
कहां तुम चले गए… गजल में जगजीत सिंह की आवाज में जो दर्द, जो मजबूती और जो एहसास था, वह केवल सुरों का जादू नहीं था, बल्कि उनके जीवन का सच भी था। हर सुर में, हर शब्द में, हर गजल में उनका दर्द और पीड़ा बयां हो रही थी। आज भी यह गजल लाखों लोगों के दिलों में बसा है।
8 फरवरी 1941 को गंगानगर में जन्मे जगजीत सिंह ने संगीत की दुनिया में कदम रखा तो शायद उन्हें अंदाजा नहीं था कि जिंदगी उन्हें न केवल सुरों की मिठास देगी, बल्कि कड़वे गम का भी स्वाद चखाएगी।
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जगजीत सिंह का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। पिता चाहते थे कि वह प्रशासनिक सेवा में जाएं, लेकिन उनके दिल में संगीत की आग जल रही थी। सुर-ताल से उनकी मोहब्बत उन्हें किसी और राह पर ले गई। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने ठान लिया था कि संगीत ही उनकी दुनिया होगी। दो साल पंडित छगन लाल शर्मा के पास शास्त्रीय संगीत की कक्षाएं, फिर उस्ताद ज़माल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद का प्रशिक्षण सब कुछ सिर्फ उनकी आवाज को निखारने के लिए था।
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मुंबई आते ही उनकी जिंदगी ने उन्हें असली परीक्षा दी। कोई बड़ा ब्रेक नहीं मिला, संघर्ष जारी रहा। पेइंग गेस्ट के कमरे में रहकर विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाने पड़े, शादी-ब्याह या छोटे समारोह में भी मौका मिलते ही उन्होंने प्रदर्शन किया। संगीत का उनका जुनून और लगातार कोशिश ने उन्हें टिके रहने का साहस दिया।
1967 में उनकी मुलाकात चित्रा सिंह से हुई। दोनों का प्यार और संगीत से जुड़ाव धीरे-धीरे इकरार में बदल गया और 1969 में दोनों ने शादी कर ली। लेकिन वर्कफ्रंट पर सफलता के लिए इंतजार लंबा था। कई फिल्मों के संगीत सफल नहीं हुए। 'लीला', 'बिल्लू बादशाह', 'राही', 'ज्वाला', 'लौंग दा लश्कारा', सब कुछ औसत रहा। फिर भी जगजीत सिंह कभी निराश नहीं हुए।
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1975 में उनका और चित्रा सिंह का एल्बम 'द अनफॉरगेटेबल्स' आया। यह एल्बम देखते ही देखते लोगों की जुबां पर चढ़ गया। उनकी जोड़ी संगीत प्रेमियों की पहली पसंद बन गई। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 80 के दशक में शो, एल्बम और फिल्मों में गाने का सिलसिला लगातार बढ़ता गया। 1987 में उन्होंने डिजिटल सीडी एल्बम 'बियोंड टाइम' पेश कर भारतीय संगीत में नया मुकाम हासिल किया।
लेकिन इसी बीच जिंदगी ने उन्हें सबसे बड़ा झटका दिया। 1990 में उनके इकलौते बेटे विवेक का 18 साल की उम्र में निधन हो गया। इस हादसे ने जगजीत सिंह और चित्रा सिंह को तोड़कर रख दिया। कहा जाता है कि उस दर्द के बाद उन्होंने गाना छोड़ दिया था।
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इतनी बड़ी त्रासदी के बाद संगीत में लौटना आसान नहीं था, लेकिन चाहने वालों की दुआ और अपने जुनून ने उन्हें फिर से माइक थामने पर मजबूर किया। और जब उन्होंने लौटकर गाना शुरू किया, तो वह केवल गाना नहीं था, बल्कि उनके दर्द और संवेदनाओं का प्रदर्शन था। गीत 'चिट्ठी ना कोई संदेश…' में हर एक शब्द में उनकी पीड़ा झलकती है। यही वजह है कि यह गीत सुपरहिट हो गया और हमेशा के लिए लोगों की प्लेलिस्ट में शामिल हो गया।
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जगजीत सिंह ने गजल और गीत को एक नई पहचान दी। 'होश वालों को खबर क्या', 'बड़ी नाजुक है ये मंज़िल', 'कागज की कश्ती', 'चुपके-चुपके रात दिन', 'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो', 'तुमको देखा तो ये खयाल आया', इन गानों ने न केवल प्रेम को महसूस करना सिखाया, बल्कि दर्द, संवेदना और जीवन की गहराई को भी उजागर किया। उन्होंने गालिब, मीर, मजाज और फिराक गोरखपुरी जैसे शायरों की नज़्मों को आम लोगों तक पहुंचाया।
उनकी आवाज केवल संगीत नहीं थी, बल्कि एक अनुभव और एक यात्रा थी। 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी आवाज आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा है।
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