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बिहारः शराबबंदी के ‘दुष्प्रभाव’ वाली रिपोर्ट पर भड़की जेडीयू, दावा करने वालों से वित्तीय हितों का हिसाब मांगा

जेडीयू ने कहा कि यदि किसी संस्था के सदस्यों के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे वित्तीय संस्थानों से संबंध हैं, जो शराब कारोबार से जुड़ी कंपनियों को बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं, तो उनके द्वारा शराबबंदी पर सर्वेक्षण की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे।

बिहारः शराबबंदी के ‘दुष्प्रभाव’ वाली रिपोर्ट पर भड़की जेडीयू, दावा करने वालों से वित्तीय हितों का हिसाब मांगा
बिहारः शराबबंदी के ‘दुष्प्रभाव’ वाली रिपोर्ट पर भड़की जेडीयू, दावा करने वालों से वित्तीय हितों का हिसाब मांगा फाइल फोटो

बिहार में शराबबंदी के कथित दुष्प्रभावों को लेकर जारी एक रिपोर्ट को लेकर सत्तारूढ़ बीजेपी और जेडीयू के बीच विवाद सामने आ गया है। रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए जेडीयू ने गुरुवार को कहा कि शराबबंदी की आलोचना करने वालों को पहले शराब कारोबार से जुड़े अपने वित्तीय हितों का हिसाब देना चाहिए।

जेडीयू के विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार और प्रदेश प्रवक्ता पूजा पैट्रिक ने संवाददाता सम्मेलन में आरोप लगाया कि शराबबंदी के कथित दुष्प्रभावों को लेकर सर्वेक्षण कराने वाली संस्था से जुड़े कुछ लोगों के शराब कारोबार से जुड़े वित्तीय हित हो सकते हैं, ऐसे में अध्ययन की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सर्वेक्षण की निष्पक्षता पर सवाल

जेडीयू नेताओं ने कहा कि यदि किसी संस्था के पदाधिकारियों या सदस्यों के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे वित्तीय संस्थानों से संबंध हैं, जो शराब कारोबार से जुड़ी कंपनियों को बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं, तो उनके द्वारा बिहार की शराबबंदी पर किए गए सर्वेक्षण की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे।

जेडीयू नेताओं ने दावा किया कि शराबबंदी कानून के कथित दुष्प्रभावों का अध्ययन करने वाली संस्था ‘राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद’ (एनसीएईआर) की शासी परिषद में एचडीएफसी बैंक के चेयरपर्सन दीपक एस. पारीख शामिल हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि सिगरेट बनाने वाली कंपनी आईटीसी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक संजीव पुरी संस्था के बोर्ड के सदस्य हैं।

शराबबंदी कोई कॉरपोरेट नीति नहीं, सामाजिक नीति

जेडीयू नेताओं ने एनसीएईआर से अध्ययन में शामिल जिलों और स्थानों की जानकारी सार्वजनिक करने तथा शोध की पद्धति और नमूने के आकार से संबंधित विस्तृत जानकारी जारी करने की मांग की। उन्होंने कहा कि शराबबंदी पर सवाल उठाने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि सर्वेक्षण में कितने जिलों को शामिल किया गया और अध्ययन किस पद्धति से किया गया। उन्होंने कहा कि शराबबंदी कोई कॉरपोरेट नीति नहीं, बल्कि महिलाओं की मांग और व्यापक जनसमर्थन से बनी सामाजिक नीति है।

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बीजेपी और जेडीयू में विवाद बढ़ने का संकेत

बता दें कि पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2016 में बिहार में शराबबंदी लागू की थी। इसका उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा, परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार और सामाजिक उत्थान था। हालांकि, एनडीए में जेडीयू की सहयोगी बीजेपी शुरू से शराबबंदी को लेकर असहज रही है। ऐसे में अब जब बिहार की कमान सीधे बीजेपी के हाथों में आ गई है, तो एक बार फिर शराबबंदी के नुकसान को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इसे बीजेपी और जेडीयू में विवाद बढ़ने का संकेत माना जा रहा है।

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