
अंग्रेज़ी में एक कहावत है ‘Actions speak louder than words’, अर्थात ‘आपका कर्म, बातों से बढ़कर बोलता है’। दुनिया में ऐसे लोग तो बहुत मिल जाते हैं जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन जब कर्म की बारी आती है तो वे जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। सच बात तो यह है कि जीवन में सफलता ‘बड़ी-बड़ी बातें’ करने वालों को नहीं मिलती, बल्कि उन्हें मिलती है जो ख़ामोशी के साथ कर्म को अंजाम देते हैं। एक ऐसी ही हस्ती हैं अरविंद शुक्ला। वह काम करने पर विश्वास रखते हैं, और वह भी पूरे जोश और जुनून के साथ। काम भी ऐसा जो न केवल परिश्रम की मांग करता है बल्कि धैर्य की भी परीक्षा लेता है। वे लगभग 2 दशकों से पत्रकारिता से जुड़े हैं। उनका ज्यादातर काम ऐसे मुद्दों पर रहा जिन्हें मुख्यधारा के मीडिया संस्थान नज़रअंदाज़ करते हैं, अर्थात कृषि, किसान मंडी और किसानों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे। निस्संदेह यह ऐसा क्षेत्र है, जिस पर ईमानदारी से बहुत कम पत्रकार बात करते हैं। किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं, खराब मौसम या प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसलों के नष्ट होने की जानकारी भी दी जाती है, लेकिन किसानों की मूल समस्याओं पर फलदायी चर्चा दुर्लभ ही है। यह जिम्मेदारी अरविंद शुक्ला ने उठाई और ‘न्यूज़ पोटली’ नाम से वेबसाइट तथा यूट्यूब चैनल शुरू करके किसानों के मुद्दों को नई पहचान देना आरंभ किया।
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‘न्यूज़ पोटली’ की स्थापना अरविंद शुक्ला ने 2022 में की और तब से लेकर अब तक उनका जीवन कठिन परिश्रम की एक कहानी रहा है। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से संबंध रखने वाले अरविंद शुक्ला एक किसान के बेटे हैं, इसलिए खेती-किसानी की परेशानियों और किसानों के वास्तविक मुद्दों पर उनकी गहरी नज़र है। 20 साल से ज्यादा पत्रकारिता के इस सफर में उन्होंने, ‘हिंदुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नई दुनिया’, ‘टोटल टीवी’, ‘समाचार प्लस’ जैसे संस्थानों में काम किया, लेकिन ग्रामीण भारत की पत्रकारिता की शुरुआत 2014 में हुई, जब ‘गांव कनेक्शन’ के साथ जुड़े। यहां काम करते हुए अरविंद शुक्ला ने खेती किसानी और ग्रामीण मुद्दों पर लगातार गंभीर रिपोर्ट की। ऐसी स्टोरीज़ पर उन्हें प्रशंसा भी मिलती थी और प्रोत्साहन भी। फिर भी वे अक्सर किसानों के जीवन, उनके मुद्दों और कृषि के समक्ष उपस्थित समस्याओं को सामने लाने के लिए एक मंच की आवश्यकता महसूस करते थे। वे चाहते थे कि एक ऐसा मंच हो जो पूरी तरह इस क्षेत्र के लिए समर्पित हो। ‘न्यूज़ पोटली’ उसी सोच का परिणाम है। लेकिन इसके लिए अरविंद शुक्ला को अनेक त्याग करने पड़े।
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नौकरी छोड़कर अरविंद शुक्ला ने जब स्वतंत्र ‘न्यूज़ पोटली’ की स्थापना की तो उनके सहकर्मियों और मित्रों ने उन्हें रोका। उनसे कहा गया कि यह पागलपन है, अत्यंत जोखिम भरा कार्य है। यह भी समझाया गया कि पत्नी और दो बच्चों के पालन-पोषण पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। ऐसे समय में अरविंद शुक्ला की जीवनसंगिनी साधना शुक्ला ने उनका उत्साह बढ़ाया, जो उनके उठाए गए कदम के महत्व को बहुत अच्छी तरह समझती थीं। उन्होंने उत्साहवर्धन करने के साथ-साथ ‘न्यूज़ पोटली’ की यात्रा अकेले शुरू करने वाले अपने पति को हरसंभव सहायता भी प्रदान की। जब आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा तो साधना ने नौकरी कर ली ताकि बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो। अरविंद बताते हैं कि जब उन्होंने ‘न्यूज़ पोटली’ शुरू की तो उनके पास 21 दिनों का वेतन और 72 हजार रुपये बोनस के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। वे सोच रहे थे कि स्वतंत्र पत्रकारिता से प्राप्त धन के माध्यम से वे अपना सपना पूरा कर लेंगे, लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब बच्चों की फीस जमा न होने के कारण उनका नाम विद्यालय से काट दिया गया। फिर भी उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे, क्योंकि साधना के प्रोत्साहन, नौकरी और त्याग ने उनके संकल्प को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया।
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अरविंद शुक्ला ने ‘न्यूज़ पोटली’ का यूट्यूब चैनल शुरू किया, तो इसका कारण यह था कि वीडियो के माध्यम से वे अपनी बात लोगों तक आसानी से पहुँचा सकते थे। विशेष रूप से अशिक्षित किसानों को उनके मुद्दों का समाधान बताने, पर्यावरणीय प्रभावों की जानकारी देने अथवा सरकारी नीतियों से उन्हें परिचित कराने के लिए वीडियो स्टोरीज़ अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। लेकिन आर्थिक कठिनाइयाँ हर कदम पर उनका पीछा कर रही थीं। उन्होंने एक समय अपने पिता से यहाँ तक कह दिया था कि यदि ‘न्यूज़ पोटली’ को चलाने के लिए उनके हिस्से की भूमि बेचनी पड़े, तो भी वे पीछे नहीं हटेंगे। क्योंकि वे जानते थे कि यदि यह मंच किसानों तक पहुँच गया, तो उन्हें अनेक प्रकार की समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। फिर उन्हें बहुत बड़ी राहत तब मिली, जब वर्ष 2022 के अंत में ‘पुलित्जर सेंटर’ से अनुदान प्राप्त हुआ। विशेष रूप से गन्ना किसानों पर की गई अरविंद की स्टोरीज़ ने लोगों को बहुत प्रभावित किया। ‘पुलित्जर सेंटर’ की वेबसाइट पर उनकी जमीनी रिपोर्ट्स उपलब्ध हैं, जिनमें बड़ी कंपनियों द्वारा गन्ना किसानों को जलवायु की चरम परिस्थितियों के भरोसे छोड़ दिए जाने, भारत की महिला गन्ना किसानों के गर्भाशय निकाले जाने और गन्ने की खेती से जुड़े प्रवासी मजदूरों के शोषण की कहानियां प्रस्तुत की गई हैं। ये स्टोरीज़ ऐसे मार्मिक जमीनी सच को सामने लाती हैं जिनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है।
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वास्तव में जिस प्रकार की रिपोर्टिंग अरविंद शुक्ला करते हैं, वह पत्रकार और किसान अथवा कृषि मजदूर के बीच विश्वास की माँग करती है। वे कहते हैं कि कई बार फ़ील्ड रिपोर्टिंग के दौरान लोग खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते। विशेष रूप से महिलाएँ अपनी समस्याएं व्यक्त करने में झिझक और संकोच का अनुभव करती हैं। जैसे, महाराष्ट्र की एक 15 वर्षीय गन्ना मजदूर से जब उन्होंने बात की तो वह अपने मुद्दे खुलकर कैसे बता सकती थी। वह छह माह की गर्भवती थी और गांव में काम न होने के कारण पड़ोसी राज्य कर्नाटक में गन्ना कटाई करने जाना चाहती थी। वहां उसे एक झोपड़ी में बच्चे को जन्म देना पड़ता, जहां किसी प्रकार की चिकित्सीय सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी। ऐसी बातें हर किसी से नहीं कही जा सकतीं, विशेष रूप से पत्रकारों से तो बिल्कुल भी नहीं। इसी प्रकार महिला गन्ना किसानों के गर्भाशय निकाले जाने की स्टोरी भी ‘विश्वास’ पर ही केंद्रित थी। अरविंद शुक्ला की विशेषता यह है कि वे ज़मीन से जुड़े हुए व्यक्ति हैं और उनके भीतर अपनत्व की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। यही कारण है कि जब वे कृषि मजदूरों से बात करते हैं तो एक अलग आत्मीयता दिखाई देती है। अरविंद भी इस विश्वास को बनाए रखते हुए रिपोर्टिंग के समय विशेष ध्यान रखते हैं कि उन्हें किसी प्रकार की हानि न पहुंचे।
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प्रसन्नता की बात यह है कि अरविंद शुक्ला के यूट्यूब चैनल ‘न्यूज़ पोटली’ (जो अपने 4 वर्ष पूरे कर चुका है) पर इस समय 2.88 लाख सदस्य हो चुके हैं और लगभग 2000 वीडियो स्टोरीज़ इस पर डाली जा चुकी हैं, जिन पर 8.5 करोड़ दर्शक प्राप्त हुए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि अरविंद शुक्ला और उनके परिवार द्वारा दिए गए त्याग का फल मिलना शुरू हो गया है। अरविंद अब देश के लगभग 15 राज्यों में पूरे उत्साह के साथ फील्ड रिपोर्टिंग कर रहे हैं। उनकी एक टीम भी तैयार हो चुकी है जिसमें लगभग एक दर्जन लोग शामिल हैं। अरविंद शुक्ला स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं, क्यूंकि टीम के जो भी सदस्य उनके साथ जुड़े, वे अपने हिस्से का कार्य अत्यंत जिम्मेदारी और परिश्रम के साथ करते हैं। यही कारण है कि ‘न्यूज़ पोटली’ की गिनती भारत के विश्वसनीय मीडिया संस्थानों में होने लगी है। उनका कहना है कि “पत्रकारिता एक जिम्मेदारी है, उन लोगों की आवाज बनने की जो अपनी बात स्वयं नहीं कह सकते।” निस्संदेह यहां अरविंद शुक्ला किसानों की बात कर रहे हैं। वे किसान जो सबका पेट भरते हैं, लेकिन कई अवसरों पर स्वयं भूखे सोने के लिए विवश हो जाते हैं।
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