की नियति है, सफल होना। फूटे दीये से तेल बहे तो भी वह आशीर्वाद पूरा देगा। बाती छोटी हो, तेल कम हो तो भी वह सरकारी है,आशीर्वाद कम नहीं देगा!
फिर सरकारी टारगेट जितना बड़ा होता है, 'सफलता' का पैमाना भी उतना ही बड़ा होता है।मोदी जी इसीलिए टारगेट हमेशा बड़ा रखते हैं। हजार करोड़ से नीचे तो वे उतरना जानते ही नहीं। वह तो दीयों की बात थी तो करोड़ में मान गए। बड़ा टारगेट होता है तो मलाई भी अधिक होती है और चाटकर संतोष प्राप्त करनेवाले भी बहुतेरे होते हैं। सब आनंद प्राप्त करते हैं।
चाटने के बाद कोई इतना बेवफा़ नहीं होता कि कहे कि कार्यक्रम सफल नहीं हुआ। हम उज्जैन की बात नहीं कर रहे हैं, वह तो पवित्र नगरी है, वहां कुछ गड़बड़ हो नहीं सकता। महाकाल की सब पर निगाह रहती है। वहां जो भी हुआ होगा, पवित्र ही हुआ होगा। ऊपर से मुख्यमंत्री मोहन यादव वहां के हैं तो वहां तो पूरे के पूरे पच्चीस लाख दीये ही जले होंगे। दो-चार दीये ज्यादा ही जले होंगे, कम नहीं।
कल्पना करो कि वह कोई और शहर हुआ होता, इतना पवित्र नहीं हुआ होता या बिलकुल भी पवित्र नहीं हुआ होता और वहां मोदी जी के जन्मदिन पर पच्चीस लाख दीये जलाने का आयोजन तय हुआ होता तो वहां पांच लाख दीये ही पच्चीस लाख बनकर प्रकट हो जाते! जहां जितने ज्यादा 'होशियार' नेता, अफसर और पत्रकार आदि होते हैं, वहां एक लाख दीये ही आवश्यकतानुसार बढ़ जाते हैं। उन्हें अगर पच्चीस लाख होने का आदेश मिला होता है तो वे पच्चीस लाख हो जाते हैं। दांये से बांये गिनो तो भी पच्चीस लाख, बांयें से दायें गिनो तो भी पच्चीस लाख। बीच से गिनो तो भी पच्चीस लाख! संकल्प मजबूत हो तो जहां एक भी दीया नहीं हो, वहां भी पच्चीस लाख हो जाते हैं और मोदी जी के पास संकल्प का अभाव नहीं है! उन्होंने संकल्पों की दुकान लगा रखी है!
तो कहने का मतलब यह है कि जो भी, जहां भी सरकारी था, वह सफल था मगर जो सरकारी नहीं था, उसका क्या हुआ? वहां आशीर्वाद के दीये कितने जले? फेसबुक वगैरह की तमाम रिपोर्ट्स बताती हैं कि चार सौ घरों में से कहीं एक दीया जलता हुआ दिखा। मुझे तो पांच सौ घरों में भी एक दीया जलता हुआ नहीं दिखा मगर शुक्रवार के दिन आपको मीडिया में कहीं ऐसी कोई खबर देखने को मिली? नहीं मिली होगी। मिल ही नहीं सकती!
फेसबुक आदि पर उसी दिन शाम की रिपोर्ट थी कि भक्तों ने भी आशीर्वाद के दीये जलाने से परहेज़ किया। बीस रुपए का तेल, दस रुपए का एक दीया और बीस पैसे की बाती के पैसे भी उनसे खर्च नहीं किए गए। एक दीया तक उनसे जलाया नहीं गया। तेल महंगा है, यह सच है मगर मोदी जी इतने सस्ते भी नहीं हैं कि भक्त साल में एक बार उन पर बीस-तीस रुपए भी खर्च नहीं कर सकते। मगर हकीकत यही थी!
यही भक्त प्रोफेसर, पत्रकार, वकील, डॉक्टर आदि विभिन्न रूपों में इन्हीं मोदी जी के कहने पर ताली-थाली बजाकर बड़े विश्वास के साथ कोरोना भगा रहे थे। यही थे वे जो कहते थे कि पेट्रोल हजार रुपए लीटर भी हो जाएगा तो परवाह नहीं मगर हम वोट मोदी जी को ही देंगे। जीतेगा तो मोदी ही। वे एक दीया तक नहीं जला सके! इतने कठोर हृदय हो गए हैं? क्या उन्होंने मान लिया है कि मोदी के तिलों में अब तेल नहीं? यह तो बहुत गंभीर बात है।
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उधर बीबीसी हिंदी ने अपने पाठकों-दर्शकों से पूछा कि मोदी जी के जन्मदिन पर आप उन्हें क्या गिफ्ट देना चाहेंगे तो इन्हीं अर्बन नक्सलों, इन्हीं दिमागी नक्सलों ने उन्हें ऐसे-ऐसे 'शानदार' गिफ्ट दिये कि बीबीसी शर्मिंदा हो गई। लोग गिफ्ट पर गिफ्ट, गिफ्ट पर गिफ्ट देते चले गए, रुके नहीं।तीस हजार से अधिक गिफ्ट दे दिए।
इनके सोशल मीडिया सेल के कर्मचारियों ने बारह साल में लोगों को जितने गिफ्ट दिए थे, बताते हैं कि वे सारे के सारे गिफ्ट एक ही झटके में लोगों ने रिटर्न गिफ्ट के रूप में वापस कर दिए मगर भक्त फिर भी नहीं जागे। लगता है भक्त भी अब भक्त नहीं रहे। अपने घर में पल रहे जेन जी के असर में आ चुके हैं। अब 2047 खतरे में है, विकसित भारत का अब क्या होगा! क्या हम पिछड़े ही रह जाएंगे?
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