
उस दिन अचानक बजाज साहब का फोन आया। लोनावला से, रामगोपाल बजाज साहब का। पता चला, हमारे बहुत ही अभिन्न मित्र, हिन्दी के बहुत ही महत्वपूर्ण नाटककार रामेश्वर प्रेम जी का देहांत हो गया। मैं लखनऊ में था। तुरत पहुंच भी नहीं सकता था। उनका जाना समूचे हिन्दी रंगमंच का, हम सबका, पूरे नाट्यांदोलन का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। वह इसी 3 अप्रैल को अस्सी वर्ष के हुए थे।
एक ऐसे दौर में जब हिन्दी में बहुत अच्छे नाट्यालेख नहीं आ रहे थे, मोहन राकेश, सुरेंद्र वर्मा, भीष्म साहनी, मणि मधुकर और शंकर शेष जैसे हिन्दी नाटककारों के बाद नाट्य परिदृश्य में जो एक खालीपन सा आ रहा था, मैं समझता हूं कि रामेश्वर प्रेम जैसा एक नाटककार आया और वह खालीपन भरने का काम किया। वह कवि भी थे, उन्होंने कहानियां भी लिखीं।
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'अजातघर' उनका चर्चित नाटक है। इसमें मात्र दो पात्र हैं। कहीं दंगा हो गया है और वे दोनों ही फंस गए हैं। पूरी रात काटनी है इसी में। सुबह होने तक कहीं दंगाई लोग आ न जाएं, उन्हें पकड़ न लें। दोनों इस लेवल पर भी भयभीत हैं और दूसरी तरफ साथ को लेकर भी कि दूसरा कौन सी जाति या धर्म का है? एक दूसरे को मारने पर न लग जाएं आदि आदि…। बहुत ही अच्छी प्रस्तुति रामगोपाल बजाज साहब ने तैयार की थी, नसीरुद्दीन शाह और राजेन्द्र जसपाल को लेकर और मैं उसमें उनको असिस्ट कर रहा था। तो उसका हम लोगों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया।
उन्हीं दिनों रामेश्वर जी से मेरी पहली मुलाकात हुई 1973 में और उसके बाद तो सिलसिला ही चल पड़ा। तब से लेकर उनके जाने तक लंबी-लंबी मुलाकातें, उनके नाटकों को लगातार देखना, उनको लगातार सुनना और उनको सुझाव देना, जैसे ‘अंतरंग’ नाटक जिसको बाद में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने खेला और ‘चारपाई’ जैसा नाटक जिसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल ने किया।
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मैं इस बात को रेखांकित करने की कोशिश कर रहा हूं कि एक ऐसे दौर में, जब मौलिक हिन्दी नाट्य लेखन नए-नए नाटकों के आने की वजह से थोड़ा पृष्ठभूमि में जा रहा था, ऐसे वक्त रामेश्वर प्रेम जैसे नाट्य लेखक का आना एक बहुत ही महत्वपूर्ण पड़ाव था और उन्होंने इस बात को साबित भी किया। इन दिनों उनका एक समग्र नाट्य छप रहा था। मैंने उसको पूरा पढ़ा और उसकी एक लंबी भूमिका भी मैंने लिखी है। रामेश्वर प्रेम के पांच या 11 नाटकों से गुजरते हुए और वह उसमें उस पुस्तक के शुरू में आएगा भी। मुझे बहुत खेद है कि वह अपने जीते जी इस प्रकाशन को देख नहीं पाए। मेरी उनके प्रति, उनके परिवार के प्रति बहुत-बहुत संवेदनाएं हैं।
मैं उनके यहां इतना ज्यादा रहा हूं, कितने दिन, कितनी रातें लगातार हमलोग नाटक पढ़ते-पढ़ते ही बिताया करते थे। कह लीजिए कि घोर जिसे कहते हैं, लगन के साथ लग जाते थे नाटक लिखने में। उनके पास अथाह ह्यूमर से भरे हुए किस्से-कहानियों का अपार भंडार था। हमलोग कलकत्ता में भी साथ रहे, जब वह वहां पोस्टेड थे। वहां भी कई बार उनके यहां गया।
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फिर मैं जब भारतेन्दु नाट्य अकादमी, लखनऊ में 1978-79 में पढ़ा रहा था तो वह मुझसे मिलने यहां लखनऊ भी आए। दिल्ली में तो हम लोग लगातार, जिसे कहना चाहिए कि खूब-खूब मिले, मिलते रहे। हां, यह सही है कि इधर कई वर्षों से कुछ मेरी व्यस्तता और फिर वह भी अपने छोटे बेटे के साथ गोआ जा कर रहने लगे थे, स्वास्थ्य कारणों से तो मुलाकातें जरूर थोड़ी कम हो गई थीं। लेकिन हम जब भी मिलते, वे मुलाकातें उतनी ही गर्माहट भरी, उतने ही जोश से भरी और उतने ही उत्साह से भरी हुई होतीं।
सच यही है कि मैं आज उनको बहुत मिस कर रहा हूं, उन्हें हमेशा बहुत-बहुत मिस करूंगा। मैं तो कहना चाहूंगा कि हमारा एक अंदरूनी हिस्सा जैसा, कुछ था जो आज अलग हो गया है और मैं किसी-न-किसी तरह से उसको, उस बचे हुए हिस्से को अब संभालने की कोशिश करूंगा। हम लोग बहुत-बहुत साथ रहे और जो ये अकेलापन अचानक उभरा है, ये बहुत दिनों तक मेरे साथ रहेगा। बहुत सारा अंतरंग है याद करने को।
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बहुत जीवंत आदमी थे रामेश्वर प्रेम। जब तक रहे इधर के एक-दो बरस को छोड़ दें अगर, तो लगातार गोष्ठियों में उनकी उपस्थिति, लगातार यात्राएं चाहे वह भारत भवन भोपाल हो, चाहे वह मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय हो, चाहे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय हो, यानी कोई भी जगह, कोई भी शहर, कोई भी नाट्य आयोजन, कोई भी संगोष्ठी या नाट्य प्रसंग आप याद करें, रामेश्वर प्रेम की अनिवार्य उपस्थिति आपको दिखाई देगी।
यह बहुत जरूरी भी है क्योंकि नाटक एक ऐसी विधा है जो बंद कमरे में बैठकर नहीं देखी जा सकती। उसके लिए लगातार नाटकों को देखना, उन्हें जीना होता है। उनके बीच रहना होता है। और हमलोगों को तो जिसे कहते हैं कि एक मित्र मंडली थी, उसमें रामगोपाल बजाज, रामेश्वर प्रेम, महेश आनंद, मैं, राजेन्द्र गुप्ता- ये चार-पांच लोग बहुत आपस में मिलते-जुलते।
हमने उन लोगों का एक नाटक भी किया अपनी संस्था से ‘कैम्प’ नाम का नाटक जो बहुत ही प्रचलित हुआ और जगह-जगह लोगों ने उसे खेला। तो ये सारी चीजें, मैं समझता हूं कि उस शून्य को, हिन्दी रंगमंच के शून्य को जो 70 से 90 तक के या 2000 तक के दशकों में आया, या फिर मोबाइल, कंप्यूटर इन सारी चीजों के आने के बाद आया, तो उसको रामेश्वर प्रेम के नाटकों ने बहुत अच्छे से भरने की कोशिश की। मेरी उनके प्रति बहुत ही हार्दिक गहन और श्रद्धानत विनम्र श्रद्धांजलि।
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