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गाजियाबाद में फिल्मी ड्रामा: जिस शख्स की तेरहवीं का चल रहा था भोज, वो खुद चलकर घर पहुंचा, लोगों के उड़े होश

गिरधर सिंह बिष्ट की तेरहवीं का भोज चल रहा था, तभी मृतक गिरधर खुद सही-सलामत घर लौट आया। उसे जिंदा देखकर वहां मौजूद परिजनों और मेहमानों के पैरों तले जमीन खिसक गई।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

गाजियाबाद के वैशाली में एक ऐसी फिल्मी घटना समाने आई है, जिसने पुलिस प्रशासन और खुद पीड़ित परिवार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। कल्पना अपार्टमेंट में गिरधर सिंह बिष्ट की तेरहवीं का भोज चल रहा था, तभी मृतक गिरधर खुद सही-सलामत घर लौट आया। उसे जिंदा देखकर वहां मौजूद परिजनों और मेहमानों के पैरों तले जमीन खिसक गई।

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वैशाली के स्थानीय दुकानदारों से गिरधर सिंह बिष्ट का किसी बात पर झगड़ा हो गया था। कौशाम्बी थाना पुलिस ने मामले को शांत कराने के बजाय गिरधर को धारा 151 यानी शांति भंग के तहत डासना जेल भेज दिया। 21 मई को गिरधर जेल से रिहा तो हुआ, लेकिन वह अपने घर नहीं लौटा। परिवार वाले उसकी तलाश में भटकते रहे, पर उसका कोई सुराग नहीं मिला।

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इसी बीच, 13 जून को मसूरी थाना क्षेत्र में पुलिस को एक अज्ञात शख्स का शव मिला। पुलिस ने शिनाख्त के लिए गिरधर के परिवार को बुलाया। हैरानी की बात यह है कि परिवार ने बिना किसी हिचकिचाहट के उस अज्ञात शव को गिरधर का शव बता दिया। मसूरी पुलिस ने भी बिना कोई डीएनए टेस्ट कराए या वैज्ञानिक जांच किए, सिर्फ परिवार के कहने पर पंचनामा भरा, पोस्टमार्टम कराया और शव उन्हें सौंप दिया। परिवार ने आनन-फानन में उस शव का अंतिम संस्कार भी कर दिया।

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शव का अंतिम संस्कार करने के ठीक अगले दिन गिरधर के परिजनों ने कौशाम्बी थाने पर जमकर बवाल काटा। उन्होंने स्थानीय दुकानदारों पर गिरधर की हत्या का आरोप लगाया और दबाव बनाकर मसूरी थाने में मर्डर का मुकदमा भी दर्ज करा दिया। अब जब गिरधर खुद जिंदा लौट आया है, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या कोई परिवार अपने सगे सदस्य की लाश पहचानने में इतनी बड़ी चूक कर सकता है? या फिर यह विरोधी दुकानदारों को जेल भिजवाने और पुलिस पर दबाव बनाने की कोई सोची-समझी साजिश थी?

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