विचार

अदालती फैसलों की आलोचना 'ईश-निंदा' नहीं

एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट के चुनाव आयोग के लिए 'फ्रेंडली' फैसले से आयोग से ज्यादा आह्लादित होना और उसके आलोचकों पर बेवजह बरसना बिना कहे बहुत कुछ कह देता है।

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मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बांछें तो चुनाव आयोग की खिलनी चाहिए थीं, क्योंकि इससे उसकी मनमानी को मान्यता मिल गई है, लेकिन खिल गई हैं भारतीय जनता पार्टी और उसकी पांतों की। उनको किसी याची के यह तक कहने पर एतराज है कि फैसले से वह बहुत निराश हुआ है। इस कारण और कि न्यायालय ने मताधिकार जैसे अहम मुद्दे पर संविधान और लोकतंत्र के रक्षक की अपनी भूमिका समुचित रूप से अदा नहीं की। 

ये पांतें किसी को यह भी नहीं कहने देना चाहतीं कि फैसले ने रामजन्मभूमि/बाबरी मस्जिद विवाद के 9 नवंबर 2019 के फैसले की यादें फिर ताजा कर दी हैं। इनके पहले निशाने पर चुनाव विश्लेषक योगेन्द्र यादव हैं। यादव का कहना है कि वह निराश जरूर हैं, लेकिन हैरान नहीं, क्योंकि मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय द्वारा अपनाए गए रवैए से उनको पहले ही उसका अनुमान हो चला था। इसलिए उसे सुनने के लिए न्यायालय भी नहीं गए। 

यादव द्वारा इस फैसले की एडीएम जबलपुर मामले, जिसमें नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को सीमित कर दिया गया था, के फैसले से तुलना करना तो भाजपाई पांतों को कुफ्र से कम नहीं लग रहा।

ये पांतें ऐसा जता रही हैं, जैसे इस फैसले के आलोचकों ने उसकी आलोचना में अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि न्यायालय और न्यायाधीशों की शान में ऐसी गुस्ताखी की है, जिसकी कोई माफी ही नहीं। वे यह तक भूल गए हैं कि एक समय वे खुद न्यायालयों के फैसले करने के अधिकार तक पर तीखे सवाल उठाया करती थीं। 

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इनका दुरंगापन यह है कि एक फरवरी 1886 को फैजाबाद के तत्कालीन जिला जज कृष्णमोहन पांडेय ने एक फरवरी 1986 को अपनी अंतरात्मा की आवाज पर दूसरे पक्ष को सुने बिना ही विवादित बाबरी मस्जिद में 37 साल से बंद ताले खोल देने का आदेश दिया तो वे बहुत खुश हुई थीं और विवाद के हाईकोर्ट के रास्ते सर्वोच्च न्यायालय पहुंचने तक आश्वस्त हो चली थीं कि फैसला उनके पक्ष में ही आएगा। सत्ता के मद में वे जानबूझकर इस तथ्य से अंजान बनी हुई हैं कि राजतंत्र में भी न्यायालय और न्यायाधीश आलोचनाओं से परे नहीं हुआ करते थे। स्वाभाविक ही तब उस 'न्याय' के पीड़ितों की संख्या उसके लाभान्वितों से ज्यादा हुआ करती थी-इतिहासप्रसिद्ध जहांगीरी इंसाफ के दौर में भी।

उर्दू कहें या रेख्ता की शायरी में ऐसी आलोचनाओं की भरमार दिखाई देती है। मिसाल के तौर पर : इंसाफ की राह में काफिर-मोमिन, अमीर-गरीब, छोटे-बड़े और गोरे-काले आदि भेदभावों से त्रस्त एक शायर जहां सीधे-सीधे पूछता है :

वही कातिल, वही शाहिद, वही मुंसिफ ठहरे,

अकरबा मेरे करें कत्ल का दावा किस पर? 

अमीर कजलबाश की इंसाफ मिलने की नाउम्मीदी तो इस सीमा तक चली जाती है कि वे कहते हैं : 

उसी का शहर, वही मुद्दई, वही मुंसिफ,

हमें यकीं था, हमारा कुसूर निकलेगा। 

दूसरी ओर मलिकजादा मंजूर अहमद ‘फैसलों में तरफदारी’ की बात करते हुए कहते हैं :

वही कातिल, वही मुंसिफ, अदालत उसकी, वो शाहिद,

बहुत से फैसलों में अब तरफदारी भी होती है,

तो अब्दुल हमीद 'अदम' इंसाफ का रहा-सहा भरम भी तोड़ डालते हैं : 

हमको शाहों की अदालत से तवक्को तो नहीं,

आप कहते हैं तो जंजीर हिला देते हैं। 

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मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपने विरुद्ध चलाए गए राजद्रोह के मामले में कौल-ए-फैसल नाम से 24 जनवरी 1922 को दिए अपने लिखित बयान में भी न्यायालय पर कुछ कम सवाल नहीं उठाए थे। यह तक लिख डाला था कि तारीख-ए-आलम की सबसे बड़ी नाइंसाफियां मैदान-ए-जंग के बाद अदालत के ऐवानों में ही हुई हैं। 

उन्होंने लिखा था : मिस्टर मजिस्ट्रेट! हमारे हिस्से में ये मुजरिमों का कटहरा (कटघरा) आया है, तुम्हारे हिस्से में वो मजिस्ट्रेट की कुर्सी।...मोअर्रिख (इतिहासकार) हमारे इंतजार में है, और मुस्तकबिल कब से हमारी राह तक रहा है। हमें जल्द-जल्द यहां आने दो, और तुम भी जल्द-जल्द फैसला लिखते रहो।...यहां तक कि एक दूसरी अदालत का दरवाजा खुल जाए। ये खुदा के कानून की अदालत है। वक्त उसका जज है। वो फैसला लिखेगा, और उसी का आखिरी फैसला होगा।

न्यायालयों के फैसलों पर सवाल उठाने को हिन्दी के उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने भी अपराध नहीं ही माना था। अन्यथा अपनी बहुचर्चित कहानी ‘नमक का दारोगा’ में यह सब क्यों लिखते? : न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं... न्याय और विद्वता, लंबी-चौड़ी उपाधियां, बड़ी-बड़ी दाढ़ियां और ढीले चोंगे एक भी आदर के पात्र नहीं हैं... न्याय का दरबार... परंतु उसके कर्मचारियों पर पक्षपात का नशा छाया हुआ था...गवाह थे, किंतु लोभ से डावांडोल! 

अवध की वह लोककथा भी अपने आप में कोर्ट पर सवाल ही है, जो बताती है कि एक धूर्त ने एक मामले में पहले तो न्याय के आसन पर बैठे राजा को एक खोखले पेड़ की गवाही सुनने को राजी किया, फिर अपने पिता को पेड़ के भीतर बैठा दिया। इस ताकीद के साथ कि राजा पेड़ से जो भी सवाल पूछें, वह वहीं बैठे-बैठे उसका बेटे की हितसाधना करने वाला जवाब दे। इस तरह कि राजा को लगे कि जवाब पेड़ ही दे रहा है। लेकिन दूसरे पक्ष ने उसकी चालाकी भांप ली। पहले पेड़ की गवाही पर सवाल उठाए, फिर  पेड़ में आग लगा दी। फिर तो धूर्त का पिता त्राहिमाम करते हुए बाहर निकल आया और सारा भांडा फूट गया। 

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यहां यह भी गौरतलब है कि लोकतंत्र की कोई भी अवधारणा न्यायालयों पर सवालों की कतई मनाही नहीं करती। इतनी भर अपेक्षा करती है कि जो भी सवाल उठें, नियम कायदों के तहत उठें। मानती है कि विधायिका और कार्यपालिका की ही तरह न्यायपालिका भी राज्य का अंग है और जैसे वे, वैसे ही वह भी अनालोच्य नहीं हैं। जब भी इंसाफ के प्रति उसकी वचनब़द्धता में कमी दिखाई देती है, उस पर सवाल उठते ही हैं। तब भी जब वह इंसाफ देने में इतना विलंब कर देती है कि वह नाइंसाफी में बदल जाता है। 

न्यायालयों के फैसलों के खिलाफ अपीलें, जिन्हें पीड़ितों का हक माना जाता, उनके लिए वक्त दिया और तब तक फैसले पर अमल स्थगित रखा जाता हैं, भी प्रकारांतर से उन पर सवाल ही होती हैं। हां, सवाल उठाने भर से  कोई फैसला अपवित्र नहीं हो जाता, न ही इससे उसकी तौहीन होती है। न्यायिक कसौटियों पर जांचा-परखा और खरा है, तो वह और प्रखर होकर सामने आता है, जिससे न्याय का मार्ग और प्रशस्त होता है। हां, वह इसका विलोम हो तो स्थिति बहुत शोचनीय हो जाती है।

न्यायालयों के फैसलों पर सवालों की मनाही थोपने की परंपरा तो भाजपा और उसकी पांतों ने 2014 में तब शुरू की, जब वे अकेले अपने दम पर देश की सत्ता में आने में सफल हो गईं। तब शायद उन्हें लगा कि अब उनके लिए आस्था के मामलों में फैसले के न्यायालयों के अधिकार पर सवाल उठाने के अपने पुराने रवैये से पीछा छुड़ा लेना ही बेहतर होगा। फिर वे न्यायालयों के उन फैसलों पर सवाल उठाने वालों की न सिर्फ आलोचना बल्कि निंदा तक करने लगीं, जो उनके अनुकूल थे और जिनकी बाबत वे जताना चाहती थीं कि उन्होंने उन्हें पाने या दिलाने के लिए बहुत मेहनत की है।

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फिर तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक के लिए फैसलों पर सवाल उठाने वालों की निंदा से परहेज करना गवारा नहीं हुआ। 28 मार्च 2023 को राजधानी दिल्ली में अपनी पार्टी के नए केन्द्रीय कार्यालय का उद्घाटन करते हुए तो उन्होंने यह तक कह डाला था कि ‘जो लोग (विपक्षी नेता) भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, उन पर एजेंसियां (प्रवर्तन निदेशालय और केन्द्रीय जांच ब्यूरो आदि) कार्रवाई करती हैं तो एजेंसियों पर हमला किया जाता है। जब कोर्ट कोई फैसला सुनाता है, तो कोर्ट पर सवाल उठाया जाता है क्योंकि कुछ दलों ने मिलकर भ्रष्टाचारी बचाओ अभियान छेड़ा हुआ है। कोर्ट पर सवाल उठाने को इस तरह भ्रष्टाचारी बचाओ अभियान से जोड़ने का मतलब साफ था कि वे  कोर्ट के फैसलों पर सवालों को इस कथित अभियान जितना ही गर्हित मानते थे। 

आज हम जानते हैं कि वे अपने या अपनी सरकार के फैसलों के खिलाफ उठने वाले सवालों को भी पूछने वालों का लोकतांत्रिक अधिकार नहीं ही मानते। शायद इसीलिए कोर्ट पर सवालों की खलिश कहें या तपिश, उनको, उनकी सरकार, पार्टी को इतना पीड़ित करती आ रही है। 

ताजा मामले में सर्वोच्च न्यायालय के चुनाव आयोग के लिए फ्रेंडली इस फैसले से आयोग से ज्यादा इन पांतों आह्लादित होना और उसके आलोचकों पर बेवजह बरसना वैसे भी उनके बारे में बिना कहे बहुत कुछ कह देता है।

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