राजनीति

बीजेपी ने बृजभूषण सिंह को प्रदेश कार्यकारिणी में दी जगह, महिला पहलवानों के आरोपों के बीच फैसले पर उठे सवाल

महिला पहलवानों के आंदोलन का ही असर था कि बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बृजभूषण सिंह को कैसरगंज से टिकट नहीं दिया था। अब प्रदेश कार्यकारिणी में उनकी वापसी को बीजेपी की संगठनात्मक राजनीति में उनके प्रभाव की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जा रहा है।

बीजेपी ने बृजभूषण सिंह को प्रदेश कार्यकारिणी में दी जगह, महिला पहलवानों के आरोपों के बीच फैसले पर उठे सवाल
बीजेपी ने बृजभूषण सिंह को प्रदेश कार्यकारिणी में दी जगह, महिला पहलवानों के आरोपों के बीच फैसले पर उठे सवाल फोटोः सोशल मीडिया

बीजेपी ने बृजभूषण शरण सिंह को प्रदेश कार्यकारिणी में शामिल कर खड़ा किया विवाद

बीजेपी के इस फैसले ने एक बार फिर महिला सम्मान के दावों पर सवाल खड़े कर दिए

महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न मामले में उनके बरी होने के फैसले को दी है चुनौती

बीजेपी ने पूर्व सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को उत्तर प्रदेश बीजेपी की प्रदेश कार्यकारिणी में शामिल किया है। बीजेपी का यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है, जब महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़े मामले में कानूनी विवाद अभी खत्म भी नहीं हुआ है। चार महिला पहलवानों ने अदालत से उनके बरी होने के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है। बीजेपी के इस फैसले ने एक बार फिर महिला पहलवानों के आंदोलन, महिला सुरक्षा और बीजेपी के महिला सम्मान के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, बीजेपी के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने 26 अक्टूबर को नई प्रदेश कार्यकारिणी गठित की। बृजभूषण सिंह को पहली बार प्रदेश की इस शीर्ष संगठनात्मक समिति में जगह मिली है। पार्टी की 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच यह नियुक्ति हुई है। 30 और 31 अक्टूबर को लखनऊ में होने वाली प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी भी प्रस्तावित है।

बरी होने के फैसले को चुनौती, 20 नवंबर को सुनवाई

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न के आरोपों में बृजभूषण शरण सिंह को अदालत से बरी किए जाने के बावजूद मामला पूरी तरह कानूनी रूप से खत्म नहीं हुआ है। करीब तीन महीने पहले अगस्त 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने छह महिला पहलवानों की शिकायत से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में बृजभूषण सिंह और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर को बरी कर दिया था।

इसके बाद, आरोप लगाने वाली चार महिला पहलवानों ने 25 सितंबर को इस फैसले के खिलाफ आपराधिक अपील दायर की। पहलवानों ने निचली अदालत के फैसले को कानूनी रूप से गलत बताते हुए आरोप लगाया कि साक्ष्यों का चयनात्मक और त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन किया गया है। अपील में यह भी सवाल उठाया गया है कि यौन उत्पीड़न के पीड़ितों के व्यवहार को लेकर पुराने और रूढ़िवादी नजरिये से निष्कर्ष निकाले गए।

28 अक्टूबर को विशेष न्यायाधीश दिग विनय सिंह की अदालत ने बृजभूषण सिंह को अपना जवाब दाखिल करने के लिए अंतिम अवसर देते हुए एक सप्ताह का समय दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इसके बाद और समय नहीं दिया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 20 नवंबर को तय है। लेकिन इसी बीच बीजेपी ने उन्हें अपनी प्रदेश कार्यकारिणी में शामिल करने का ऐलान कर सबको चौंका दिया है।

भाकपा माले ने बीजेपी के फैसले की निंदा की

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) ने बृजभूषण सिंह को बीजेपी की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बनाए जाने की कड़ी निंदा की है। पार्टी ने इसे महिला पहलवानों के लंबे संघर्ष का अपमान बताते हुए कहा है कि बीजेपी ने एक ऐसा राजनीतिक संदेश दिया है, जिससे यौन उत्पीड़न के आरोपों के खिलाफ न्याय की लड़ाई लड़ रही महिलाओं का मनोबल कमजोर हो सकता है।

भाकपा (माले) के राज्य सचिव सुधाकर यादव ने कहा कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के लखनऊ दौरे और 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच बीजेपी का यह फैसला उसकी राजनीतिक प्राथमिकताओं को उजागर करता है। पार्टी के मुताबिक, महिला पहलवानों के न्याय की लड़ाई अभी अदालत में जारी है, ऐसे में बृजभूषण सिंह को संगठन में महत्वपूर्ण जगह देना उनके संघर्ष के प्रति असंवेदनशीलता है।

महिला पहलवानों का आंदोलन और बीजेपी का रवैया

बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों का आंदोलन 2023 में देशव्यापी चर्चा का विषय बना था। जनवरी 2023 में विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया समेत कई पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोला था। अप्रैल में दिल्ली के जंतर-मंतर पर दोबारा धरना शुरू हुआ। पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोपों की निष्पक्ष जांच, बृजभूषण सिंह को पद से हटाने और कार्रवाई की मांग की थी।

इस आंदोलन ने सिर्फ कुश्ती महासंघ की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि खेल संस्थाओं में महिलाओं की सुरक्षा, सत्ता के दुरुपयोग और शिकायत करने वाली महिला खिलाड़ियों के सामने मौजूद संस्थागत चुनौतियों को भी राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया। ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का नाम रोशन करने वाली महिला खिलाड़ियों को जब न्याय के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा, तब सरकार और खेल प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे।

महिला पहलवानों के आंदोलन का ही असर था कि बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बृजभूषण सिंह को कैसरगंज से टिकट नहीं दिया था। उनकी जगह उनके बेटे करण भूषण सिंह को उम्मीदवार बनाया था। हालांकि, वह चुनाव जीत गए थे। अब प्रदेश कार्यकारिणी में बृजभूषण की वापसी को बीजेपी की संगठनात्मक राजनीति में उनके प्रभाव की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जा रहा है।

छह बार के सांसद बृजभूषण और पूर्वांचल की राजनीति

बृजभूषण शरण सिंह का राजनीतिक प्रभाव केवल एक लोकसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं माना जाता। वह छह बार सांसद रह चुके हैं। गोंडा, बलरामपुर और कैसरगंज उनके राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्र माने जाते हैं। बीजेपी के अलावा समाजवादी पार्टी के टिकट पर भी वह चुनाव जीत चुके हैं। गोंडा और आसपास के जिलों में उनका राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव रहा है। इसी राजनीतिक हैसियत के कारण प्रदेश कार्यकारिणी में उनकी नियुक्ति को महज एक संगठनात्मक बदलाव मानना मुश्किल है। बीजेपी के लिए वह पूर्वांचल के एक प्रभावशाली राजनीतिक चेहरे हैं, जिनका क्षेत्रीय समीकरणों और समर्थक वर्ग पर असर माना जाता है।

MLC चुनाव में बीजेपी को झटके का असर तो नहीं

भाकपा (माले) ने बृजभूषण सिंह की नियुक्ति को बीजेपी की राजनीतिक बेचैनी से जोड़ते हुए हालिया एमएलसी चुनावों का भी हवाला दिया है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में बीजेपी ने छह और समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीतीं। बीजेपी ने कुल छह सीटें जीतकर अपना पिछला आंकड़ा बरकरार रखा, लेकिन समाजवादी पार्टी ने अपनी सीटें तीन से बढ़ाकर पांच कर लीं। खास बात यह रही कि वाराणसी की दोनों सीटों पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा और लखनऊ की स्नातक सीट भी समाजवादी पार्टी के खाते में गई। वहीं योगी का गढ़ गोरखपुर भी बीजेपी मुश्किल से बचा पाई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बीजेपी को मिली इन हारों को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के लिए क्षेत्रीय प्रभावशाली नेताओं को संगठन में सक्रिय करना उसकी चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

बीजेपी के महिला सम्मान के दावों पर फिर सवाल

सुधाकर यादव ने बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा कि महिलाओं के उत्पीड़न के आरोपों से घिरे प्रभावशाली लोगों के प्रति पार्टी का रवैया उसके महिला सम्मान संबंधी दावों के विपरीत है। उन्होंने कठुआ सामूहिक बलात्कार मामले के आरोपियों के समर्थन में निकाली गई रैली, बिलकिस बानो मामले के दोषियों की रिहाई और उनके सार्वजनिक अभिनंदन, उन्नाव के कुलदीप सिंह सेंगर प्रकरण और हाथरस की घटना का उल्लेख किया।

बृजभूषण सिंह को प्रदेश कार्यकारिणी में जगह देने पर बीजेपी का अपना राजनीतिक तर्क हो सकता है। अदालत से बरी होने के बाद किसी नागरिक को राजनीतिक या संगठनात्मक पद देने पर कोई कानूनी रोक भी नहीं है। लेकिन चार महिला पहलवानों की अपील लंबित होने के बीच इस नियुक्ति का राजनीतिक और सामाजिक संदेश जरूर बहस का विषय है। सवाल केवल एक नेता को संगठन में जगह देने का नहीं है, बल्कि उस भरोसे का भी है जिसे महिला पहलवानों ने न्यायिक प्रक्रिया पर बनाए रखा है। क्या राजनीतिक दलों के लिए महिलाओं का सम्मान सिर्फ चुनावी मंचों तक सीमित है, या महिला खिलाड़ियों के संघर्ष और उनकी शिकायतों को भी उतनी ही गंभीरता दी जाएगी?