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जी-20 देशों को आइना दिखाता एम-20 सम्मेलन: संपादकों ने जी-20 देशों में घटती प्रेस स्वतंत्रता पर जताई चिंता

जी-20 शिखर सम्मेलन से पहले करीब 200 जी-20 बैठकें हुई थीं, जिनमें ऊर्जा, पर्यटन, शहरी योजना और वित्तीय समावेश से लेकर महिला सशक्तीकरण तक पर चर्चा हुई। लेकिन किसी भी बैठक में प्रेस की स्वतंत्रता पर कोई विमर्श नहीं हुआ।

M-20 बैठक का स्क्रीनशॉट
M-20 बैठक का स्क्रीनशॉट 

प्रेस की स्वतंत्रता और मीडिया की स्थिति स्पष्ट रूप से जी-20 शिखर सम्मेलन के लिए प्राथमिकता नहीं है। शिखर सम्मेलन के किसी भी सत्र में या शिखर सम्मेलन से पहले हुई बैठकों या मंत्रिस्तरीय बैठकों में से किसी का भी विषय प्रेस स्वतंत्रता था ही नहीं। जबकि जलवायु परिवर्तन से लेकर शहरों के सतत विकास तक के विषयों पर पांच सितारा रिसॉर्ट्स और होटलों के आरामदायक मौल में विस्तार से चर्चा की गई।

इसलिए, जी-20 देशों से आए प्रमुख संपादक और पत्रकार और अन्य लोग इस सप्ताह यूरोप, अफ्रीका और भारत और म्यांमार जैसे देशों में मीडिया के सामने आने वाली चुनौतियों पर एक ऑनलाइन चर्चा के लिए एक साथ जुड़े। इस आयोजन को एम-20 यानी मीडिया-20 ऑनलाइन शिखर सम्मेलन का नाम दिया गया।

इसका आयोजन भारतीय मीडिया के उस संगठन ने किया था जो देश में लगातार कम होती प्रेस स्वतंत्रता को लेकर चिंतित है। इस एम-20 सम्मेलन में तमाम वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों के साथ ही प्रमुख रूप से फाइनेंशियल टाइम्स के जेम्स लेमॉन्ट, फ्रांस की मीडियापार्ट के एडवी प्लेनेल, यूके की द प्रॉस्पेक्ट पत्रिका के एलन रुसब्रिजर के अलावा भारत में द हिंदू अखबार के डायरेक्टर एन राम ने हिस्सा लिया।

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सम्मेलन का परिचय देते हुए द वायर के सिद्धार्थ वर्दराजन रेखांकित किया कि “वे (जी-20 देश) किसी भी समस्या का समाधान नहीं निकाल सकते, अगर उनके देश में मीडिया स्वतंत्र नहीं है।“

गौरतलब है कि 2023 के रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 161वें पायदान पर है, जोकि अफगानिस्तान से भी बदतर स्थिति है। इस साल भारत इस रैंकिंग में 11 अंक नीचे गिरा है। लेकिन जी-20 देशों में भारत सबसे खराब हालत में नहीं है। तुर्की की रैंकिंग 165 है जोकि सऊदी अरब (170) और चीन (179) के बाद सबसे बुरी स्थिति में है। रूस भी तुर्की से सिर्फ एक पायदान ही ऊपर है। यहां तक कि अमेरिका भी 45वें नंबर पर है जोकि जर्मनी, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूके के बाद है।

भारत औ म्यांमार जैसे देशों में पत्रकार और मीडिया के सामने अस्तित्व का संकट है और सरकार की तरफ से लगातार उन पर हमले हो रहे हैं, दूसरे जी-20 देशों में भी मीडिया के सामने चुनौतियां हैं। एम-20 सम्मेलन में सामने रखा गया किमीडिया को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है उनमें बौद्धिक संपत्ति का कॉपीराइट और डिजिटल प्लेटफार्म्स पर पोस्ट की जा रही सामग्री, ऑनलाइन माध्यमों से भ्रामक सूचनाओं का प्रसार, तानाशाहीपूर्ण राजनीति, साईबर अटैक (जोकि आम तौर पर सरकार द्वारा प्रायोजित होते हैं) और छोटे मीडिया संस्थानों को दबाकर असहमति और विविधता को कुचलने के प्रयास आदि शामिल हैं।

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भारत में मीडिया की स्थिति पर बात रखते हुए एन राम ने हाल ही में मणिपुर सरकार द्वारा वहां हो रही हिंसा के बारे में रिपोर्ट छापने पर एडिटर्स गिल्ड सदस्यों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का मुद्दा सामने रखा। साथ ही जम्मू-कश्मीर में पत्रकारों की गिरफ्तारी, स्वतंत्र न्यूज चैनल एनडीटीवी का अधिग्रहण र ऑनलाइन पोर्टल कश्मीरवाला को बंद करने जैसे मामलों को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भले ही भारत में स्थिति गंभीर नहीं हुई हो, लेकिन मुश्किल जरूर हो गई है।

राम ने दोहराया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और डिजिटल मीडिया दिशानिर्देशों में संशोधन से सरकार को अपनी इच्छानुसार किसी भी सामग्री को ब्लॉक करने के जबरदस्त अधिकार मिल सकते हैं। द वायर पर सरकारी सर्च और न्यूज़क्लिक के खिलाफ केंद्रीय मंत्रियों की हालिया टिप्पणियों के बारे में बोलते हुए, राम ने बताया कि सरकार द्वारा अक्सर "कुछ टीवी समाचार चैनलों के समर्थन" से बदनामी अभियान शुरू किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि कुछ समाचार चैनल कुख्यात हैं...वे स्वतंत्र समाचार संस्थानों पर एक तरह से सुपारी लेकर हमले करते हैं।

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फ्रांस की मीडियापार्ट के संस्थापक एडवी प्लेनेल ने सम्मेलन में कहा कि, “मेरी चिंता यह है कि हमारे काम पर विचार के तौर पर हमले किए जा रहे हैं, जबकि मीडिया के रूप में हमारा उद्देश्य तथ्य सामने रखना है।"

म्यांमार हालांकि जी-20 का सदस्य नहीं है, लेकिन म्यांमार के अखबार म्यामांर नाउ की एडिटर-इन-चीफ स्वी विन ने कहा कि, “म्यांमार अभी उत्तरी कोरिया नहीं बना है, लेकिन फिर भी वहां स्थिति खराब है। म्यांमार में जारी गृह युद्ध की तरफ भारत का इतना ध्यान नहीं है, जितना की पड़ोसी देश का होना चाहिए और ऐसी उम्मीद कम ही है कि इस बारे में जी-20 शिखर सम्मेलन में कोई बात होगी।”

बेरुत स्थित मीडिया संस्थान रसीफ22 के करीम सक्का ने सामने रखा कि तानाशाही में “अच्छी पत्रकारिता को सरकार का दुश्मन माना जाता है।” सऊदी अरब में कोई पत्रकार जेल में नहीं है, लेकिन सिर्फ एक ट्वीट करने पर किसी को भी मौत की सजा हो सकती है, बड़े पैमाने पर सेंसरशिप हो रही है और गूगल सर्च तक पर सेंसर है। इस सबके चलते पत्रकारिता करना बेहद मुश्किल हो गया है। लेकिन सिर्फ कारोबारी डील के कारण दुनिया ने इस सबसे आंखें फेर रखी हैं।

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दक्षिण कोरियन अखबार चोसुन इलबो के संपादक वूसुक केन चोई ने कहा कि यूट्यूबर पर खूब फेक न्यूज फैलाते हैं जिसे मुख्यधारा के मीडिया का एक धड़ा उठा लेता है। उन्होंन कहा कि उनके देश में बहुत से पत्रकारों के खिलाफ फर्जी खबरें देने की जांच चल रही है। इसके अलावा तमाम पत्रकारों के खिलाफ मुकदमे भी हुए हैं।

तुर्की के एक स्वतंत्र पत्रकार इपेक येज़दानी ने मुख्यधारा के मीडिया में सरकार के बढ़ते नियंत्रण के बारे में बात की। उन्होंने कहा, तुर्की में नब्बे प्रतिशत मुख्यधारा मीडिया या तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकार द्वारा नियंत्रित है।

सऊदी अरब की राजधानी रियाद में 2020 में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन से पहले रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने सऊदी अरब में प्रेस स्वतंत्रता सुधार हासिल करने के लिए जी-20 देशों से आग्रह करते हुए आम लोगों के समर्थन का आह्वान किया था। इसकी शुरुआत के तौर पर देश के 34 पत्रकारों की रिहाई की मांग थी जिन्हें जेल में बंद कर दिया गया था।

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