
भारत के 21 न्यूज पब्लिशर के एक समूह ने मोदी सरकार द्वारा लाए जा रहे डिजिटल गोपनीयता कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इस समूह का कहना है कि यह कानून खोजी पत्रकारिता (इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म) को कमजोर कर सकता है और पत्रकारों के सूत्रों को सरकारी जांच के दायरे में ला सकता है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक इस समूह में अरबपति मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाला नेटवर्क 18 ग्रुप और गौतम अडानी के स्वामित्व वाली मीडिया कंपनी एनडीटीवी भी शामिल हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने इस कानून को चुनौती देने वाला मुकदमा 6 अक्टूबर को दायर किया है। और, रॉयटर्स द्वारा देखे गए दस्तावेजों के मुताबिक इसकी अगली सुनवाई कल मंगलवार को होनी है। पब्लिशर्स इस कानून के ज्यादातर विवादित प्रावधानों को रद्द करवाना चाहते हैं। यह कानून अगले साल मई (2-27) से लागू होने वाला है।
बता दें कि मोदी सरकार द्वारा कथित तौर पर उपयोगकर्ताओं के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए लाए गए 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन' कानून (डीपीडीपी एक्ट) के तहत डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को कुछ नियमों का पालन करना होगा। पब्लिशर्स का तर्क है कि समाचार संगठनों के लिए कोई विशेष छूट न होने की स्थिति में, पत्रकारों को उन लोगों से सहमति लेनी पड़ सकती है जिनकी वे जांच कर रहे हैं या उनके बारे में खोजी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं। पब्लिशर्स के मुताबिक इस कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल ऐसे व्यक्ति, संस्था या कोई अन्य प्रकाशित रिपोर्टों को हटाने की मांग भी कर सकते हैं।
डीएनपीए ने मुकदमे में जो अर्जी दायर की है उसके मुताबिक डीपीडीपी एक्ट के प्रावधान किसी व्यक्ति या संस्था के बारे में खोजी रिपोर्ट तैयार करने से पहले उसकी अनुमति लेने की बात करते हैं, जबकि ऐसा होने की स्थिति में वह व्यक्ति या संस्था सबूतों को नष्ट कर सकती है या खोजी पत्रकार या गवाहों आदि पर दबाव डाल सकती है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक पब्लिशर समूह का यह भी तर्क है कि लोगों को अपनी सहमति वापस लेने और डेटा मिटाने की मांग करने की अनुमति देने वाले प्रावधान, पब्लिशर्स को तथ्यात्मक रिपोर्ट हटाने या उनमें काफी हद तक काट-छांट करने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
मुकदमे की अर्जी में पब्लिशर्स ने व्यक्तिगत डेटा हैंडल करने वाली संस्थाओं से जानकारी मांगने की सरकारी शक्तियों को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि इन प्रावधानों की वजह से पत्रकारों और उनके सूत्रों के बीच की गोपनीय बातचीत उजागर हो सकती है, व्हिसलब्लोअर्स (भांडाफोड़ करने वालों) को पीछे हटने के लिए कहा जा सकता है, और भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट गड़बड़ियों और चुनावी धांधली से जुड़ी रिपोर्टिंग प्रभावित हो सकती है।
डीएनपीए ने कहा कि सरकार ने अगस्त में हुई एक बैठक में मीडिया कंपनियों को भरोसा दिलाया था कि प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा की जाएगी। इस समूह का यह भी तर्क है कि जिन प्रावधानों के तहत लोग अपनी सहमति वापस ले सकते हैं और अपना डेटा मिटाने की मांग कर सकते हैं, उसके चलते पब्लिशर्स को तथ्यात्मक रिपोर्टें हटानी पड़ सकती हैं या उनमें काफी बदलाव करना पड़ सकता है।
न्यूज पब्लिशर्स की एक चिंता ये भी है कि कानून में सरकार को जानकारी मांगने की जो शक्तियां मिली हैं, उससे पत्रकारों के सूत्रों की पहचान उजागर हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट में इन सब आपत्तियों को लेकर 698 पन्नों की याचिका डाली गई है। कहा गया है कि ये कानून इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म को कमजोर कर देगा। पत्रकारों का काम सिर्फ घटनाओं को दर्ज करने तक रह जाएगा। इस कानूनों के प्रावधानों की वजह से खबरों को छपने से पहले ही रोकने का काम कर सकते हैं, जो लोकतंत्र के लिए मंजूर नहीं होना चाहिए।
पब्लिशर्स एसोसिएशन ने तर्क दिया है कि पत्रकारों के लिए लिखित छूट का न होना चिंता का विषय है। उन्होंने यूरोपीय संघ, सिंगापुर और ब्रिटेन जैसे क्षेत्रों में प्रेस को मिलने वाले संरक्षण का हवाला दिया है। इस एसोसिएशन के सदस्यों में अंबानी के स्वामित्व वाला नेटवर्क18, अडानी के स्वामित्व वाला एनडीटीवी, द इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह का हिस्सा, टाइम्स इंटरनेट शामिल हैं।
पब्लिशर्स की तरफ से यह चुनौती प्रमुख मीडिया कंपनियों द्वारा गोपनीयता कानून की एक महत्वपूर्ण कानूनी परीक्षा का मौका है। रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इससे पहले बोलने की आजादी की मांग करने वाले एक्टिविस्ट और छोटे समाचार संगठन इस मुद्दे को उठाते रहे हैं।
मोदी सरकार ने 2025 में लोगों के डिजिटल प्राइवेट डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के नाम पर प्राइवेसी कानून लागू करने का ऐलान किया था। बताया गया कि यह भारत का पहला डेटा प्रोटेक्शन कानून है, जिसके तहत किसी भी कंपनी या संगठन को अगर आपका डेटा चाहिए तो इसके लिए आपकी सहमति लेनी होगी। ये भी साफ-साफ बताना होगा कि डेटा क्यों चाहिए।
गौरतलब है कि यह मुकदमा ऐसे समय में सामने आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति की आलोचना हो रही है। मोदी 2014 में सत्ता में आए थे। 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' के 'वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स' में इस साल 180 देशों में भारत 157वें स्थान पर है, जबकि 2014 में यह 140वें स्थान पर था। सरकार इन रैंकिंग को खारिज करती रही है और उसका कहना है कि देश में एक जीवंत मीडिया इकोसिस्टम है और यहां प्रेस की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है।
रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस मुकदमे की जानकारी मिलने के बाद उसने पब्लिशर्स एसोसिएशन और मीडिया समूहों से टिप्पणी करने का अनुरोध किया था, लेकिन उसे अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। साथ ही भारत के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने भी इस बाबत कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
रॉयटर्स की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, ये जानकारी पहली बार सामने आई है। न्यूज पब्लिशर्स की याचिका मोदी सरकार के प्राइवेसी कानून के रास्ते की अब तक की सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकती है, क्योंकि अभी तक सिर्फ छोटे पब्लिशर्स और छोटे न्यूज संस्थानों के लोग इस कानून को चुनौती दे रहे थे। अब इस लिस्ट में अंबानी और अडानी जैसे बड़े नामों की कंपनियां भी जुड़ गई हैं।
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