
फिलहाल दुनिया की नजरें भारत पर टिकी हैं। प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘द डिप्लोमैट’ ने 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के संदर्भ में यह बात कही। पत्रिका ने लिखा: ‘आज इस समूह का नेतृत्व करना एक कूटनीतिक बारूदी सुरंग पर कदम रखने जैसा है।’ बदकिस्मती से ऐसे हालात नरेंद्र मोदी सरकार की भटकी हुई विदेश नीति और उनके नियंत्रण से बाहर के वैश्विक घटनाक्रमों का सीधा नतीजा हैं।
ब्रिक्स की शुरुआत 2009 में ‘ब्रिक’- ब्राजील, रूस, भारत और चीन-के रूप में हुई थी। 2010 में दक्षिण अफ्रीका इससे जुड़ा और 2011 में उसने अपनी पहली बैठक में हिस्सा लिया। 2024 में भारत के दबे-छिपे विरोध के बावजूद मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल किया गया, जबकि इंडोनेशिया 2025 में शामिल हुआ। उसी साल बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम को साझेदार देश का दर्जा दिया गया। आज का यह विस्तारित ब्रिक्स वैश्विक जीडीपी के 40 फीसद और दुनिया की 49.5 फीसद आबादी का प्रतिनिधित्व करता है।
जब तक प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत ने शीतयुद्ध के बाद अपनी गुटनिरपेक्ष और ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ की नीति को साधे रखा, दुनिया में भारत का एक ठोस दबदबा और सम्मान था। यह संतुलन उस समय पूरी तरह चरमरा गया जब नरेंद्र मोदी अचानक अमेरिका की गोद में जा बैठे और भारत की पारंपरिक विदेश नीति को सिर के बल खड़ा करते हुए इजरायल के साथ जा मिले- जो एक ऐसा देश है जिसे ब्रिक्स के अन्य सभी सदस्य पूरी तरह अछूत मानते हैं।
तमाम अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर आज का ‘मोदी-मार्का’ भारत अन्य ब्रिक्स देशों की कतार से बिल्कुल अलग-थलग खड़ा नजर आता है। इसका सबसे वीभत्स रूप फिलिस्तीन में इजरायल के युद्ध अपराधों और ईरान पर उसके उकसावे भरे हमलों के दौरान दिखा। किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर इजरायल की निंदा करने के बजाय भारत खुलकर उसके पाले में खड़ा रहा-यहां तक कि उसे हथियारों की आपूर्ति भी की गई-जिसने भारत को ब्रिक्स के भीतर एक बेमेल और अलग-थलग मुल्क बना दिया।
मई में भारत की अध्यक्षता में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक बिना किसी साझा बयान के बिखर गई थी, जिसे एक बड़ी विफलता माना गया। नई दिल्ली को शुरू से यही डर सता रहा था कि कहीं मुख्य ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का हश्र भी वैसा ही न हो।
सितंबर के शुरू में किर्गिस्तान में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी को इसी हताशा के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। एससीओ असल में पूरी तरह चीन का मंच है, और वहां खुद चलकर जाने का मोदी का मकसद शायद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को दिल्ली ब्रिक्स में आने के लिए मनाना था हालांकि चीन ने इस मामले में अंतिम क्षणों तक भारत को झुलाए रखा। जिनपिंग 2019 के बाद भारत नहीं आए हैं और उन्होंने 2023 में दिल्ली में हुए जी-20 सम्मेलन से भी दूरी बना ली थी।
मेजबान होने के नाते भारत की पहली कोशिश यही होगी कि सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष मौजूद रहें। लेकिन सऊदी अरब के मोहम्मद बिन सलमान के आने पर अब भी संशय के बादल मंडरा रहे हैं। अगस्त के शुरू में ही सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्की के साथ ‘मक्का पैक्ट’ पर दस्तखत किए हैं, जो नाटो की तर्ज पर बना एक सैन्य समझौता है और जिसके केंद्र में ईरान और इजरायल के साथ-साथ भारत से संभावित सुरक्षा चिंताओं का भी ध्यान रखा गया है।
एससीओ सम्मेलन के अंत में जारी ‘बिश्केक घोषणापत्र’ में सदस्य देशों ने ‘ईरान के इस्लामी गणराज्य पर सैन्य हमलों की निंदा करने वाले एससीओ के पूर्व रुख’ को पूरी मजबूती से दोहराया। मोदी उन 10 नेताओं में शामिल थे जिन्होंने इस दस्तावेज पर दस्तखत किए। जबकि इससे पहले न तो खुद मोदी ने और न ही भारतीय विदेश मंत्रालय ने ईरान के खिलाफ फरवरी से जारी अमेरिका और इजरायल की खुली मनमानी और हमलों पर निंदा का एक शब्द तक कहा था।
यही नहीं, मोदी उस एससीओ बयान के भी साझीदार बने जिसमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर, अंतरराष्ट्रीय कानूनों और विश्व व्यापार संगठन के नियमों के खिलाफ जाने वाले ‘एकतरफा प्रतिबंधात्मक कदमों’ यानी ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध अभियान ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ का सीधा विरोध किया गया था।
सम्मेलन के इतर मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियां से मुलाकात की। इसे ईरान की नाराजगी दूर करने की एक हताश कवायद माना गया। इस युद्ध में मोदी सरकार न केवल खुलकर इजरायल के साथ खड़ी दिखी, बल्कि उसने अमेरिकी दबाव के आगे घुटने टेकते हुए ईरान के चाबहार बंदरगाह से जुड़ी अपनी प्रतिबद्धताओं से भी कदम पीछे खींच लिए, जहां भारत ने भारी निवेश कर रखा था।
ईरान के आधिकारिक बयान के अनुसार मोदी ने पेजेशकियां से कहा कि ‘हाल के कठिन दौर में भी हमने ईरान के साथ अपने सहयोग और संवाद को बनाए रखने की पूरी कोशिश की।’ यह तथाकथित ‘कठिन दौर’ किसी और का नहीं, बल्कि खुद मोदी का ही पैदा किया हुआ था, जो ‘माई फ्रेंड डॉनल्ड’ के फरमानों के आगे नतमस्तक रहे और नेतन्याहू की दागदार हुकूमत से अपनी गलबहियां कभी छिपा नहीं सके।
ईरान की ओर से बताया गया कि मोदी ने पेजेशकियां से बातचीत में कहा, ‘मैं आपकी इस बात से सहमत हूं कि कुछ लोग युद्ध में ही अपना हित देखते हैं…’ क्या इसे अमेरिका और इजरायल की सधी हुई आलोचना माना जा सकता है? जवाब में पेजेशकियां ने ‘नई दिल्ली के समर्थन और सहयोग के प्रति आभार जताया।’ भारत की ओर से किसी भी तरह के ‘समर्थन और सहयोग’ का यह संकेत संघर्ष की शुरुआत से अब तक उसके अपनाए गए रुख से एक बड़ा यू-टर्न था।
मोदी सचमुच अमेरिका-इजरायल के प्रभाव चक्र से बाहर निकल रहे हैं या नहीं, यह परखने की असली कसौटी ब्रिक्स सम्मेलन के बाद भारत का वास्तविक आचरण ही होगा। तभी पता चलेगा कि मोदी एससीओ में चीन और ईरान को केवल इसलिए साधने गए थे ताकि दिल्ली का ब्रिक्स सम्मेलन किसी बड़े कूटनीतिक झटके से बच जाए। चीन के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने लिखा, ‘जैसे ही नई दिल्ली ब्रिक्स के दौर में कदम रखेगी, पूरी दुनिया की नजर इस बात पर होगी कि इस बैठक से क्या नतीजा निकलता है।’
रूसी राष्ट्रपति कार्यालय (क्रेमलिन) के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने मीडिया से कहा: ‘हमें पूरा भरोसा है कि यह शिखर सम्मेलन सफल रहेगा।’ यह इस बात का संकेत है कि रूस एक बार फिर भारत की नैया पार लगाने की कोशिश करेगा जैसा कि उसने 2023 के दिल्ली जी-20 में किया था ताकि यूक्रेन युद्ध का हल्का-फुल्का जिक्र करके किसी तरह एक सर्वसम्मत साझा बयान पर मुहर लगवाई जा सके।
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने सम्मेलन में आने की पुष्टि कर दी है, जबकि उनका देश गाजा में इसराइल के युद्ध अपराधों और नरसंहार के खिलाफ दुनिया में सबसे मुखर रहा है। दिल्ली में दक्षिण अफ्रीका के उच्चायुक्त अनिल सूकलाल ने दावा किया है कि ‘भारत कई मोर्चों पर एक उपलब्धिपूर्ण शिखर सम्मेलन आयोजित करने जा रहा है।’
जहां तक ब्राजील का सवाल है, वह नेतन्याहू के युद्ध अपराधों के खिलाफ मजबूती से दक्षिण अफ्रीका के साथ खड़ा रहा है और उसने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में इसराइल के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका के नरसंहार मामले का खुला समर्थन किया है। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका दोनों ही मोदी सरकार की बहुसंख्यकवादी नीतियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के अवमूल्यन को लेकर असहज रहे हैं, फिर भी वे पश्चिम एशिया पर एक आम सहमति बनाने में मदद कर सकते हैं।
भारतीय विदेश सेवा के गलियारों का भी यही मानना है कि रूस-यूक्रेन के टकराव और पश्चिम एशिया के भीषण युद्ध को देखते हुए यह सम्मेलन भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है। मोदी इस जुए पर दांव लगा रहे हैं कि ब्रिक्स सम्मेलन से ट्रंप नाराज न हों, जो वैसे भी इस समूह के बिखर जाने पर सबसे ज्यादा खुश होंगे। सऊदी अरब और यूएई की मौजूदगी के कारण ब्रिक्स का साझा बयान एससीओ जितना तीखा ईरान-समर्थक नहीं हो सकता, फिर भी इस दस्तावेज में पश्चिम एशिया के हालात को नजरअंदाज करना भारत के लिए मुमकिन नहीं होगा।
विदेश मंत्रालय ने इस सम्मेलन के लिए ‘बिल्डिंग रेजिलिएंस एंड इनोवेशन फॉर कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी’ का जो जुमला उछाला है, वह संक्षिप्त नाम गढ़ने की मोदी सरकार की पुरानी बीमारी का ही हिस्सा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में यह उन मुश्किल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश मात्र लग रही है जो इस शिखर सम्मेलन को विफल कर सकते हैं।
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