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बंगाल में पहले दौर का मतदान कल: कड़ी सुरक्षा के बीच राजनीतिक भाषा और लुभावने वादों का मुकाबला

बंगाल में पहले दौर का मतदान सिर्फ़ इस बारे में नहीं है कि कौन आगे रहता है, बल्कि इस बारे में है कि कौन सी राजनीतिक भाषा वोटरों को ज़्यादा भरोसेमंद लगती है। पहले दौर में 152 सीटों पर मतदान होना है जिसमें करीब 3.60 करोड़ वोटर मतदान के योग्य पाए गए हैं।

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Getty Images Hindustan Times

23 अप्रैल को होने वाले पश्चिम बंगाल चुनाव का पहला चरण अब एक बेहद अहम मुकाबले में बदल गया है। इस चरण में धुआंधार प्रचार, चुनावी वादों, पहचान की राजनीति और कड़ी सुरक्षा-व्यवस्था के अभूतपूर्व इंतजाम नजर आए हैं। इस दौर में  मुख्य लड़ाई सिर्फ़ विधानसभा सीटों के लिए नहीं, बल्कि अलग-अलग नैरेटिव के बीच है, जिसमें मतदाता यह तय करेंगे कि वे ममता बनर्जी के लोक-कल्याण मॉडल को जारी रखना चाहते हैं, या फिर बीजेपी की अगुवाई वाले उस बदलाव को चुनना चाहते हैं, जिसे प्रशासनिक सुधार, समान नागरिक संहिता (यूसीसी), घुसपैठ-विरोधी ऐलान और रोज़गार सृजन के वादों से सजाया गया है।

पहले चरण के मतदान के लिए चुनाव प्रचार यूं तो कल  (21 अप्रैल) को समाप्त हो गया, लेकिन मतदान से पहले का माहौल तनावपूर्ण, भावुक और राजनीतिक रूप से गरमाया हुआ है। रिपोर्टों में चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस चरण में 152 सीटों पर  मतदान होगा, जिसमें उत्तरी बंगाल और कई दक्षिणी जिले शामिल हैं, जहां लगभग 3.60 करोड़ मतदाता मतदान करने योग्य पाए गए हैं।

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इस बार के बंगाल चुनाव में खान-पान की आदतों पर टिप्पणियों से लेकर सीमा पार से घुसपैठ तक और समान नागरिक संहिता से लेकर संशोधित मतदाता सूचियों तक पर हुई बहसों ने इस मुकाबले को और भी तीखा बना दिया है। इस सबके चलते पहले दौर का मतदान कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

इस बार के चुनाव प्रचार में यह भी देखने को मिला कि दोनों ही खेमों ने किस तरह इस चुनाव को बंगाल के भविष्य से जुड़े एक बड़े फ़ैसले के तौर पर पेश करने की कोशिश की। नरेंद्र मोदी और अमित शाह समेत बीजेपी के नेताओं ने सत्ताधारी पार्टी पर भ्रष्टाचार, हिंसा और घुसपैठ के मुद्दों को लेकर तीखा हमला बोला तो सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने अपने जन-कल्याणकारी कार्यों को सामने रखकर बीजेपी पर पर लोगों में डर फैलाने और वोटर लिस्ट में हेर-फेर करने का आरोप लगाया है। सीधे शब्दों में कहें तो, इस चरण को इस बात की पहली असली परीक्षा माना जा रहा है कि क्या सत्ता-विरोधी लहर इतनी गहरी हो चुकी है कि वह बरसों से जमी सत्ताधारी पार्टी की नींव हिला सके।

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बीजेपी का मुख्य चुनावी मुद्दा शासन में बदलाव, सीमा सुरक्षा और बड़े वादों पर केंद्रित रहा है। अमित शाह ने ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कई जनसभाओं कहा कि, "राज्य की बागडोर उनके हाथों में रहने का समय अब ​​खत्म हो गया है।" उन्होंने यहां तक कहा कि, "कोई भी हमारे वोटरों को धमका नहीं सकता। चुनाव आयोग ने केंद्रीय बलों को काफ़ी संख्या में तैनात किया है, जो राज्य के हर कोने-कोने में फैले हुए हैं।"

बता दें कि बीजेपी के घोषणापत्र में, (जिसे अमित शाह ने इस महीने की शुरुआत में जारी किया था), महिलाओं के लिए हर महीने ₹3,000 की आर्थिक मदद, छह महीने के भीतर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने, राज्य कर्मचारियों के लिए बकाया डीएं, 7वें वेतन आयोग के लाभ, आयुष्मान भारत योजना को लागू करने और राजनीतिक हिंसा की जांच कराने का वादा किया गया है।

वहीं तृणमूल कांग्रेस ने अपने कल्याणकारी मॉडल का बचाव करते हुए बीजेपी के वादों को विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। पार्टी नेता अभिषेक बनर्जी का कहना है कि बीजेपी का इतिहास "झूठे वादों" का रहा है। वे जनसभाओं में मतदाताओं को उन अधूरे राष्ट्रीय वादों की याद दिलाते हैं, जैसे "हर बैंक खाते में 15 लाख रुपये और हर साल दो करोड़ नौकरियां आदि"। ममता बनर्जी का भी दावा है कि बीजेपी बंगाल में नहीं जीत सकती। उन्होंने दावा किया है कि, "तृणमूल कांग्रेस फिर से सरकार बनाएगी। हम 2026 में ही बीजेपी को दिल्ली से भी बाहर निकाल देंगे।" उन्होंने नरेंद्र मोदी के इस दावे पर भी पलटवार किया कि वे खुद ही सभी 294 सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवार हैं, और कहा, "ऐसा होने के लिए आपको सबसे पहले प्रधानमंत्री का पद छोड़ना होगा।"

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इस बार चुनाव में सबसे ज़्यादा नज़र नंदीग्राम पर है, जहां बीजेपी के सुवेंदु अधिकारी तृणमूल के पवित्र कर के ख़िलाफ़ मैदान में हैं। पवित्र कर हाल ही में तृणमूल में शामिल हुए हैं। इसके अलावा नंदीग्राम सिर्फ़ अपनी प्रतीकात्मक अहमियत की वजह से ही मायने नहीं रखता, बल्कि इसलिए भी अहम है क्योंकि यह वह सीट थी जिसने ममता बनर्जी और अधिकारी के बीच पिछली बड़ी टक्कर को तय करने में अहम भूमिका निभाई थी। इस सीट के इसी इतिहास की वजह से वहां दिए गए हर बयान का वज़न और भी बढ़ जाता है।

 सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग, कूच बिहार, जलपाईगुड़ी, रायगंज, इस्लामपुर, बालुरघाट, इंग्लिश बाज़ार, जंगीपुर और मेखलीगंज आदि इलाकों में भी पहले चरण में ध्यान खींचने वाली अन्य सीटों में शामिल हैं। इन क्षेत्रों में अलग-अलग तरह के राजनीतिक मुद्दे हैं: उत्तरी बंगाल में सीमा संबंधी चिंताओं, चाय बागानों से जुड़े मुद्दों और पहचान की राजनीति का मिला-जुला असर है, जबकि दक्षिणी बंगाल के कुछ हिस्से स्थानीय नेतृत्व, धार्मिक विभाजन और ग्रामीण कल्याण की उम्मीदों से प्रभावित हैं। बहरामपुर भी खास तौर पर चर्चा में है, क्योंकि कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी दो दशकों से भी ज़्यादा समय के बाद विधानसभा की राजनीति में वापसी कर रहे हैं।

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खड़गपुर सदर एक और ऐसी सीट है जिस पर नज़र रखी जा रही है, क्योंकि यहां बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष मैदान में हैं। यह सीट इसी कारण बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई है। मुर्शिदाबाद में, तृणमूल से निलंबित विधायक हुमायूँ कबीर चुनावी समर में हैं, जिन्होंने बाबरी मस्जिद जैसी एक मस्जिद बनाने के अपने विवादित वादे से सबका ध्यान खींचा था। ये सीटें इसलिए भी मायने रखती हैं, क्योंकि इनसे यह पता चलता है कि चुनाव का नतीजा विचारधारा, स्थानीय साख या फिर जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन—इनमें से किस आधार पर तय हो रहा है।

पहले दौर के मतदान के लिए सुरक्षा व्यवस्था इस बार काफ़ी कड़ी रखी गई है। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की लगभग 2,450 कंपनियां—यानी करीब 2.5 लाख जवान—तैनात की गई हैं, और पहले चरण के लिए 8,000 से ज़्यादा मतदान केंद्रों को 'अति संवेदनशील' के तौर पर चिह्नित किया गया है। आयोग ने मतदाताओं के सत्यापन के लिए दो-चरण वाली प्रणाली भी लागू की है: इनमें प्रवेश द्वार पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवान मूल पहचान पत्रों की जांच करेंगे, और उसके बाद मतदाता सहायता बूथ पर मौजूद बीएलओ, प्रवेश की अनुमति देने से पहले मतदाता की पहचान और संबंधित क्षेत्र में मतदान की पात्रता की पुष्टि करेंगे। इसके अलावा, आयोग ने मतदान केंद्रों के 100 मीटर के दायरे में बीएनएसएस की धारा 163 (निषेधाज्ञा) को भी लागू किया है, जिसके तहत मतदान बूथों के पास लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी गई है और भीड़ की आवाजाही को भी सीमित कर दिया गया है।

बंगाल चुनाव का पहला दौर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें प्रतीकात्मकता, भूगोल और कठोर राजनीति का मेल है। पहले दौर के निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं का मिजाज उनकी मजदूरी या दैनिक कमाई, ज़मीन, बुनियादी ढांचा और बेरोज़गारी जैसी व्यावहारिक चिंताओं से भी प्रभावित होगा। इन मुद्दों का असर खासकर उत्तरी बंगाल और सीमावर्ती ज़िलों में अधिक दिखेने की संभावना है।

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