शख्सियत

इंटरव्यू: दिल्ली में रहकर बिहार के सुपौल ज़िला स्थित स्कूलों और मदरसों में उर्दू की सिंचाई कर रहे मोहम्मद मेहरबान अली

बचपन से ही मेधावी रहे मेहरबान अली के लिए वह दिन अत्यंत खुशी का था, जब अपनी प्रतिभा के आधार पर ऐतिहासिक जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) के अरबी विभाग में प्रवेश प्राप्त किया।

एसबीवी नंबर 1’ के परिसर में मोहम्मद मेहरबान अली
एसबीवी नंबर 1’ के परिसर में मोहम्मद मेहरबान अली 

मोहम्मद मेहरबान अली दिल्ली सरकार के अधीन चल रहे ‘एसबीवी नंबर 1, मोलरबंद स्कूल’ से जुड़े हुए हैं और टीजीटी उर्दू के रूप में 9 जनवरी 2020 से शिक्षण सेवाएं दे रहे हैं। क्रिकेट और पर्यटन के प्रति गहरी रुचि रखने वाले मेहरबान अली जब विद्यार्थियों को उर्दू पढ़ाते हैं तो हमेशा इस बात का ध्यान रखते हैं कि किसी को उकताहट या थकन का अनुभव न हो। अर्थात वे शिक्षण के लिए विद्यार्थियों के बीच एक सुखद वातावरण स्थापित करते हैं और पाठ्यक्रम को रोचक ढंग से पढ़ाते हैं। उनके इसी शिक्षण तरीके का परिणाम है कि स्कूल प्रशासन ने बोर्ड परीक्षाओं में विद्यार्थियों की शत-प्रतिशत सफलता पर मोहम्मद मेहरबान को 3 बार ‘शत-प्रतिशत परिणाम पुरस्कार’ से सम्मानित किया।

मेहरबान अली के लिए इस स्थान तक पहुंचना बहुत आसान नहीं था। उनका जन्म 18 जनवरी 1988 को बिहार के सुपौल ज़िले में स्थित बसंतपुर में हुआ, जो नेपाल सीमा से सटा हुआ है। वहां शैक्षिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, लेकिन पिता सलीम अंसारी और माता बीबी सईदन ने बचपन से ही मेहरबान अली की शिक्षा का विशेष ध्यान रखा। उन्होंने भारत-नेपाल सीमा पर स्थित मदरसा ज़िया-उल-उलूम नरसिंह से क़ुरआन हिफ़्ज़ (कंठस्थ) किया और उर्दू, अंग्रेजी तथा गणित की प्रारंभिक शिक्षा भी वहीं प्राप्त की। कक्षा चौथी से सातवीं तक की शिक्षा मदरसतुल इस्लाह (संसरी, नेपाल) से प्राप्त की और फिर 2002 में आज़मगढ़ (उत्तर प्रदेश) का रुख किया, जहां ‘मदरसा जामिअतुल फलाह’ बिलरियागंज से जुड़े। वहां मेहरबान अली ने आठवीं से बारहवीं कक्षा तक की शिक्षा पूरी कर मौलवी और आलिमियत की उपाधि प्राप्त की।

बचपन से ही मेधावी रहे मेहरबान अली के लिए वह दिन अत्यंत खुशी का था, जब अपनी प्रतिभा के आधार पर ऐतिहासिक जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) के अरबी विभाग में प्रवेश प्राप्त किया। यह 2008 का समय था। बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसी विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ़ एजुकेशन से 2011-12 में बीएड की पढ़ाई पूरी की और फिर 2014 में एमए की उपाधि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से प्राप्त की। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ही एमफिल के लिए भी प्रवेश मिल गया, लेकिन यह पूरा नहीं हो सका, क्योंकि उनकी नियुक्ति टीजीटी अरबी के रूप में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के ‘एबीके हाई स्कूल’ (गर्ल्स) में हो गई। उन्होंने कुछ वर्षों तक अलीगढ़ के सीनियर सेकेंडरी (गर्ल्स) में भी पीजीटी के रूप में शिक्षण दायित्व निभाए। 2018 में उन्होंने पीएचडी के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के अरबी विभाग में प्रवेश लिया और डॉ. असग़र महमूद के मार्गदर्शन में डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त कर ली।

ध्यान देने वाली बात यह है कि मेहरबान अली अब अरबी से उर्दू की ओर रुख कर चुके हैं और एमए उर्दू मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय (हैदराबाद) से अक्टूबर 2026 में पूरा भी कर रहे हैं। साथ ही जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एमए एजुकेशन भी जारी है। शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ मेहरबान अली पूरी जिम्मेदारी के साथ शिक्षण का दायित्व भी निभा रहे हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि उनकी एक पुस्तक भी शीघ्र प्रकाशित होने वाली है। उन्होंने बताया कि प्राचीन से आधुनिक काल तक की सूक्तियों और कहावतों पर आधारित चयनित अरबी कविताओं का उर्दू अनुवाद उन्होंने किया है, जो अब प्रकाशन के चरण में है।

‘एसबीवी नंबर-1’ स्कूल का संक्षिप्त इतिहास बताएं। इस स्कूल की कोई विशिष्टता हो तो उस पर प्रकाश डालें।

यह स्कूल दिल्ली के दक्षिण-पूर्व जिले के मीठापुर में स्थित है। प्राचीन दस्तावेज बताते हैं कि इसकी स्थापना 1960 से पहले हुई थी। यह बदरपुर विधानसभा क्षेत्र का एक ऐतिहासिक और प्रसिद्ध स्कूल है। मोलरबंद गांव वालों ने इसके लिए जमीन उपलब्ध कराई थी, इसलिए इसके नाम के साथ ‘मोलरबंद’ जुड़ा हुआ है। दिल्ली में अधिकांश स्कूल सुबह और शाम 2 पालियों में चलते हैं। एक ही इमारत में सुबह लड़कियों और शाम को लड़कों को पढ़ाया जाता है। हालांकि दोनों पालियों के शिक्षक और कर्मचारी अलग होते हैं। सुबह और शाम की पालियों को मिलाकर इस समय हमारे स्कूल से सटे हुए 11 स्कूल स्थापित हैं, जो समय के साथ इसी स्कूल से अलग होकर बने हैं। इस तरह हमारे स्कूल को मातृ विद्यालय (Mother School) का दर्जा प्राप्त है। इन 11 स्कूलों में 3 ‘एसबीवी’ (सर्वोदय बाल विद्यालय), 3 ‘एसकेवी’ (सर्वोदय कन्या विद्यालय) हैं और बाकी ‘जीबीएसएसएस’ (गवर्नमेंट बॉयज सीनियर सेकेंडरी स्कूल) और ‘जीजीएसएसएस’ (गवर्नमेंट गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल) हैं। सर्वोदय विद्यालयों में कक्षा पहली से बारहवीं तक की पढ़ाई होती है, जबकि सीनियर सेकेंडरी स्कूलों में पांचवीं कक्षा से ऊपर की शिक्षा होती है।

हमारा यह स्कूल भी पहले ‘जीबीएसएसएस’ ही था और 2008 में सर्वोदय स्कूल में बदल गया। एक लंबे समय तक हायर सेकेंडरी (11वीं और 12वीं) में केवल कला की पढ़ाई होती रही। 2008 में पहली बार शीला दीक्षित सरकार में वाणिज्य की पढ़ाई शुरू हुई और फिर 2012 में क्षेत्र के तत्कालीन विधायक और वर्तमान सांसद रामवीर विधूड़ी के प्रयासों से यहां विज्ञान संकाय की शुरुआत हुई। हायर सेकेंडरी में इस समय लगभग 600 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं।

इस स्कूल में किस कक्षा से किस कक्षा तक शिक्षा दी जाती है और उर्दू की शिक्षा की व्यवस्था किस कक्षा से है? उर्दू के विद्यार्थियों और शिक्षकों की संख्या कितनी है?

इस स्कूल में पहली से बारहवीं कक्षा तक की शिक्षा होती है। विद्यार्थियों की कुल संख्या लगभग 2700 है, जिनमें लगभग 300 मुस्लिम विद्यार्थी हैं। वर्तमान में छठी से दसवीं कक्षा तक ही उर्दू पढ़ाने की व्यवस्था है। उर्दू पढ़ने वाले बच्चों की संख्या लगभग 150 है। शिक्षकों की कुल संख्या 90 है, जिनमें 7 मुस्लिम शिक्षक भी हैं। वर्तमान में स्कूल को उर्दू के 2 शिक्षक उपलब्ध हैं।

आपने स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि अरबी भाषा में प्राप्त की है, लेकिन शिक्षण के लिए उर्दू भाषा का चयन किया। कोई विशेष कारण?

उर्दू भाषा और साहित्य से मेरा लगाव बचपन से था। स्नातक के लिए मैंने अरबी ऑनर्स जरूर रखा, लेकिन वैकल्पिक विषय के रूप में मैंने उर्दू का चयन किया था। 2018 में ‘दिल्ली सबऑर्डिनेट सर्विसेज सिलेक्शन बोर्ड’ (डीएसएसएसबी) के माध्यम से जब उर्दू शिक्षकों की भर्ती की घोषणा की गई तो उसमें स्नातक के 2 वर्षों में उर्दू पढ़ने वाले उम्मीदवारों को भी आवेदन करने के योग्य माना गया। इसलिए मैंने भी फॉर्म भरा और उसकी लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। बाद में मेरी नियुक्ति टीजीटी उर्दू के रूप में हुई। अब मैं पूरे उत्साह और एकाग्रता के साथ बच्चों को यह विषय पढ़ा रहा हूं।

आपका संबंध बिहार के सुपौल से है, जहां उर्दू की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। वहां उर्दू के विकास के लिए आप क्या कर रहे हैं?

बिहार में उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा प्राप्त होने के कारण सुपौल की शिक्षा व्यवस्था में भी उर्दू की शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यहां स्कूलों में शिक्षा विभाग की ओर से उर्दू की शिक्षा की व्यवस्था है और कई ऐसे स्कूल भी हैं जहां शिक्षा का माध्यम उर्दू है। इसके अतिरिक्त मदरसों में भी उर्दू की शिक्षा दी जाती है, लेकिन कुल मिलाकर यहां उर्दू का संवर्धन अत्यंत आवश्यक है। सुपौल के जिस क्षेत्र से मेरा संबंध है, वह कोसी अनुमंडल में आता है, जहां निश्चित रूप से उर्दू की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। इस क्षेत्र में उर्दू के लिए बहुत अधिक काम करने की आवश्यकता है और मैं इस ओर विशेष ध्यान दे रहा हूं। मैं सुपौल में स्थापित स्कूलों, विशेष रूप से मदरसों में विद्यार्थियों और प्रशासन को उर्दू पढ़ने-पढ़ाने के लिए प्रेरित करता रहता हूं। मदरसों में उर्दू को व्यवस्थित रूप से पाठ्यक्रम में शामिल करने और इसकी आधुनिक शिक्षण पद्धति पर समय-समय पर कार्यशाला भी आयोजित करता हूं, साथ ही उर्दू में उपलब्ध रोजगार के अवसरों से उन्हें अवगत कराता हूं। इसी प्रयास के तहत मैंने 22 जून 2025 को ‘दारुल अरक़म इस्लामिक स्कूल, बसंतपुर’ में एक कार्यशाला भी आयोजित की थी, जिसमें बड़ी संख्या में उर्दू शिक्षकों ने भाग लिया था। सुपौल के कई मदरसों और स्कूलों से मैं लगातार संपर्क में हूं और हर प्रकार का मार्गदर्शन करता रहता हूं। विशेष रूप से जब सुपौल जाना होता है तो विभिन्न शिक्षण संस्थानों का दौरा कर स्थिति का जायजा भी लेता हूं।

आपको सरकार ने 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान कुछ महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी थीं। इस बारे में कुछ बताएं, आपका वह अनुभव कैसा था?

19वें राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन (3 से 14 अक्टूबर 2010) राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुआ था। इन खेलों के बेहतर से बेहतर आयोजन के लिए हजारों की संख्या में स्वयंसेवकों की सेवाएं ली गई थीं। उनमें एक नाम मेरा भी था। उस समय मैं बीए अंतिम वर्ष का विद्यार्थी था। अरबी-अंग्रेजी त्वरित अनुवाद का कुछ ज्ञान प्राप्त हो चुका था और मुझे अरबी-अंग्रेजी अनुवादक के रूप में ही जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में नियुक्त किया गया, जहां इन खेलों के उद्घाटन और समापन समारोह आयोजित हुए थे। पहली बार इतने बड़े पैमाने पर विदेशी खिलाड़ियों को देखना और विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों से मिलना मेरे लिए बड़ी बात थी। मुझे याद है कि उस वर्ष हमारे खिलाड़ियों का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा था और 18 स्वर्ण पदकों सहित उन्होंने कुल 101 पदक प्राप्त किए थे।

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