
टीएमसी ने मंगलवार को आरोप लगाया है कि हमें बीजेपी नेताओं, पार्टी सदस्यों और उनसे जुड़े बूथ लेवल एजेंटों के एसडीओ और डीएम के ऑफिस में घुसने और ईआरओ और एईआरओ पर वोटरों के नाम हटाने के लिए फॉर्म 7 को भारी संख्या में जमा करने के लिए बेवजह दबाव डालने की चिंताजनक खबरें मिल रही हैं। खबर है कि बिहार और झारखंड जैसे राज्यों से लोगों को एक बार में जमा करने के लिए हज़ारों ऐसे फॉर्म के साथ गाड़ियों में भरकर लाया जा रहा है।
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टीएमसी ने दावा किया कि ये घटनाएं मालदा के इंग्लिश बाज़ार, बांकुरा के रानीबांध और तलडांगरा, पूर्वी मेदिनीपुर के मोयना और तमलुक, हुगली के चुंचुरा और चंदननगर, नॉर्थ 24 परगना के बैरकपुर और कोलकाता के जोरासांको से सामने आई हैं। टीएमसी ने कहा कि यह चुनाव आयोग के 27 अक्टूबर 2025 के नोटिफिकेशन नंबर 23/2025 ERS Vol II का खुला और जानबूझकर किया गया उल्लंघन है, जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि कोई भी बीएलए ड्राफ्ट पब्लिकेशन से पहले बीएलओ को हर दिन 50 से ज़्यादा फॉर्म और उसके बाद हर दिन 10 से ज़्यादा फॉर्म जमा नहीं करेगा।
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हम भारत के निर्वाचन आयोग का तुरंत ध्यान बीजेपी की इस खतरनाक और सोची-समझी चाल की ओर दिलाते हैं, जिसका इस्तेमाल सही वोटरों को वोट देने से रोकने के लिए किया जा रहा है। अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो यह साज़िश देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को तोड़ देगी, जिसे एक ऐसी पार्टी चला रही है जो सत्ता के लिए इतनी बेताब है कि वह संविधान को रौंदने और लोकतंत्र को ही खत्म करने को तैयार है।
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इस बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने मंगलवार को एक बार फिर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के आंकड़ों मं नामों की विसंगति को दूर करने के लिए बीजेपी के एआई टूल का इस्तेमाल किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एसआईआर के दौरान जिन शादीशुदा महिलाओं ने अपना उपनाम बदला, चुनाव आयोग ने उनके नाम हटा दिए। ममता ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को जवाब देना चाहिए कि वह आधे मतदाताओं के नाम कैसे हटा सकते हैं और यह कैसे तय कर सकते हैं कि सरकार कौन बनाएगा।
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मुख्यमंत्री ने कहा कि चुनाव आयोग बीजेपी के एजेंट की तरह काम कर रहा है और बिना कारण बताए एकतरफा तरीके से नाम हटा रहा है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग व्हाट्सएप के भरोसे चल रहा है और हर दिन कई बार एसआईआर के नियम बदल रहा है। उन्होंने सवाल किया कि एसआईआर के नियमों के अनुसार, माइक्रो-ऑब्जर्वर की अनुमति नहीं है, फिर भी इन्हें केवल बंगाल में तैनात किया गया। बिहार के एसआईआर में निवास प्रमाण पत्र की अनुमति है, तो बंगाल में क्यों नहीं। उन्होंने कहा कि तथ्यात्मक असंगति मूल एसआईआर सत्यापन प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थी, इसे बाद में जोड़ा गया
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