
सिनेमा में लीड एक्टर जितने महत्वपूर्ण होते हैं, उतने ही को-एक्टर भी। वे फिल्म को गहराई देते हैं, कहानी को मजबूत बनाते हैं और दर्शकों के दिलों में अपनी अलग पहचान छोड़ जाते हैं। ऐसे ही एक शानदार को-एक्टर थे शफी इनामदार। उन्होंने हर किरदार को पूरी ईमानदारी, संवेदनशीलता और कुशलता से निभाया। चाहे थिएटर हो, फिल्म या टीवी, शफी ने हमेशा अपनी अदाकारी से दर्शकों को प्रभावित किया। उनके किरदारों में जो सच्चाई और गहराई थी, वह उन्हें दर्शकों का प्रिय बनाती थी।
सिनेमा और थिएटर के मशहूर चरित्र अभिनेता शफी इनामदार की 13 मार्च को पुण्यतिथि है। शफी इनामदार दिलीप कुमार के जबरदस्त प्रशंसक थे और उन्हें इस बात की बहुत खुशी थी कि उन्होंने दिलीप साहब के साथ ‘इज्जतदार’ फिल्म में काम किया था। शफी इनामदार की एक्टिंग में ईमानदारी और गहराई थी। उनके किरदार दर्शकों को अपनी तकलीफ भुला देते थे। थिएटर से लेकर फिल्म और टीवी तक, उन्होंने हर माध्यम में अपनी छाप छोड़ी। आज भी उनके किरदारों की यादें लोगों के दिलों में जिंदा हैं।
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शफी इनामदार का जन्म 23 अक्टूबर 1945 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था। उन्होंने मुंबई के केसी कॉलेज से पढ़ाई पूरी की। बचपन से ही एक्टिंग का शौक था, लिहाजा, स्कूल-कॉलेज के दिनों से ही नाटकों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। इसी वजह से उनकी एक्टिंग की नींव बहुत मजबूत हो गई। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत गुजराती थिएटर की मशहूर हस्ती प्रवीण जोशी के मार्गदर्शन में की। बाद में बलराज साहनी से मुलाकात हुई और उन्होंने आईपीटीए, यानी इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन, ज्वाइन की।
शफी कहते थे कि उनकी एक्टिंग और डायरेक्शन में असली निखार तब आया जब वे बलराज साहनी के संपर्क में आए। 70 के दशक में उन्होंने पृथ्वी थिएटर्स ज्वाइन किया। यहां कई बड़े नाटक प्रोड्यूस और डायरेक्ट किए। पृथ्वीराज कपूर के बाद पृथ्वी थिएटर को उनके छोटे बेटे शशि कपूर ने संभाला। शशि कपूर शफी की एक्टिंग से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें अपनी फिल्म ‘विजेता’ में काम करने के लिए साइन कर लिया। साल 1982 में आई फिल्म के डायरेक्टर गोविंद निहलानी थे। उसी दौर में गोविंद निहलानी ने ‘अर्धसत्य’ में भी उन्हें महत्वपूर्ण भूमिका दी, जो दर्शकों को बहुत पसंद आई।
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शफी इनामदार का मानना था कि एक्टिंग उनकी जिंदगी है। वे यह नहीं देखते थे कि काम थिएटर में है, फिल्म में है या टीवी पर। 1984 में टीवी पर उनका सीरियल ‘ये जो है जिंदगी’ बहुत हिट हुआ, जिसमें स्वरूप संपत उनके साथ थीं। 80 के दशक में बीआर चोपड़ा की कई फिल्मों में उन्होंने काम किया, जो लोगों के दिलों में बस गईं। अभिनय से आगे बढ़कर साल 1995 में शफी डायरेक्टर बने। उनकी पहली फिल्म ‘हम दोनों’ थी, जिसमें नाना पाटेकर और ऋषि कपूर मुख्य भूमिकाओं में थे।
शफी इनामदार के खलनायक किरदार की शुरुआत की कहानी दिलचस्प है। जब जावेद अख्तर ने उन्हें रमेश सिप्पी की फिल्म ‘सागर’ में मुख्य विलेन का ऑफर दिया तो शफी ने पहली बार में ही हामी भर दी। अभिनेता ने बताया था कि इसके पीछे क्या वजह थी? एक इंटरव्यू के दौरान शफी ने बताया था कि उन्हें लगा कि ‘अर्धसत्य’ और ‘आज की आवाज’ जैसी फिल्मों में पुलिस अफसर के किरदारों के बाद अब एक अलग इमेज बनाने का मौका मिला है, तो इसे जरूर से स्वीकार करना चाहिए। यह ऑफर उनके लिए सही ब्रेक साबित हुआ, और उन्होंने दोनों तरह के रोल्स को बैलेंस करने की सोची।
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शफी की ईमानदारी और रियलिस्टिक एक्टिंग ने उन्हें दर्शकों का चहेता बनाया। ‘अर्धसत्य’ का इंस्पेक्टर रोल इतना पसंद आया कि कई फिल्मों में उन्हें उसी तरह के किरदार दिए गए, लेकिन शफी ने हमेशा विविधता बनाए रखी। उन्होंने टीवी पर ‘ये जो है जिंदगी’ और ‘मिर्जा गालिब’ में काम किया। शफी इनामदार ने एक इंटरव्यू में अपनी शुरुआत के बारे में बताया था कि उनका रुझान बचपन से स्टेज की तरफ था। कॉलेज के दिनों में साइंस ग्रेजुएट होने के बावजूद स्टेज की ओर झुकाव बढ़ गया। उन्होंने कहा, “पहले इसे सीरियसली नहीं लिया, लेकिन फिर सोचा कि अगर प्रोफेशन बनाना है तो पूरी मेहनत करनी होगी।” उनका पहला और सबसे मजबूत माध्यम स्टेज ही रहा।
गोविंद निहलानी विजय तेंदुलकर के साथ ‘अर्धसत्य’ की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे। निहलानी ने शफी को एक खूबसूरत और इंटरेस्टिंग रोल ऑफर किया, एक सीनियर ऑफिसर का बड़ा भाई। शफी को स्क्रिप्ट बहुत पसंद आई। यह ऑफबीट और आर्ट फिल्म थी, जिसमें ओम पुरी और स्मिता पाटिल मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म ने कमर्शियल और आर्ट दोनों स्तर पर सफलता पाई। उसके बाद बी.आर. चोपड़ा की ‘आज की आवाज’ में उन्होंने एक अलग तरह का इंस्पेक्टर का किरदार निभाया।
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फिर रमेश सिप्पी की ‘सागर’ में मुख्य विलेन का रोल मिला। शफी ने बताया था कि शबाना आजमी ने उन्हें बताया था कि एक बड़ी फिल्म में विलेन का रोल है। जावेद अख्तर ने ऑफर किया और शफी ने तुरंत हां कर दी। ‘सागर’ में ऋषि कपूर, कमल हासन और डिंपल कपाड़िया के साथ काम किया। यह उनके लिए नई इमेज बनाने का मौका था। इनामदार का मानना था कि एक्टिंग हर माध्यम में एक जैसी है, बस एडाप्टेशन की जरूरत होती है।
शफी ने स्टेज पर करीब 14-15 साल काम किया। पृथ्वी थिएटर्स और आईपीटीए से जुड़े रहे। उन्होंने कहा कि स्टेज लाइव आर्ट है, जहां ऑडियंस तुरंत रिस्पॉन्स देती है। फिल्म में फुटेज लिमिटेड होती है, इसलिए हर लाइन और एक्सप्रेशन सटीक होना जरूरी है। टीवी में फुटेज ज्यादा मिलती है, इसलिए वहां ज्यादा कम्फर्टेबल फील होता है, लेकिन उनका सबसे पसंदीदा माध्यम थिएटर रहा। फिल्मों में उन्होंने कई तरह के रोल जैसे पुलिस इंस्पेक्टर, विलेन, कॉमेडी, फैमिली मेंबर आदि के किए। उन्होंने बताया था कि ‘अर्धसत्य’ में पहली बार खुद को स्क्रीन पर देखकर जोश और काफी अच्छा महसूस हुआ। ट्रायल शो में उन्होंने ज्यादातर खुद को ही देखा तो पंडित सत्यदेव दुबे ने कहा कि बाकी कलाकारों को भी देखो। शफी ने कहा कि पहली फिल्म में गोविंद निहलानी के साथ काम करने का अलग ही मजा था।
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शफी ने लव मैरिज की थी। उनकी पत्नी भक्ति बरुवे महाराष्ट्रीयन थीं और एक अदाकारा के साथ दूरदर्शन की न्यूज रीडर भी थीं। शफी का साल 1996 में दिल का दौरा पड़ने से अचानक निधन हो गया था। उस वक्त वह घर पर आराम से बैठकर भारत और श्रीलंका के बीच विश्व कप के सेमीफाइनल मैच का लाइव प्रसारण देख रहे थे। दरअसल, शफी को क्रिकेट देखना और खेलना बहुत पसंद था। मैच देखते हुए वह अचानक बेहाल हो गए। हार्ट अटैक आया और वे चल बसे। उनकी मौत के पांच साल बाद 2001 में उनकी पत्नी भक्ति भी एक कार एक्सीडेंट में चल बसी थीं।
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