
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास केवल चुनावों का नहीं है। यह असहमति, प्रतिरोध और नैतिक हस्तक्षेप का भी इतिहास है। इस इतिहास में यदि किसी एक राजनीतिक औजार ने सबसे अधिक नैतिक प्रतिष्ठा अर्जित की, तो वह था- अनशन। महात्मा गांधी ने इसे केवल भोजन-त्याग का कर्म नहीं बनाया, बल्कि आत्मबल, नैतिक दबाव और जनमत के निर्माण का माध्यम बनाया। गांधी का विश्वास था कि सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि उसके सामने सत्य और नैतिकता का अडिग आग्रह खड़ा हो जाए तो अंततः उसे झुकना पड़ता है।
लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में यह प्रश्न पहले से अधिक तीखे रूप में सामने है कि क्या अनशन अब अपनी राजनीतिक प्रभावशीलता खो चुका है? लद्दाख के पर्यावरण और संवैधानिक अधिकारों के प्रश्न पर सोनम वांगचुक के लंबे अनशन, किसानों के आंदोलन, विभिन्न सामाजिक संगठनों के धरनों और अनेक स्थानीय आंदोलनों ने यह सवाल फिर से खड़ा किया है कि क्या आज की सत्ता पहले की तुलना में नैतिक दबाव के प्रति कम संवेदनशील हो गई है? या लोकतंत्र की प्रकृति ही बदल गई है?
इस प्रश्न का उत्तर केवल किसी एक सरकार के व्यवहार में नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य में निहित है। गांधी के समय अनशन इसलिए प्रभावी था क्योंकि वह व्यापक जनसंपर्क, संवाद और नैतिक विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ था। गांधी का हर उपवास केवल व्यक्तिगत तपस्या नहीं था; वह समाज के विवेक को संबोधित करता था। उनके अनशन की खबर गांव-गांव तक पहुंचती थी, अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित होती थी और ब्रिटिश सरकार अंतरराष्ट्रीय जनमत के दबाव से भी प्रभावित होती थी। अंग्रेज औपनिवेशिक शासक थे, लेकिन वे विश्व-राजनीति, संसद, प्रेस और लोकतांत्रिक आलोचना से पूरी तरह मुक्त नहीं थे। उन्हें अपनी वैधता का कुछ न कुछ प्रदर्शन करना पड़ता था।
आज की परिस्थितियां भिन्न हैं। लोकतांत्रिक सरकारें चुनावी बहुमत से वैधता प्राप्त करती हैं। बहुमत का यह नैतिक आत्मविश्वास कई बार इस धारणा को जन्म देता है कि चुनाव जीत लेना ही जनता की अंतिम स्वीकृति है। परिणामस्वरूप सड़क पर उठने वाली आवाजों को कभी-कभी सीमित समूहों, विरोधी राजनीति या अस्थायी असंतोष के रूप में देखा जाने लगता है। ऐसे में अनशन का नैतिक दबाव पहले जैसा असर नहीं छोड़ पाता।
यह कहना भी पूरी तरह उचित नहीं होगा कि केवल वर्तमान सरकार के समय ऐसा हुआ है। पिछले तीन दशकों में लगभग सभी सरकारों ने बड़े आंदोलनों के प्रति पहले प्रतीक्षा, फिर प्रशासनिक नियंत्रण और अंततः सीमित संवाद की नीति अपनाई है। यह प्रवृत्ति वैश्विक लोकतंत्रों में भी दिखाई देती है। राज्य का चरित्र अधिक तकनीकी, अधिक सुरक्षा-केन्द्रित और अधिक केन्द्रीकृत हुआ है। परिणामस्वरूप नैतिक अपील की तुलना में प्रशासनिक प्रबंधन को अधिक महत्व मिलने लगा है।
फिर भी, यह भी सच है कि समकालीन भारत में अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने यह चिंता व्यक्त की है कि विरोध प्रदर्शनों के प्रति राज्य का रवैया पहले की तुलना में अधिक कठोर दिखाई देता है। धरना-प्रदर्शनों पर प्रतिबंध, लंबे समय तक अनुमति न मिलना, आंदोलनकारियों को हिरासत में लेना, इंटरनेट बंद करना या सुरक्षा के तर्कों के आधार पर आंदोलनों को सीमित करना- इन सबने यह बहस तेज की है कि लोकतंत्र में असहमति के लिए उपलब्ध सार्वजनिक स्थान सिकुड़ रहे हैं। दूसरी ओर सरकार का तर्क रहता है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना, सार्वजनिक जीवन को बाधित होने से बचाना और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उसकी जिम्मेदारी है। इसलिए इस बहस को एकतरफा निष्कर्ष में बदलना उचित नहीं होगा।
सोनम वांगचुक का आंदोलन इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण बन जाता है। उनका आग्रह केवल किसी व्यक्तिगत मांग का नहीं, बल्कि लद्दाख के पर्यावरण, स्थानीय भागीदारी और संवैधानिक सुरक्षा से जुड़ा रहा है। उनके अनशन ने अनेक नागरिकों का ध्यान आकर्षित किया, किंतु यह भी स्पष्ट हुआ कि केवल नैतिक अपील भर से नीति-निर्णय तुरंत नहीं बदलते। इससे यह प्रश्न और गहरा हुआ कि क्या आज सत्ता नैतिक आग्रहों की अपेक्षा राजनीतिक गणित और प्रशासनिक प्राथमिकताओं से अधिक संचालित होती है?
यहां एक और परिवर्तन ध्यान देने योग्य है। गांधी के समय सूचना के स्रोत सीमित थे। कोई बड़ा अनशन राष्ट्रीय समाचार बन जाता था। आज सूचना की बाढ़ है। चौबीस घंटे के समाचार चक्र और सोशल मीडिया के युग में हर दिन कोई नया विवाद, नया अभियान और नई बहस सामने आ जाती है। परिणामस्वरूप किसी भी आंदोलन का सार्वजनिक ध्यान लंबे समय तक बनाए रखना कठिन हो गया है। दृश्यता का संकट भी अनशन की प्रभावशीलता को प्रभावित करता है।
दूसरा बड़ा परिवर्तन नागरिक समाज की संरचना में आया है। गांधी के दौर में कांग्रेस स्वयं एक जनांदोलन थी। आज राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और नागरिक समूह अलग-अलग इकाइयां हैं। उनके बीच वैसा व्यापक समन्वय कम दिखाई देता है। इसलिए किसी एक अनशन को पूरे समाज की नैतिक आवाज का रूप मिलना कठिन हो जाता है।
इसे भी पढ़ेंः पक रही है प्रतिरोध की नई तहज़ीब
यह भी विचारणीय है कि अनशन का अत्यधिक प्रयोग स्वयं उसकी नैतिक शक्ति को कमजोर करता है। यदि हर छोटा-बड़ा विवाद अनशन तक पहुंच जाए तो समाज उसके प्रति संवेदनहीन होने लगता है। गांधी ने भी अनशन को अंतिम नैतिक उपाय माना था, सामान्य राजनीतिक हथियार नहीं। इसलिए उसकी गरिमा संयमित प्रयोग में थी।
क्या इसका अर्थ यह है कि गांधी की अहिंसा अप्रासंगिक हो गई? उत्तर नकारात्मक है। अहिंसा का अर्थ केवल अनशन नहीं है। अहिंसा का अर्थ है- संवाद, सत्य, जनसंगठन, रचनात्मक कार्यक्रम, नैतिक साहस और लोकतांत्रिक दबाव का संयोजन। यदि इन तत्वों से अनशन अलग हो जाए तो वह केवल प्रतीकात्मक उपवास बनकर रह जाता है। यदि ये तत्व उसके साथ हों तो आज भी वह समाज के विवेक को झकझोर सकता है, भले ही उसका तात्कालिक राजनीतिक परिणाम न दिखाई दे।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि कई आंदोलन तत्काल सफल नहीं हुए, किंतु उन्होंने आने वाली पीढ़ियों की राजनीति बदल दी। चिपको आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन, सूचना के अधिकार का संघर्ष और अनेक पर्यावरणीय अभियान पहले उपेक्षित लगे, पर बाद में उन्होंने नीतियों और जनचेतना पर गहरा प्रभाव डाला। इसलिए किसी अनशन की सफलता केवल इस आधार पर नहीं आंकी जा सकती कि सरकार ने उसी समय उसकी मांगें स्वीकार कीं या नहीं।
इसे भी पढ़ेंः राहुल गांधी ने सोनम वांगचुक को जबरन हटाने को बताया गलत, कहा- मोदी सरकार के मुख्य सिद्धांत असत्य और हिंसा
लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा सत्ता और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारियों में निहित होती है। सत्ता को यह स्वीकार करना चाहिए कि असहमति लोकतंत्र की शत्रु नहीं, उसकी अनिवार्य शर्त है। वहीं आंदोलनों को भी यह समझना होगा कि नैतिक विश्वसनीयता, तथ्यपरकता और व्यापक जनसंपर्क के बिना केवल प्रतीकात्मक प्रतिरोध पर्याप्त नहीं है।
आज आवश्यकता गांधी की विधियों की नकल करने की नहीं, बल्कि उनके मूल दर्शन को नए संदर्भों में समझने की है। यदि गांधी आज होते तो संभवतः वे केवल उपवास नहीं करते; वे डिजिटल माध्यमों, जनसंवाद, पर्यावरण, स्थानीय स्वशासन और सामाजिक संगठन को जोड़कर एक व्यापक नैतिक आंदोलन खड़ा करते। उनका लक्ष्य किसी सरकार की पराजय नहीं, बल्कि समाज के विवेक का जागरण होता।
इसे भी पढ़ेंः 'जंतर-मंतर पर जो हुआ वह लोकतंत्र और संविधान के ऊपर काला धब्बा', मोदी सरकार पर बरसे खड़गे और खेड़ा
इसलिए यह कहना कि अनशन पूरी तरह बेमानी हो गया है, इतिहास और राजनीति- दोनों के साथ न्याय नहीं होगा। अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि अनशन की प्रभावशीलता का सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ बदल गया है। आज वह अपने आप में पर्याप्त नहीं है; उसे व्यापक लोकतांत्रिक संगठन, निरंतर जनसंवाद, तथ्याधारित विमर्श और सार्वजनिक सहभागिता के साथ जोड़ना आवश्यक है।
भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्या वह असहमति को केवल प्रशासनिक समस्या मानता रहेगा, या उसे लोकतंत्र की जीवनदायिनी शक्ति के रूप में स्वीकार करेगा। इसी प्रश्न का उत्तर भविष्य तय करेगा। यदि लोकतंत्र में नैतिक आवाजों के लिए स्थान लगातार संकुचित होता है, तो केवल आंदोलनों की नहीं, स्वयं लोकतंत्र की संवेदनशीलता कमजोर होगी। और यदि राज्य तथा समाज दोनों संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करते हैं, तो गांधी की अहिंसा आज भी प्रासंगिक रहेगी- एक ऐतिहासिक स्मृति के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भविष्य की आवश्यकता के रूप में।
इसे भी पढ़ेंः जंतर-मंतर पर अफरा-तफरी, पुलिस सोनम वांगचुक को जबरदस्ती ले गई अस्पताल, दिपके का आरोप, पुलिस ने की पिटाई
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए