
दिल्ली में हाल ही में हुए जेन-जी के विरोध-प्रदर्शन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि शायद वह दरार है जो इसने डर और घुटने टेक देने के मौजूदा माहौल में सेंध लगाकर पैदा की है। इसके साथ ही इसने मोदी सरकार की कमजोरियों को भी उजागर कर दिया है। अपनी हठधर्मिता को दृढ़ संकल्प बताने वाली सरकार- ‘इस सरकार में इस्तीफे नहीं हुआ करते’- को शर्मनाक तरीके से पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। अपनी विशाल आईटी मशीनरी के दम पर खुद को ‘दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी’ कहने वाला दल आभासी और वास्तविक, दोनों नजरिये से हास्यास्पद और अप्रभावी नजर आने लगा। यहां तक कि हमारे ‘अवतारी’ प्रधानमंत्री ने जब रायता समेटने का प्रयास किया, तो वह भी उल्टा पड़ गया- उन्होंने अपने पसंदीदा रात 8 बजे के टीवी स्लॉट से बाहर निकलकर इंस्टाग्राम रील्स पर हाथ आजमाया जो महज मीम्स और मजाक की खुराक बनकर रह गया।
इससे हिन्दुत्व के व्यापक प्रोजेक्ट को भी जबरदस्त झटका लगा है। मोदी सरकार और संघ के शीर्ष पदाधिकारियों, दोनों को ही ‘परिवार’ के मुखिया मोहन भागवत ने उस वक्त कटघरे में खड़ा कर दिया, जब मुंबई के सम्मेलन में उन्होंने साफ कहा कि जेन-जी के ये प्रदर्शनकारी ‘देशद्रोही’ नहीं हैं। साथ ही, उन्होंने ताकीद की कि सरकार उनसे बातचीत करे- यानी अपनी उस पुरानी ‘मेरी सुनो या चलते बनो’ वाली जिद से बाज आए।
कांग्रेस पार्टी, और खास तौर पर राहुल गांधी, कुछ समय से छात्रों की समस्याओं को उठा रहे थे, लेकिन पीएमओ के ‘लंबे हाथों’ के कारण उनके प्रयासों को मीडिया में तवज्जो नहीं मिल पा रही थी। दरअसल, इस उम्मीद में कि इससे कांग्रेस के अभियान की हवा निकल जाएगी, सरकार शुरू में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के विरोध-प्रदर्शन पर खासी नरम रही। लेकिन सरकार को इस बात का दूर-दूर तक अंदाजा नहीं था कि सीजेपी को कैसा जनसमर्थन मिल सकता है। वह यह समझने में चूक गई कि ‘दलीय राजनीति’ से अलग रहने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग इस क्रूर और आत्म-मुग्ध सत्ता के खिलाफ अपनी हताशा को आवाज देने के लिए किसी भी आंदोलन का साथ देने को बेताब बैठा है। वहीं, कांग्रेस का विरोध पारंपरिक राजनीतिक शैली में था।
दूसरी ओर, जंतर-मंतर के विरोध-प्रदर्शन ने युवा भारतीयों को अपनी भावनाओं को उस तरह से व्यक्त करने की आजादी दी, जो उन्हें स्वाभाविक रूप से आती है। जेन-जी ने हंसी-मजाक को एक निहत्था कर देने वाले मारक हथियार में बदल दिया। आधुनिक भारत के इतिहास में पहली बार व्यंग्य और कटाक्ष का कल्पनाशील और शक्तिशाली तरीके से इस्तेमाल किया गया। यहां तक कि बहुचर्चित अपशब्द भी, वास्तव में, उस व्यवस्था के पाखंड का एक बेहतरीन तोड़ साबित हुए जिसने भारतीय राजनीति में गाली-गलौज और छींटाकशी को सामान्य बना दिया है; वे किसी को नहीं बख्शते, यहां तक कि गांधी, नेहरू और मौलाना आजाद जैसे श्रद्धेय और दिवंगत राष्ट्रीय नेताओं को भी नहीं।
प्रदर्शन में युवा महिलाओं द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा से आहत लोगों को डिजिटल हिन्दुत्व (इंटरनेट पर छाई हिन्दुत्ववादी रील संस्कृति) की दुनिया की भी सैर करनी चाहिए। उन्हें राजनीतिक हिन्दुत्व के वशीभूत युवा महिलाओं के वे वीडियो देखने चाहिए, जो आक्रामक हाव-भाव के साथ अपनी राजनीति और अपने ‘सुप्रीम लीडर’ का विरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति पर जहरीले और अभद्र शब्दों का बौछार कर देती हैं। जंतर-मंतर पर इस्तेमाल किए गए अपशब्दों पर हैरानी जताने से पहले, प्रधानमंत्री के लिए बेहतर होता कि वह बंगाल, राजस्थान और अन्य जगहों पर चुनाव अभियानों के दौरान इस्तेमाल की गई अपनी खुद की शब्दावली को याद कर लेते। अगर उन्होंने अपने समर्थकों द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा पर भी कभी ऐसी ही हैरानी जताई होती, तो उनकी बात थोड़ी ज्यादा भरोसेमंद लगती।
डर के जिस अभेद्य किले में इस आंदोलन ने दरारें डाली हैं, वे उम्मीद जगाती हैं। शायद इसलिए कि जेन-जी का विरोध-प्रदर्शन मुख्य रूप से शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर केन्द्रित है, जाति और धर्म के आधार पर इसमें फांक पैदा करने की कोशिशें अब तक असफल ही रही हैं। हम एक ऐसे वर्ग के उदय के गवाह बन रहे हैं जिसे किसी खास मानसिकता से नहीं बल्कि व्यावहारिक समझ से परिभाषित किया जा सकता है। अपने आयोजकों की रणनीतिक सूझबूझ के नेतृत्व में, यह विविध समूह दिखा रहा है कि अलग-अलग, यहां तक कि परस्पर विरोधी विचारों वाले लोग भी एक साझा उद्देश्य के लिए साथ आ सकते हैं- उदाहरण के लिए, आरक्षण के समर्थक और विरोधी।
वास्तव में, शुरू में कुछ मोदी-समर्थक भी इसमें शामिल थे। लेकिन अपने आत्म-मुग्ध हठ के कारण सरकार ने उन्हें खुद से दूर कर दिया, जिसका सीधा फायदा विरोधियों को मिला। दिन-ब-दिन यह साफ होता जा रहा है कि अपने जीवन में वास्तविक समस्याओं का सामना कर रहे युवा भारतीय भावनात्मक उकसावे के बजाय सहानुभूतिपूर्ण और तर्कसंगत संवाद की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षण है, और यदि इसका समझदारी से उपयोग नहीं किया गया तो यह मौका हाथ से निकल सकता है।
राहुल गांधी ने अपनी ओर से बेहतरीन राजनीतिक परिपक्वता दिखाई है। वह विरोध-प्रदर्शन स्थल पर नहीं गए, उन्होंने समझदारी से इस पर ‘राजनीति’ करने या इसका श्रेय लेने से परहेज किया और इसके बजाय कांग्रेस की पहुंच को मजबूत करना जारी रखा। वह शिक्षा की स्थिति से जुड़ी मांगों और चिंताओं के गैर-दलीय चरित्र को रेखांकित करने के प्रति सतर्क रहे हैं, और उन्होंने युवा भारतीयों के साथ तर्कसंगत संवाद की कला में महारत हासिल कर ली है। उनके नजरिये में तात्कालिक विरोध को आरएसएस-बीजेपी के सत्तावादी मंसूबों के खिलाफ एक दीर्घकालिक, भविष्य-उन्मुख प्रतिरोध में बदलने की क्षमता है।
जाति, समुदाय, लिंग और भाषा के मुद्दे निस्संदेह भारतीय राजनीति की वास्तविकताएं हैं, और लोकप्रिय प्रतिरोध आंदोलनों को तोड़ने के लिए इनका लगातार फायदा उठाया जाता है। कोई भी राजनीतिक कार्यक्रम या आयोजन इन वास्तविकताओं की अनदेखी नहीं कर सकता। इसलिए चुनौती यह है कि लोगों के बीच अधिकतम संभव एकजुटता कैसे हासिल की जाए और हासिल कर लेने के बाद उसे कैसे बरकरार रखा जाए।
यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मौजूदा सरकार बिल्कुल आत्म-मुग्ध है और उस आरएसएस विचारधारा से संचालित है जो भारत के समावेशी और लोकतांत्रिक विचार की कट्टर विरोधी है। इसने मुख्यधारा के मीडिया पर ऐसे कब्जा कर लिया है कि उसके राजनीतिक एजेंडे और कट्टरता को 24x7 बढ़ावा दिया जाता है। कल जब भी भारत का निष्पक्ष इतिहास लिखा जाएगा, जनता पर ढाए गए इस ‘अज्ञानता और मूर्खता के कहर’ का सबसे बड़ा कसूरवार 'गोदी मीडिया' को ठहराया जाएगा।
प्रदर्शन से पैदा हुए इस उत्साह को निरंतर राजनीतिक गतिविधि में तभी बदला जा सकता है जब मौजूदा सरकार और उसके वैचारिक स्रोत, आरएसएस के मंसूबों का एक विश्वसनीय विकल्प मौजूद हो। उसके नफरती एजेंडे का लगातार मुकाबला करना जरूरी है। आज के इस दौर में- जो एक ओर एआई और आभासी दुनिया, तो दूसरी ओर संकीर्ण राजनीति के साये में आकार ले रहा है- हिन्दुत्ववादी नजरिये के बरक्स एक ठोस विकल्प खड़ा करना होगा।
राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने और भारत के समावेशी विचार को आकार देने की अपनी ऐतिहासिक विरासत के साथ, कांग्रेस को इस प्रक्रिया में सबसे अहम किरदार निभाना है। इस वैचारिक अभ्यास के साथ-साथ, उसे संभावित सहयोगियों की आकांक्षाओं को भी समायोजित करना होगा। यह सब कहना आसान है और करना कठिन। लेकिन वर्तमान संकट से बाहर निकलने का यही एकमात्र रास्ता है; अन्यथा, यह हाथ से निकला एक और मौका बनकर रह जाएगा।