
लोकतंत्र में धरना-प्रदर्शन महज़ सड़क पर जमा भीड़ नहीं होता। वह सत्ता के सामने नागरिक की मौजूदगी और असहमति की सार्वजनिक आवाज होता है। इसलिए जब शहर के बीचोबीच या सत्ताकेंद्र के आसपास मौजूद किसी पुराने धरना-प्रदर्शन स्थल को हटाकर प्रदर्शनकारियों को शहर के किनारे, दूरदराज या अपेक्षाकृत सुनसान जगह भेज दिया जाता है, तो सवाल केवल यातायात, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता। सवाल यह भी उठता है कि कहीं आंदोलन की आवाज को सत्ता के आंख-कान से दूर तो नहीं किया जा रहा? सत्ता को वैसे भी प्रतिरोध की आवाज़ कहां भाती है।
लखनऊ में जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा और दारुलशफा से लक्ष्मण मेला मैदान और फिर ईको गार्डन तक का सफर हो, पटना में बेली रोड और आर-ब्लॉक से गर्दनीबाग की ओर बदलाव हो या दिल्ली में बोट क्लब से जंतर-मंतर और अब उससे भी आगे ले जाने की कोशिश, इन घटनाओं को एक साथ देखने पर एक खास पैटर्न दिखाई देता है। हर बार वजह लगभग वही होती है- ट्रैफिक, सुरक्षा, आम लोगों को असुविधा या शहर का इंतज़ाम।
लेकिन क्या लोकतंत्र में असुविधा से बचाने का सबसे आसान रास्ता यही है कि असहमति को ही शहर से बाहर कर दिया जाए?
धरना-प्रदर्शन स्थल सत्ता केन्द्र से जितना दूर होता जाता है, यह सवाल उतना ही महत्वपूर्ण होता जाता है कि सरकार धरना-प्रदर्शन की जगह बदल रही है या प्रतिरोध की राजनीतिक दृश्यता को ही खत्म कर देना चाहती है?
यहां पहले विधान भवन के बिलकुल पास जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा या दारुलशफ़ा धरना प्रदर्शन की जगह होती थी। फिर इसे गोमती किनारे लक्ष्मण मेला स्थल ले जाया गया और उसके बाद इको गार्डन शिफ़्ट कर दिया गया जो शहर से खासा दूर है और लोगों की सहज पहुंच से बाहर। लखनऊ में धरना स्थल हटाने की शुरुआत सबसे पहले 2007 में मायावती के शासन के दौरान हुई जब इसे झूलेलाल पार्क ले जाया गया। लेकिन, 2009 में शहीद स्मारक की ओर धकेल दिया गया जहां पर्याप्त जगह ही नहीं थी। मार्च 2012 में अखिलेश यादव की सपा सरकार ने विधानभवन के सामने वाला पुराना धरना स्थल बहाल कर दिया लेकिन बाद में इसके लिए अक्टूबर 2013 में गोमती नदी के किनारे लक्ष्मण मेला मैदान और रमाबाई आंबेडकर स्थल निर्धारित हुए, जहां शामिल होने वालों की संख्या के आधार पर अलग-अलग अनुमति दी जानी थी। अन्य स्थलों की तलाश भी जारी रही। बाद में बीजेपी की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने 2018 में लक्ष्मण मेला मैदान पर धरना-प्रदर्शन पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया और शहर से खासा दूर ईको गार्डन को एकमात्र अधिकृत धरना-प्रदर्शन स्थल बना दिया गया।
अस्सी के दशक तक धरना स्थल बेली रोड पर हुआ करता था, जिसका नाम ही हड़ताली मोड़ था। नाम से ही समझ आ जाता था। फिर 1999 के आसपास से 2014 तक आर ब्लॉक आंदोलनकारियों का महत्वपूर्ण ठिकाना रहा। 2015 में इसे यहां से हटाकर गर्दनीबाग ले जाया गया, लेकिन अब (फरवरी 2026 की रिपोर्टों के अनुसार) इसे शहर से खासा दूर जेपी गंगा पथ यानी मरीन ड्राइव के निकट ले जाने की तैयारी है।
देश की राजधानी में पहले इंडिया गेट या बोट क्लब से धरना प्रदर्शन प्रतिबंधित हुआ और अब आख़िरकार जंतर-मंतर से भी इसकी विदाई तय कर दी गई।
भारत में धरना-प्रदर्शन की जगहों का इतिहास देखें तो इसका दिलचस्प सिलसिला है। ट्रेड यूनियन अंदोलन से गहराई से जुड़े रहे राकेश वेदा के शब्दों में कहें तो पहले आंदोलन सत्ता के दरवाजे पर होते थे, ‘सत्ता’ धरना स्थल तक आकर उनकी आवाज़ खुद सुनती थी। फिर उन्हें शहर के किसी तयशुदा स्थल पर भेजा गया और धीरे-धीरे ये स्थल भी सत्ता के केन्द्र से इतनी दूर होते गए, जहां से प्रतिरोध की आवाज़ क्या उसकी अनुगूंज भी सुनाई न दे। प्रतिरोध के स्वर किसी भी सत्ता को कहां भाते हैं।
लखनऊ, पटना और दिल्ली इसके सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। लेकिन यह कहानी केवल इन तीन शहरों की नहीं है। मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलुरु और जयपुर में भी आंदोलन की जगहों को लेकर विवाद होते रहे हैं।
दीपक कबीर सवाल करते हैं- क्या लखनऊ या पटना में विधानभवन के आसपास प्रदर्शन से यातायात और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होती थी? हां, होती थी लेकिन क्या इसका समाधान यह होना चाहिए कि प्रदर्शनकारियों को शहर के ऐसे छोर पर भेज दिया जाए जहां से उनकी आवाज सत्ता और आम जनता तक पहुंच ही न पाए?
दीपक कहते हैं चयनित स्थलों में प्रदर्शन आयोजित करना अपने आप में लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं है, लेकिन यदि किसी प्रदर्शन स्थल तक पहुंचना ही मुश्किल हो, बुनियादी सुविधाएं अपर्याप्त हों, मीडिया और जनता का ध्यान भी कम मिले, तो उसका व्यावहारिक असर जरूर पड़ सकता है। लखनऊ और पटना के मामले में यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
धरना केवल भीड़ जुटाने का नाम नहीं है। उसका उद्देश्य अपनी मांग को जिम्मेदार सत्ता तक पहुंचाना भी है।
दिल्ली में बोट क्लब से जंतर-मंतर और अब तीन नए स्थल
दिल्ली के मामले में 12 अक्टूबर 2026, एक बड़ा बदलाव सामने आया है। दिल्ली में आंदोलन स्थलों का ऐतिहासिक क्रम रहा है: इस यात्रा को बोट क्लब से शुरू कर जंतर-मंतर होते हुए अब ‘रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और ईस्ट दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड’ तक की यात्रा के रूप में समझ सकते हैं। इस फैसले के बाद जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के अधिकार और आंदोलन की जगह निर्धारित करने की प्रशासनिक शक्ति को लेकर विवाद पैदा हुआ है। यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जंतर-मंतर केवल एक सड़क या मैदान नहीं था। वह राष्ट्रीय स्तर पर विरोध दर्ज कराने का प्रतीक बन चुका था।
बोट क्लब क्यों महत्वपूर्ण था?
राजपथ के आसपास बोट क्लब दिल्ली में बड़े राजनीतिक और किसान आंदोलनों का प्रमुख केन्द्र हुआ करता था।
1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों का विशाल प्रदर्शन यहीं हुआ था। इसके बाद बड़े प्रदर्शनों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच बोट क्लब पर जमावड़े को प्रतिबंधित किया गया और 1993 के आसपास जंतर-मंतर आंदोलनकारियों का प्रमुख ठिकाना बनने लगा।
जंतर-मंतर की खासियत यह थी कि वह संसद और केन्द्रीय सत्ता के निकट था। अनेक राष्ट्रीय आंदोलनों ने इसे देशव्यापी पहचान दिलाई।
2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने वहां प्रदर्शनों पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। लेकिन 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण प्रतिबंध के बजाय नियमन का रास्ता अपनाया और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की अनुमति को लेकर महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया।
नए स्थलों पर प्रदर्शन की अनुमति मिलना एक बात है। लेकिन क्या वहां से प्रदर्शन की आवाज उसी प्रभाव के साथ संसद, मंत्रालयों, मीडिया और आम जनता तक पहुंचेगी? यह अलग सवाल है।
हैदराबाद में इंदिरा पार्क के निकट स्थित धरना चौक लंबे समय तक आंदोलनों का महत्वपूर्ण स्थान रहा लेकिन मार्च 2017 में पुलिस ने वहां सार्वजनिक सभाओं और धरनों की अनुमति नहीं देने का फैसला किया, जिसका व्यापक विरोध हुआ। विवाद इस पर था कि क्या प्रदर्शनकारियों को किसी वैकल्पिक स्थल पर भेजकर शहर के पुराने और पहचाने जाने वाले आंदोलन स्थल को समाप्त करना उचित है? यहां लोग केवल अपनी मूल मांगों के लिए नहीं, बल्कि विरोध करने की जगह बचाने के लिए भी सड़कों पर उतरे।
चेन्नई में मरीना बीच ऐतिहासिक रूप से जनसभाओं और राजनीतिक आंदोलनों का प्रमुख केन्द्र रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर द्रविड़ राजनीति तक, इस स्थान ने अनेक बड़े जनसमूहों को देखा है। समय के साथ मरीना और कामराज सालै पर प्रदर्शनों को लेकर प्रतिबंध और नियमन बढ़े। वल्लुवर कोट्टम, चेपॉक और अन्य स्थान वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों के रूप में सामने आए।
मुंबई की स्थिति थोड़ी अलग है। वहां आजाद मैदान लंबे समय से प्रदर्शन और मोर्चों का प्रमुख केंद्र रहा है। 1997 में दक्षिण मुंबई के निवासियों की शिकायतों के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि दक्षिण मुंबई में निकलने वाले विरोध मार्च आजाद मैदान में समाप्त हों। इससे मंत्रालय और चर्चगेट जैसे इलाकों में यातायात और शोर की समस्या कम करने की कोशिश की गई।
मार्च 2025 में आजाद मैदान को निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित करने की दिशा में कदम उठाए गए और प्रदर्शनों पर कई तरह की शर्तें लगाई गईं।
मुंबई का उदाहरण बताता है कि हर शहर में आंदोलन को दूर भेजना ही एकमात्र तरीका नहीं है। प्रशासन किसी केन्द्रीय स्थल को निर्धारित कर सकता है, लेकिन वहां भी प्रदर्शन की संख्या, समय और स्वरूप पर सीमाएं लगा सकता है।
बेंगलुरु में लालबाग और कब्बन पार्क सहित कई सार्वजनिक स्थानों पर पहले राजनीतिक सभाएं और प्रदर्शन होते थे। यातायात और अन्य समस्याओं के कारण फ्रीडम पार्क को विरोध-प्रदर्शनों और रैलियों के लिए विकसित किया गया। यह पुराने केन्द्रीय कारागार के परिसर का हिस्सा था, जिसके कुछ क्षेत्र को सार्वजनिक उपयोग के लिए खोला गया और एक हिस्सा लोकतांत्रिक प्रदर्शनों के लिए निर्धारित किया गया।
जयपुर में स्टैच्यू सर्किल पहले विरोध-प्रदर्शनों और सार्वजनिक मांगों को उठाने का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप बदलने और वहां विरोध-प्रदर्शन के लिए पर्याप्त जगह न मिलने की शिकायतें उठीं। 2009 में रोजगार और सूचना के अधिकार से जुड़े कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन देकर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए स्थान उपलब्ध कराने की मांग की थी। उनकी शिकायत थी कि पहले जहां प्रदर्शन होते थे, वहां अब लोगों के लिए आंदोलन करना कठिन हो गया है।
यहां सवाल उठता है कि क्या विरोध को शहर से बाहर भेजकर उसकी राजनीतिक ताकत कम की जा सकती है? जवाब हां और ना दोनों में है। लखनऊ के ईको गार्डन, पटना के गर्दनीबाग और दिल्ली के नए निर्धारित स्थलों को एक साथ रखकर देखें तो एक गंभीर सवाल सामने आता है।
क्या विकास और शहरी प्रबंधन के नाम पर हमारे बड़े शहरों में आंदोलन के लिए कथित तौर पर जगह तो बचाई जा रही है, लेकिन उस जगह को धीरे-धीरे सत्ता और सार्वजनिक जीवन से दूर किया जा रहा है?
संभव है इसका उत्तर हर शहर में अलग-अलग मिले लेकिन फिर भी इन उदाहरणों में एक साझा प्रवृत्ति तो दिखाई देती ही है- प्रशासन यातायात, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर प्रदर्शनों को निर्धारित स्थानों तक सीमित कर देना चाहता है।
लोकतंत्र में व्यवस्था जरूरी है, लेकिन विरोध की दृश्यता भी जरूरी है।
किसी कर्मचारी या जन संगठन को अपनी मांग सरकार तक पहुंचानी है, छात्रों के किसी समूह को भर्ती परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठानी है, किसानों को अपनी फसल का उचित मूल्य मांगना है या नागरिकों को सरकारी नीति का विरोध करना है- तो उसके लिए निर्धारित स्थल तक पहुंच पाना और वहां प्रभावी ढंग से अपनी बात रखना संभव होना चाहिए।
धरना स्थल केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता। वह नागरिक और सत्ता के बीच संवाद का सार्वजनिक मंच होता है। यदि यह मंच इतना दूर, असुविधाजनक या नियंत्रित कर दिया जाए कि वहां पहुंचना और अपनी आवाज सुनाना ही कठिन हो जाए, तो सवाल केवल यातायात प्रबंधन का नहीं रह जाता। सवाल यह हो जाता है कि लोकतंत्र में असहमति के लिए वास्तव में कितनी जगह बची है।