
मोदी सरकार में जे पी नड्डा जैसे तमाम मंत्री केवल विपक्ष को कोसना और मोदी सरकार की छवि चमकाना जानते हैं, उन्हें अपने मंत्रालय का हाल भी नहीं पता होता। देश में आंकड़ों से संबंधित रिपोर्ट कभी-कभी ही सामने आती हैं, पर हरेक ऐसी रिपोर्ट या संसद में बताये गए आंकड़े कुछ तथ्य तो स्पष्ट तौर पर बताते हैं- मोदी सरकार में आंकड़ों की तमाम बाजीगरी के बाद भी डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी विकास की दर मोदी सरकार की तुलना में बहुत अधिक रही। देश ने सामाजिक विकास की जो गति डॉ मनमोहन सिंह के समय हासिल की थी, उस गति को मोदी सरकार ने गवां दिया है। प्रधानमंत्री मोदी और उनके सहयोगियों को पिछली सरकारों की अनर्गल आलोचना से पहले अपने ही सरकार के तमाम आंकड़ों को एक बार जरूर देखना चाहिए।
देश में महिलाओं के सशक्तीकरण के बढ़ते नारों और दावों के बीच एक खतरनाक तथ्य यह भी है कि संस्थागत प्रसूति, यानि अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में सुरक्षित प्रसूती की संख्या लगातार घटती जा रही है। जाहिर है, देश में असुरक्षित तौर पर गैर-प्रशिक्षित लोगों द्वारा प्रसूति की संख्या बढ़ रही होगी। 13 मार्च 2026 को लोकसभा में स्वास्थ्य राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल ने अरेखांकित प्रश्न 3474 के लिखित जवाब में बताया था कि वर्ष 2022-2023 में देश में संस्थागत प्रसूति की संख्या 2.02 करोड़ थी। इसके बाद वर्ष 2023-2024 में यह संख्या 1.98 करोड़ और वर्ष 2024-2025 में आगे घटकर 1.94 करोड़ ही रह गई।
दूसरी तरफ नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों में संस्थागत प्रसूति की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन इन आंकड़ों पर भरोसा करना मुश्किल है। इसमें एक ही वर्ष के अलग-अलग रिपोर्टों में बिल्कुल अलग आंकड़े हैं। केंद्र सरकार का स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय नियमित अंतराल पर राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण प्रकाशित करता है। इसमें स्वास्थ्य से संबंधित अनेक विषयों पर आंकड़े होते हैं। इस शृंखला में सबसे नई रिपोर्ट वर्ष 2022-2024 के बीच किए गए छठे सर्वेक्षण की है, इससे पहले वर्ष 2019-21 के बीच किए गए पांचवें सर्वेक्षण की थी।
ऐसे हरेक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े दो जगह होते हैं– एक तो उस सर्वेक्षण की रिपोर्ट में और दूसरी बार इन्हें ठीक आगे के सर्वेक्षण की रिपोर्ट में तुलना के लिए दिया जाता है। उदाहरण के लिए, वर्ष 2019-21 के पांचवें सर्वेक्षण के आंकड़े पांचवें सर्वेक्षण की रिपोर्ट के साथ ही 2022-24 के छठे सर्वेक्षण की रिपोर्ट में भी है। यह एक सामान्य सी बात है कि एक ही समय के आंकड़े आप 2 जगह प्रस्तुत करें या फिर दो सौ जगह– आंकड़े बिल्कुल समान रहेंगे। पर, विकसित भारत और अमृत काल वाली मोदी सरकार में ऐसा बिल्कुल नहीं होता, इसमें एक ही सर्वेक्षण के दो जगह प्रस्तुत आंकड़े बिल्कुल अलग हो जाते हैं। यह “नॉन-बायोलाजिकल” का एक चमत्कार है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण का पांचवां सर्वेक्षण वर्ष 2019 से 2021 के बीच किया गया। इसके आंकड़े पांचवें सर्वेक्षण की रिपोर्ट और छठे सर्वेक्षण (2023-2024) की रिपोर्ट, दोनों, में दिए गए हैं- और इन दोनों में कहीं समानता नहीं है और स्पष्ट तौर पर यह समझ में आता है कि स्वास्थ्य में हम विकास कर नहीं रहे हैं बल्कि आंकड़ों में हेराफेरी कर केवल गुमराह कर रहे हैं। वर्ष 2019-21 के दौरान संस्थागत प्रसूति के बारे में पांचवें सर्वेक्षण की रिपोर्ट में आंकड़े हैं, 88.6%, जबकि छठे सर्वेक्षण की रिपोर्ट में इसी सर्वेक्षण का हवाला देकर 96 प्रतिशत का आंकड़ा प्रस्तुत किया गया है।
इसी तरह, सरकारी संस्थानों में प्रसूति का आंकड़ा वर्ष 2019-21 के लिए पांचवीं रिपोर्ट में 61.9 प्रतिशत है, जबकि छठी रिपोर्ट में पांचवीं रिपोर्ट का संदर्भ देकर 49.7 प्रतिशत ही बताया गया है। कुछ विषयों पर तो आंकड़ों में दोगुने से भी अधिक का अंतर है। कुल सिजेरियन प्रसूति पांचवीं रिपोर्ट के अनुसार 21.5 प्रतिशत है, जबकि छठी रिपोर्ट में इसी के संदर्भ से 60.7 प्रतिशत बताया गया है। इसी तरह प्राइवेट और सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में सीजेरियन प्रसूति के आंकड़ों में बहुत अंतर है। हाल में ही छात्र आंदोलन को खत्म कराने में स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा बड़े सक्रिय दिख रहे थे, पर उनसे अपना ही मंत्रालय नहीं संभल रहा है और स्वास्थ्य के क्षेत्र में विकास आंकड़ों की खुलेआम बाजीगरी पर टिका है।
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पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2023-24 के दौरान संस्थागत प्रसूति 98.8 प्रतिशत तक पहुंच गई, जिसमें से सरकारी संस्थानों का योगदान 57.5 प्रतिशत है। प्रसूति में सीजेरियन तरीके का चलन तेजी से बढ़ रहा है– कुल 62.2 प्रतिशत प्रसूति सीजेरियन तरीके से की गई। निजी अस्पतालों में कुल प्रसूति में से 83.9 प्रतिशत सीजेरियन है, जबकि सरकारी संस्थानों में यह संख्या 48.1 प्रतिशत रही।
आंकड़ों में तमाम हेराफेरी के बाद भी निष्कर्ष वही है– डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में देश ने महिलाओं के स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रधानमंत्री मोदी की तुलना में अधिक तेजी से विकास किया। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की तमाम रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2005-06 से 2015-16 के बीच संस्थागत प्रसूति में हरेक वर्ष औसतन 4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि वर्ष 2015-16 से 2023-24 के बीच यह वृद्धि आधी, यानि 2 प्रतिशत प्रतिवर्ष, ही रह गई। इसी तरह सरकारी संस्थाओं में प्रसूति में वृद्धि की दर वर्ष 2005-06 से 2015-16 के बीच औसतन 3 प्रतिशत प्रतिवर्ष दर्ज की गई, जबकि वर्ष 2015-16 से 2023-24 के बीच यह वृद्धि महज 0.5 प्रतिशत ही रही।
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उत्तर प्रदेश सरकार महिलाओं और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उपलब्धियों पर लंबे-लंबे विज्ञापन प्रकाशित करती है, पर इसी उत्तर प्रदेश में मातृ मृत्यु अनुपात देश में सबसे अधिक है। उत्तर प्रदेश की बदहाली यहीं तक सीमित नहीं है, यह अकेला राज्य है जहां वर्ष 2021-23 की तुलना में वर्ष 2022-24 में मातृ मृत्यु अनुपात बढ़ गया है। वर्ष 2021-23 के सैम्पल रेजिस्ट्रैशन रिपोर्ट के अनुसार यहां मातृ मृत्यु अनुपात 141 था, जो वर्ष 2022-24 की रिपोर्ट में बढ़कर 154 तक पहुंच गया। वर्ष 2021-23 में देश का औसत 88 था, जबकि 2022-24 में यह औसत 87 रहा। दूसरे जितने भी राज्यों में यह अनुपात 2021-23 की रिपोर्ट में 100 से ऊपर था, उन्होंने 2022-24 तक इस क्षेत्र में कुछ प्रगति कर ली थी। असम में मातृ मृत्यु अनुपात इन दोनों रिपोर्ट में क्रमशः 110 और 84 रहा, मध्य प्रदेश में 142 से 135 तक, छत्तीसगढ़ में 146 से 124 और ओडिशा में यह आंकड़ा 153 से 124 तक पहुंच गया।
मोदी राज में बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य की प्रगति विपरीत दिशा में हो रही है। स्वास्थ्य मंत्री कभी अपने मंत्रालय से संबंधित वक्तव्य देते हुए भी नजर नहीं आते। यही विकसित भारत की हकीकत है।
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